‘महिला आरक्षण संशोधन बिल’ के राजनीतिक निहितार्थ।..
निशिकांत ठाकुर/विश्व का कोई भी देश क्यों न हो, सत्ता हासिल करने की होड़ हर जगह लगी ही रहती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि आपके पास सत्ता है, तो फिर देश का सबकुछ आपके नियंत्रण में रहता है, भले ही देश की जनता की नजरें आपकी हर गतिविधियों पर जमी क्यों नहीं रहती है! यदि किसी एक की मर्जी से सब काम होने लगे, तो संभव है कि वह अच्छा भी हो। लेकिन, आपकी मर्जी पर पूरे देश का एकमत हो जाना विशेष कारणों से तो संभव हो सकता है, पर आपके हर तरह के कार्यों पर सहमति की मुहर लगा देना कतई जरूरी नहीं है। इसलिए हर देश और समाज में कम से कम दो पक्ष होते हैं- सत्तापक्ष और विपक्ष। युद्ध जैसी परिस्थितियों में सबका एकमत हो जाना जरूरी है, लेकिन हर नियम और नीति में ऐसा होना असंभव भी होता है। इसी वजह से पिछले दिनों लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल दो तिहाई बहुमत के अभाव में पारित नहीं हो सका। इसके लिए भी सत्तापक्ष और विपक्ष की अलग अलग राय है, लेकिन इसके लिए सबके अपने अपने तर्क भी हैं। इसका विश्लेषण आगे करेंगे, लेकिन पहले यह समझते हैं कि आखिर यह महिला आरक्षण संशोधन बिल है क्या और इसके बारे में सत्ता तथा विपक्ष के अपने अपने क्या क्या तर्क हैं। साथ ही आमजन व सामान्य नागरिक इस मुद्दे को किस नजरिये से देख रहा है।
दरअसल, महिला आरक्षण संशोधन बिल, जिसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (संविधान 106वां संशोधन अधिनियम, 2023) के रूप में जाना जाता है, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% (एक-तिहाई) सीटें आरक्षित करने का एक ऐतिहासिक कानून है। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और नीति-निर्माण में उनकी आवाज को मजबूत करना है। राष्ट्र के नाम संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन विधेयक पास न होने पर दुख जताया है। वहीं, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने कहा कि मोदी सरकार संविधान पर हमला कर रही है और दक्षिण भारतीय राज्यों, पूर्वोत्तर के राज्यों और छोटे राज्यों के साथ भेदभाव करके उन्हें कमज़ोर करने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री ने 18 अप्रैल शनिवार की शाम को कहा कि महिला आरक्षण संशोधन बिल को पास नहीं होने देकर विपक्ष ने देश की करोड़ों महिलाओं के सपनों को रौंद दिया है। पीएम ने कहा, ‘हमारे भरसक प्रयासों के बावजूद हम सफल नहीं हो पाए। नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन नहीं हो पाया। मैं सभी माताओं, बहनों से माफ़ी चाहता हूं।’ प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं पर हमला बोलते हुए कहा, ‘कुछ लोगों के लिए दल से बड़ा कुछ नहीं होता।’ मोदी ने कहा, ‘देश की करोड़ों महिलाओं की नज़र संसद पर थी। मुझे भी देखकर दुख हुआ कि नारी शक्ति का यह प्रस्ताव जब गिरा, तो कांग्रेस, सपा, टीएमसी, डीएमके जैसी परिवारवादी पार्टियां ख़ुशियां मना रही थीं। ऐसे लोगों को इस देश की महिलाएं कभी माफ़ नहीं करेंगी।’
महिला आरक्षण क़ानून और डीलिमिटेशन से जुड़ा 131वां संवैधानिक संशोधन विधेयक शुक्रवार को लोकसभा में गिर गया । पिछले 12 साल में यह पहली बार है जब सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सरकार की तरफ़ से पेश कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में गिरा हो। सदन में दो दिन की बहस के बाद शुक्रवार शाम मतदान हुआ था। संसद में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने वाले क़ानून में संशोधन और डीलिमिटेशन से जुड़े बिलों के समर्थन में 298 मत पड़े, जबकि इसके विरोध में 230 मत पड़े। संसदीय लोकसभा क्षेत्रों की संख्या फिर से निर्धारित करने के लिए लाया जा रहा परिसीमन या डीलिमिटेशन विधेयक भी इसके साथ जुड़ा हुआ था। सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक भी इन दोनों विधेयकों के साथ पेश किया था। इस विधेयक का उद्देश्य केंद्र शासित प्रदेशों के निर्वाचन‑क़ानून व आरक्षण‑व्यवस्था को नए परिसीमन और लोकसभा‑विस्तार ढांचे से जोड़ना है।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने महिला आरक्षण बिल (131वां संविधान संशोधन) लोकसभा में पास न होने के लिए कांग्रेस और विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने इसे महिलाओं के अधिकार रोकने वाली ‘मानसिकता’ और ‘महिला विरोधी पाप’ बताया। रिजिजू ने कहा कि बहुमत होने के बावजूद दो-तिहाई बहुमत की कमी के कारण बिल पास नहीं हुआ और विपक्ष ने देश की महिलाओं का अधिकार छीन लिया।
वहीं, महिला आरक्षण बिल (131वां संविधान संशोधन) के लोकसभा में पास न होने पर विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र की जीत और महिला सशक्तिकरण के बजाय एक ‘साजिश’ करार दिया है। विपक्ष का मुख्य विरोध बिल को परिसीमन और जनगणना से जोड़ने के खिलाफ था, न कि आरक्षण के खिलाफ। कांग्रेस, सपा, और अन्य दलों ने इसे अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के हक़ का हनन बताया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि यह बिल महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन के जरिये संघीय ढांचे को बदलने की भाजपा की चाल थी, जिसे विपक्षी दलों ने कामयाब नहीं होने दिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि बिल में पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए कोटा नहीं है, जिससे यह बिल अधूरा और ओबीसी विरोधी है। विपक्षी दलों का कहना था कि आरक्षण बिना किसी शर्त के तुरंत लागू होना चाहिए, न कि 2029 या उससे आगे की जनगणना के बाद। प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस बिल के गिरने को ‘लोकतंत्र और देश की अखंडता की बड़ी जीत’ बताया, क्योंकि वे इसे पुरानी जनगणना पर आधारित मान रही थीं। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि विपक्ष ने महिला आरक्षण का विरोध नहीं किया, लेकिन उसके साथ जो हक का हरण हो रहा था, उसकी ‘लक्ष्मण रेखा’ विपक्ष ने खींची है। विपक्षी नेताओं के मुताबिक, यह बिल महिलाओं को अधिकार देने के बजाय उनके सशक्तिकरण के नाम पर राजनीति करने का एक ‘छलावा’ था।
महिला आरक्षण संशोधन बिल पास न होने पर जनता की भी मिली-जुली प्रतिक्रिया है। कुछ लोग इसे महिला सशक्तिकरण के लिए बड़ा झटका और ‘महिला विरोधी माइंडसेट’ मानते हैं, वहीं अन्य, विशेषकर विपक्ष के समर्थक, इसे ‘संविधान और लोकतंत्र की जीत’ के रूप में देखते हैं, जो परिसीमन से जुड़े होने का विरोध कर रहे थे। सरकार ने इसे विपक्ष की साजिश बताते हुए महिलाओं के अधिकारों से समझौता करार दिया है, जबकि विपक्ष ने इसे असंवैधानिक दांव कहा है। कई महिलाओं और कार्यकर्ताओं ने इस पर निराशा जताई है और इसे देश की आधी आबादी के हक को छीनने के समान बताया है। विपक्ष को महिला विरोधी बताते हुए इसे ‘नारी शक्ति’ के साथ अन्याय बताया जा रहा है। उनका आरोप है कि विपक्ष इस पर जश्न मना रहा है, क्योंकि उनका मानना है कि इस बिल के माध्यम से पुरानी जनगणना और परिसीमन को लागू करने की साजिश को रोकना है। मुख्य विवाद आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने और ओबीसी/अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए उप-कोटा न होने पर था, जिससे कई विपक्षी दल असहमत थे। ऐसे में अब यह सवाल उठने लगा है कि अब आधी आबादी को उनका हक कब मिलेगा— 2029 या 2034 में? सच बात तो यह है कि जब तक समाज की समझ में यह बात नहीं आ जाती कि बिल देशहित के लिए उपयुक्त है या फिर विभिन्न राज्यों में होने वाले चुनाव के लिए राजनीतिक दलों द्वारा सच और झूठ को अपने अपने तरीके से समझना और समझाना है। वैसे भी प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन पर बड़ी तीखी प्रतिक्रिया आई है जिसका उल्लेख करना यहां उचित नहीं है। नेतागण तो सभी पक्षों के मन की बात जानते हैं, लेकिन सामान्य नागरिक इसे किस नजरिये से समझ रहा है, यह एक गंभीर चिंतन का विषय है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)


