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*पत्रकारिता के कठघरे में लोकतंत्र – खबर, विचार और सत्ता के बीच चौथे स्तंभ*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा,  ::लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता है। लोकतंत्र की आत्मा संवाद, असहमति, सवाल और सूचना की स्वतंत्रता में बसती है। इसी व्यवस्था में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा गया है। लेकिन पिछले एक दशक में भारतीय पत्रकारिता को लेकर जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप, राजनीतिक खेमेबंदी और वैचारिक विभाजन सामने आए हैं, उसने इस चौथे स्तंभ के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पत्रकारिता अब सत्ता और विपक्ष के बीच अपने-अपने चश्मे से देखी जाने लगी है? यह कहना भी उचित नहीं होगा कि पत्रकारिता जगत में सब कुछ आदर्श है। पत्रकारिता की आड़ में निजी स्वार्थ, राजनीतिक निकटता, कारोबारी हित और टीआरपी की प्रतिस्पर्धा के उदाहरण सामने आते रहे हैं। लेकिन इन कमियों के बावजूद यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि देश में आज भी हजारों पत्रकार कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और सत्ता से लेकर विपक्ष तक से सवाल पूछ रहे हैं। समस्या तब पैदा होती है जब एक ही घटना सत्ता के पक्ष में हो तो खबर और विपक्ष के पक्ष में हो तो सत्य की अंतिम मुहर बन जाती है।

भारतीय राजनीति को यदि पत्रकारिता के संदर्भ में देखें तो एक विचित्र तस्वीर दिखाई देती है। एक ओर वह मीडिया है जिस पर सरकार का पक्ष रखने या सरकार के करीब होने का आरोप लगाया जाता है। दूसरी ओर वह मीडिया है जिसे विपक्ष के साथ खड़े होकर सरकार की आलोचना करने वाला माना जाता है। दिलचस्प यह है कि दोनों पक्ष स्वयं को निष्पक्ष बताते हैं और दूसरे पक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं। यही वह जगह है जहां पत्रकारिता का मूल सिद्धांत पीछे छूटने लगता है। पत्रकारिता का काम किसी राजनीतिक दल की जय-जयकार करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल और समाज को तथ्य उपलब्ध कराना है। सरकार गलत हो तो सवाल होना चाहिए और विपक्ष गलत हो तो भी सवाल होना चाहिए। सत्ता बदलने के साथ पत्रकारिता के सिद्धांत नहीं बदलने चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में पत्रकार किसी दल का प्रवक्ता नहीं होता है। वह जनता और सत्ता के बीच सूचना का माध्यम होता है।

इसी संदर्भ में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानि Special Intensive Revision (SIR) को लेकर निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेदों पर प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट चर्चा के केंद्र में है। 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले लगभग दस महीनों में निर्वाचन आयुक्त एस.एस. संधू और विवेक जोशी ने SIR तथा मतदाता सूची से जुड़े विभिन्न फैसलों और निर्देशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की। रिपोर्ट में इन आपत्तियों से जुड़े कई प्रशासनिक और प्रक्रियागत मुद्दों का उल्लेख किया गया। यहीं से राजनीतिक विवाद शुरू हुआ। विपक्षी दलों ने रिपोर्ट को निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल के रूप में देखा। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने कहा कि आयुक्तों द्वारा उठाए गए सवाल और सुझाव निर्णय प्रक्रिया के सामान्य हिस्से हैं और SIR समेत आयोग के अंतिम निर्णय तीनों आयुक्तों की स्वीकृति से लिए गए हैं। यानि यहां दो अलग-अलग बातें हैं- किसी विषय पर सवाल उठना और किसी अंतिम निर्णय का विरोध होना। इन दोनों को एक ही अर्थ में देखना पत्रकारिता और लोकतांत्रिक विमर्श दोनों के लिए उचित नहीं होगा।

तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग में विचार-विमर्श के दौरान किसी आयुक्त द्वारा सवाल उठाना, किसी प्रक्रिया पर आपत्ति जताना या कोई वैकल्पिक सुझाव देना अपने आप में असाधारण घटना नहीं है। कानूनी व्यवस्था में भी आयोग के कामकाज के संबंध में यह व्यवस्था रही है कि मामलों को यथासंभव सर्वसम्मति से निपटाया जाए और यदि मतभेद बना रहे तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। उपलब्ध व्याख्याओं के अनुसार तीनों आयुक्तों की राय का समान महत्व है और केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त का मत अंतिम नहीं माना जाता। इसलिए किसी फाइल पर दो आयुक्तों का सवाल उठाना और यह निष्कर्ष निकाल देना कि ‘निर्वाचन आयोग टूट गया’, ‘आयोग में विद्रोह हो गया’ या ‘संवैधानिक संस्था में निर्णय नहीं हो रहे’ इनके बीच पर्याप्त तथ्यात्मक अंतर है। पत्रकारिता का दायित्व इसी अंतर को स्पष्ट करना है।

यह पहली बार नहीं है जब निर्वाचन आयोग के भीतर अलग-अलग राय सामने आई हो। 2009 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को बेल्जियम का सम्मान मिलने से जुड़े मामले में निर्वाचन आयोग की राय 2-1 से विभाजित हुई थी। तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एन. गोपालस्वामी की राय अलग थी, जबकि निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला और एस.वाई. कुरैशी की राय दूसरी थी। अंततः बहुमत की राय के आधार पर फैसला हुआ। दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष भी इस मामले का रिकॉर्ड आया और न्यायालय ने निर्वाचन आयोग के विश्लेषण को देखते हुए आगे जांच की मांग को स्वीकार नहीं किया। अर्थात आयोग के भीतर मतभेद कोई आज पैदा हुई व्यवस्था नहीं है।

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुछ भाषणों को लेकर भी निर्वाचन आयोग के भीतर अलग राय सामने आई थी। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार वार्धा और लातूर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों से जुड़े मामलों में एक निर्वाचन आयुक्त ने अलग राय रखी थी और संबंधित फैसले 2-1 के बहुमत से हुए थे। उस समय भी निर्वाचन आयोग के भीतर असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा थी। इसलिए आज का मूल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि आयोग के भीतर किसी आयुक्त ने सवाल क्यों उठाया? जबकि मूल प्रश्न होना चाहिए कि क्या सवालों पर विधिवत विचार हुआ? क्या अंतिम निर्णय कानून के अनुसार हुआ? क्या प्रक्रिया पारदर्शी थी? और क्या पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहा? मेरे समझ से यही असली पत्रकारिता है।

यहीं से मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा होता है। यदि 2009 में आयोग में 2-1 का मतभेद लोकतांत्रिक प्रक्रिया था और 2019 में भी अलग राय संवैधानिक संस्था के भीतर विचार-विमर्श का हिस्सा थी, तो 2026 में SIR को लेकर सामने आए मतभेद को समझने के लिए भी वही पैमाना क्यों न अपनाया जाए? हो सकता है कि आज SIR का प्रभाव व्यापक हो। मतदाता सूची से जुड़ा विषय सीधे नागरिक के मतदान अधिकार से संबंधित है, इसलिए स्वाभाविक रूप से जनता की चिंता अधिक हो सकती है। लेकिन चिंता और निष्कर्ष दो अलग बातें हैं। सवाल उठाना लोकतंत्र है, लेकिन सवाल के आधार पर फैसला सुना देना पत्रकारिता नहीं हो सकता है।

SIR को लेकर बहस को केवल निर्वाचन आयोग के तीन आयुक्तों के बीच कथित मतभेद तक सीमित करना उचित नहीं होगा। मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मृत व्यक्तियों, दोहरे नाम, स्थान बदल चुके मतदाताओं अथवा अपात्र नामों को हटाना चुनावी सूची की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि दस्तावेजी कमी, तकनीकी त्रुटि या प्रशासनिक गलती के कारण किसी वास्तविक और पात्र मतदाता का नाम न छूट जाए। यही SIR की असली कसौटी है। हालिया रिपोर्टों में पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में हटाए गए नामों के संबंध में अपीलों का उल्लेख आया है। निर्वाचन आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बताया कि 27.16 लाख हटाए गए मतदाताओं में 22 लाख से अधिक ने पुनः शामिल किए जाने के लिए अपील की है। आयोग ने यह भी कहा कि हटाए गए नामों में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और डुप्लीकेट मतदाता शामिल थे। इससे स्पष्ट है कि बहस केवल राजनीतिक आरोपों की नहीं, बल्कि प्रक्रिया, दस्तावेज, अपील और सुधार की व्यवस्था की भी है।

पत्रकारिता तब कमजोर होती है जब खबर को तथ्य बताने के बजाय राजनीतिक हथियार बनाया जाने लगे। आज यदि कोई अखबार सरकार के पक्ष में खबर प्रकाशित करे तो उसे सरकारी मीडिया कहा जाता है। वही अखबार कल सरकार के खिलाफ खबर प्रकाशित कर दे तो अचानक उसे विपक्ष की नजर में निष्पक्ष पत्रकारिता का प्रमाण पत्र मिल जाता है। यह दोहरा मापदंड पत्रकारिता के लिए खतरनाक है। पत्रकार को न सरकार का जयकारा लगाना चाहिए और न विपक्ष की जयकार करनी चाहिए। पत्रकारिता का जयकारा केवल सत्य का होना चाहिए। किसी खबर की विश्वसनीयता इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उससे भाजपा खुश हुई या कांग्रेस, सरकार प्रसन्न हुई या विपक्ष। विश्वसनीयता इस बात से तय होनी चाहिए कि तथ्य क्या हैं? स्रोत क्या हैं? दूसरा पक्ष क्या कहता है? दस्तावेज क्या कहते हैं और निष्कर्ष तक पहुंचने का आधार क्या है?

शायद सबसे अधिक जरूरत तीसरे रास्ते की है। वह रास्ता जहां पत्रकार सरकार से भी सवाल पूछे और विपक्ष से भी। जहां SIR में मतदाता सूची की शुद्धता का समर्थन किया जाए, लेकिन पात्र मतदाता के अधिकार की रक्षा का सवाल भी उतनी ही मजबूती से उठाया जाए। जहां निर्वाचन आयोग के निर्णयों का सम्मान हो, लेकिन आयोग से पारदर्शिता की मांग भी की जाए। जहां आयोग के भीतर किसी आयुक्त की आपत्ति को छिपाया न जाए, लेकिन उस आपत्ति को अंतिम निर्णय के बराबर भी न माना जाए। यही संतुलन पत्रकारिता की विश्वसनीयता वापस ला सकता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में किसी भी खबर के साथ कुछ ही घंटों में राजनीतिक नैरेटिव खड़ा हो जाता है। एक पक्ष कहता है कि संस्था पर संकट है। दूसरा पक्ष कहता है कि संस्था को बदनाम किया जा रहा है। लेकिन आम नागरिक इन दोनों के बीच खड़ा होकर पूछता है कि आखिर सच क्या है? इसका उत्तर टीवी स्टूडियो के शोर से नहीं मिलेगा है। उत्तर मिलेगा दस्तावेजों से। बैठकों के रिकॉर्ड से। आधिकारिक आदेशों से। कानूनी प्रावधानों से। अपील की प्रक्रिया से और सबसे महत्वपूर्ण बात है तथ्यों की स्वतंत्र जांच से।

पत्रकारिता को निशाना बनाए जाने की शिकायत केवल पत्रकारों की नहीं है। वास्तव में यह पूरे लोकतंत्र की चिंता है। स्वतंत्र पत्रकारिता कमजोर होगी तो जनता की सूचना का अधिकार कमजोर होगा। लेकिन पत्रकारिता को मजबूत करने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पत्रकारों पर हमला हो रहा है। पत्रकारिता को स्वयं भी आत्ममंथन करना होगा। क्या हम खबर और राय के बीच अंतर कर पा रहे हैं? क्या हम आरोप और प्रमाण को अलग रख रहे हैं? क्या हम अपनी विचारधारा को खबर में घुसने से रोक पा रहे हैं? क्या हम विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति को भी पूरा अवसर दे रहे हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर हां है तो पत्रकारिता सचमुच लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यदि उत्तर नहीं है तो समस्या केवल सरकार या विपक्ष में नहीं, पत्रकारिता के भीतर भी खोजनी होगी।

SIR के वर्तमान विवाद से एक बड़ा लोकतांत्रिक सबक निकलता है कि असहमति को दुश्मनी समझना लोकतंत्र को कमजोर करता है। निर्वाचन आयोग के भीतर कोई आयुक्त किसी प्रस्ताव पर सवाल उठाता है तो यह जरूरी नहीं कि वह संस्था के विरुद्ध हो। उसी तरह आयोग का अंतिम निर्णय किसी एक अधिकारी की प्रारंभिक आपत्ति से अलग हो तो यह भी जरूरी नहीं कि प्रक्रिया असंवैधानिक हो गई। सवाल यह है कि प्रक्रिया क्या थी और अंतिम निर्णय किस आधार पर हुआ। यही सिद्धांत मीडिया पर भी लागू होना चाहिए। एक पत्रकार सरकार की आलोचना करे तो उसे देश-विरोधी नहीं कहा जाना चाहिए। दूसरा पत्रकार सरकार के किसी निर्णय का समर्थन करे तो उसे स्वतः सरकारी एजेंट नहीं माना जाना चाहिए। विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन तथ्य एक ही होने चाहिए।

SIR पर सवाल उठाना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। मतदाता सूची की शुद्धता पर प्रश्न करना भी उचित है। निर्वाचन आयोग से पारदर्शिता की मांग करना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन उसी लोकतंत्र में यह भी आवश्यक है कि किसी रिपोर्ट को उसके राजनीतिक उपयोग से पहले उसके तथ्यात्मक आधार पर परखा जाए। दो आयुक्तों की आपत्तियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे आपत्तियां क्या थी, किस स्तर पर थी और अंतिम निर्णय क्या हुआ, यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। निर्वाचन आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए, जबकि प्रकाशित रिपोर्ट में आंतरिक आपत्तियों और प्रक्रियागत चिंताओं का विस्तृत उल्लेख है। इन दोनों पक्षों को साथ रखकर ही पूरी तस्वीर समझी जा सकती है।

लोकतंत्र में किसी संस्था को अंधविश्वास से स्वीकार करना भी उचित नहीं होता है और राजनीतिक सुविधा के लिए तुरंत कठघरे में खड़ा कर देना भी। मतदाता सूची साफ होनी चाहिए, चुनाव निष्पक्ष होने चाहिए, आयोग पारदर्शी होना चाहिए और पत्रकारिता स्वतंत्र होनी चाहिए और सबसे ऊपर लोकतंत्र में विवाद का समाधान शोर से नहीं, प्रमाण से होना चाहिए। क्योंकि अंततः न सरकार स्थायी है, न विपक्ष स्थायी है, न मीडिया की सुर्खियां स्थायी हैं। स्थायी है तो केवल जनता का मत और संविधान में निहित लोकतांत्रिक व्यवस्था और उस व्यवस्था की रक्षा की जिम्मेदारी सरकार की भी है, विपक्ष की भी, निर्वाचन आयोग की भी और पत्रकारिता की भी। चौथा स्तंभ तभी मजबूत रहेगा, जब वह किसी सत्ता के सहारे नहीं, अपने तथ्य, अपनी स्वतंत्रता और अपनी विश्वसनीयता के सहारे खड़ा रहेगा।
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