*युद्ध, विश्वसनीयता और अमेरिका का बदलता चेहरा*
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, ::21वीं सदी के तीसरे दशक में दुनिया जिस तरह से बदल रही है, उसमें शक्ति संतुलन, कूटनीति और वैश्विक नेतृत्व के मायने भी तेजी से परिवर्तित हो रहे हैं। लंबे समय तक स्वयं को “विश्व का प्रहरी” और “लोकतंत्र का रक्षक” बताने वाला अमेरिका आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसकी सैन्य ताकत तो अब भी मजबूत है, लेकिन उसकी नैतिक और कूटनीतिक विश्वसनीयता गंभीर सवालों के घेरे में है।
युद्धों और वैश्विक संकटों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका को नुकसान केवल युद्ध के मैदान में ही नहीं हुआ है, बल्कि उसकी सबसे बड़ी क्षति उसकी साख, उसके गठबंधनों और उसके प्रभाव क्षेत्र में हुई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका एकमात्र ऐसी शक्ति बनकर उभरा था, जिसने आर्थिक, सैन्य और तकनीकी तीनों क्षेत्रों में प्रभुत्व स्थापित किया। उसने न केवल अपने सहयोगियों की मदद की, बल्कि वैश्विक संस्थाओं का निर्माण कर विश्व व्यवस्था को आकार दिया।
सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने लोकतंत्र बनाम साम्यवाद की लड़ाई को वैश्विक स्तर पर लड़ा। इस दौरान उसने कई देशों में हस्तक्षेप किया, जिससे उसकी छवि एक हस्तक्षेपकारी शक्ति की भी बनी। 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बन गया। यह वह दौर था जब अमेरिका ने वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सैन्य रणनीति को लगभग एकतरफा दिशा दी।
इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका के युद्धों ने उसकी सैन्य शक्ति की सीमाओं को उजागर किया। अरबों डॉलर खर्च करने और हजारों सैनिकों की जान जाने के बावजूद, अमेरिका स्थायी शांति स्थापित नहीं कर सका। अमेरिका ने जिन देशों में लोकतंत्र स्थापित करने का प्रयास किया, वहाँ अक्सर अराजकता और अस्थिरता ही बढ़ी। इससे उसकी नीतियों पर सवाल उठने लगे। हाल के संघर्षों में अमेरिका ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरीकों से भागीदारी की। लेकिन इन युद्धों ने यह दिखाया कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत से नहीं जीते जा सकते।
अमेरिका पर अक्सर आरोप लगाया जाता है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानकों को अपने हित के अनुसार लागू करता है। एक देश के लिए कठोर रुख और दूसरे के लिए नरमी उसकी विश्वसनीयता को कमजोर करती है। कई बार अमेरिका ने अपने सहयोगियों को समर्थन देने का वादा किया, लेकिन संकट के समय पीछे हट गया। इससे उसके सहयोगियों में अविश्वास बढ़ा। अमेरिका की विदेश नीति अब अधिकतर उसकी घरेलू राजनीति से प्रभावित होती है। सरकार बदलते ही नीतियाँ बदल जाती हैं, जिससे उसकी निरंतरता पर सवाल उठते हैं।
यूरोपीय देश अब अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते। वे अपनी सुरक्षा और विदेश नीति में अधिक स्वायत्तता की ओर बढ़ रहे हैं। एशियाई देश अब अमेरिका और अन्य शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वे किसी एक शक्ति पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते। मध्य पूर्व के देशों ने भी अमेरिका के प्रभाव से बाहर निकलकर नए गठबंधन बनाने शुरू कर दिए हैं।
अमेरिका अब पहले की तरह वैश्विक नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम नहीं दिखता। उसकी नीतियाँ अक्सर प्रतिक्रियात्मक और असंगत लगती हैं। चीन, रूस और अन्य उभरती शक्तियों ने अमेरिका के प्रभाव को चुनौती दी है। इससे वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य संस्थाओं में भी अमेरिका का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा।
अमेरिका की आर्थिक नीतियों और प्रतिबंधों ने कई देशों को डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित किया है। तकनीकी क्षेत्र में भी अमेरिका को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। आज के समय में युद्ध केवल मैदान में नहीं, बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया पर भी लड़े जाते हैं। अमेरिका की छवि को उसके विरोधियों ने प्रभावी ढंग से चुनौती दी है।
अमेरिका को अपनी नीतियों में पारदर्शिता और स्थिरता लानी होगी। उसे अन्य देशों के साथ मिलकर काम करना होगा, न कि अकेले नेतृत्व करने की कोशिश करनी होगी। घरेलू स्तर पर भी उसे अपनी राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को हल करना होगा।
अमेरिका अब भी एक शक्तिशाली देश है, लेकिन उसकी शक्ति का स्वरूप बदल रहा है। केवल सैन्य ताकत के बल पर वह दुनिया का नेतृत्व नहीं कर सकता। उसे अपनी विश्वसनीयता, अपने गठबंधनों और अपनी नीतियों को फिर से परिभाषित करना होगा। यह स्पष्ट है कि अमेरिका को जो नुकसान हुआ है, वह केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है। उसकी साख, उसकी मित्रता और उसका प्रभाव, तीनों गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि अमेरिका इस चुनौती से उबर पाता है या नहीं, लेकिन इतना निश्चित है कि दुनिया और अमेरिका अब पहले जैसी नहीं रही।
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