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*जितेन्द्र कुमार सिन्हा का प्रकाशित हुआ चौथी पुस्तक – “गया जी”*

त्रिलोकी नाथ प्रसाद::भारतीय सभ्यता की उन विरल नगरों में से एक है “गया जी”,जहाँ धर्म, संस्कृति, इतिहास और लोक-स्मृति एक-दूसरे में घुलकर नगर की आत्मा का निर्माण करते हैं। देश-दुनिया की महान विभूतियाँ सदियों से यहाँ आकर इस भूमि को नमन करती रही हैं। गया जी केवल एक तीर्थ नहीं है, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना है, जहाँ का चप्पा-चप्पा अपने भीतर प्राचीन गौरवशाली विरासत को संजोए हुए है। इन्हीं आयामों को एक सूत्र में पिरोने का सराहनीय प्रयास लेखक जितेन्द्र कुमार सिन्हा ने अपनी नवीनतम पुस्तक “गया जी” के माध्यम से किया है।

यह पुस्तक केवल दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता को सरल एवं बोधगम्य भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास है। पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को गया जी से परिचित कराना और उन्नयन की दिशा में प्रेरित करना है। ऐसे प्रायः गया जी का नाम आते ही पितृ-तर्पण, मोक्ष और श्रद्धा की अनुभूति स्वाभाविक हो जाती है, जब कि विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी के तट पर संपन्न होने वाले कर्मकांडों ने इसे वैश्विक पहचान दी है। मान्यता है कि यहाँ किए गए पिंडदान से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। धार्मिक अनुष्ठानों की यह परंपरा न केवल आस्था को पुष्ट करती है, बल्कि नगर के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन को भी दिशा देती है।

“गया जी” पुस्तक प्राप्त करने वालों में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के धर्मेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार सह कवि सुरेन्द्र कुमार रंजन, प्रो.अमित सिन्हा, संजय कुमार सिन्हा, पत्रकार अनिल कुमार, उमा शंकर प्रसाद वर्मा, पटना उच्च न्यायालय के प्रशाखा पदाधिकारी पूजा सबनम, एजी कॉलोनी निवासी पंकज कुमार, अर्चना कुमारी, जय कुमार, फेस रीडर सह ज्योतिषाचार्य शम्भू नाथ झा, शालिनी सिन्हा प्रमुख थे। लोगों ने लेखक जितेन्द्र कुमार सिन्हा को उनकी चौथी पुस्तक के लिए शुभकामनाएं देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक जिज्ञासुओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगी।

पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें नगर की सामूहिक चेतना और परिपक्वता को रेखांकित करता है। इस पुस्तक में गया जी के प्राचीन मोहल्लों, आसपास बसे क्षेत्रों, फल्गु तट पर अवस्थित मानपुर और आधुनिक बसावटों का उल्लेख किया गया है। हर मोहल्ला अपनी अलग पहचान, पेशा, परंपरा और कथा लेकर खड़ा है। गलियाँ केवल रास्ते नहीं हैं, बल्कि समय की परतें हैं, जहाँ मंदिरों की घंटियाँ, मस्जिदों की अजान, बाजारों की चहल-पहल और घरों की आँगन संस्कृति एक साथ सांस लेती है।

वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र कुमार रंजन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिक समय में भारत के महत्त्वपूर्ण धार्मिक नगर गया जी के ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों पर विस्तार से चर्चा की गई है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में गयासुर, विष्णु-लीला और फल्गु की कथाएँ नगर की स्मृति-भूमि का हिस्सा है। आज की युवा पीढ़ी तेजी से डिजिटल संसार की ओर अग्रसर है। ऐसे में लेखक द्वारा ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों का उल्लेख कर पुस्तक को ज्ञान-वर्धन और जिज्ञासा-उत्प्रेरण बनाया है।
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