राज्य

*महँगी होती सुविधाएँ – आदत, बाजार और आधुनिक मनुष्य*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा,  ::मनुष्य के स्वभाव में एक विचित्र द्वंद्व सदैव से मौजूद रहा है। एक ओर वह स्वयं को प्रकृति और ईश्वर की सर्वोत्तम रचना मानता है, दूसरी ओर उसी ईश्वरीय व्यवस्था को चुनौती देने का साहस भी करता है। विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता की उपलब्धियों ने उसे यह विश्वास दिलाया है कि वह अपनी बुद्धि के बल पर किसी भी सीमा को पार कर सकता है। लेकिन जब वह अपनी वास्तविकता से सामना करता है तो समझ में आता है कि ब्रह्मांड की विशालता के सामने उसकी उपलब्धियाँ कितनी छोटी हैं। वह ईश्वर से आगे निकलने का दावा तो कर सकता है, किंतु उसकी बनाई व्यवस्था के समकक्ष भी नहीं पहुँच पाता।

ईश्वर या प्रकृति ने मानव जीवन को चलाने के लिए जो मूलभूत साधन प्रदान किए हैं, वे बिना किसी मूल्य के उपलब्ध हैं। जल, वायु, सूर्य का प्रकाश, धरती की उर्वरता, पेड़-पौधे, ऋतुएँ और जीवन के लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधन किसी शुल्क पर नहीं मिलते। इनके लिए न कोई मासिक बिल देना पड़ता है और न ही कोई रिचार्ज कराना पड़ता है। मनुष्य चाहे अमीर हो या गरीब, इन प्राकृतिक उपहारों पर उसका समान अधिकार है।

इसके विपरीत, मानव द्वारा निर्मित सुविधाओं की दुनिया पूरी तरह अलग है। यहाँ हर सुविधा की एक कीमत है। सड़कें, वाहन, बिजली, इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क, मनोरंजन के साधन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और आधुनिक जीवन की तमाम व्यवस्थाएँ शुल्क आधारित हैं। इनका निर्माण, संचालन और विस्तार लागत से जुड़ा है, इसलिए इनके उपयोग के लिए भुगतान करना पड़ता है। प्रारंभ में ये सुविधाएँ जीवन को आसान बनाने के लिए आती हैं, लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य इन्हें आवश्यकता का दर्जा दे देता है।

यहीं से एक नई सामाजिक और आर्थिक प्रक्रिया शुरू होती है। सुविधा धीरे-धीरे आदत बन जाती है। जब कोई सुविधा आदत बन जाती है तो उसका मूल्य केवल आर्थिक नहीं रह जाता। वह व्यक्ति की दिनचर्या, सोच और व्यवहार का हिस्सा बन जाती है। तब उसका खर्च केवल रुपये-पैसे का खर्च नहीं होता, बल्कि मानसिक निर्भरता का मूल्य भी होता है। यदि वह सुविधा अचानक छिन जाए तो व्यक्ति स्वयं को अधूरा महसूस करने लगता है।

कुछ दशक पहले तक भारत का एक बड़ा वर्ग साधारण बटन वाले मोबाइल फोन का उपयोग करता था। उस समय मोबाइल फोन केवल बातचीत का माध्यम था। लोग रिचार्ज कराने से पहले भी कई बार सोचते थे। दस या बीस रुपये का बैलेंस भी महत्वपूर्ण माना जाता था। मोबाइल का उपयोग सीमित था और जीवन सामान्य गति से चलता था। किसी को यह कल्पना भी नहीं थी कि एक दिन इंटरनेट आधारित सेवाएँ मनुष्य की दिनचर्या पर इतना गहरा प्रभाव डालेगी।

आज परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। देश के गाँवों से लेकर महानगरों तक स्मार्टफोन पहुँच चुके हैं। 4G और 5G नेटवर्क ने इंटरनेट को जीवन का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। वही लोग जो कभी मोबाइल रिचार्ज पर खर्च करने में संकोच करते थे, आज बिना अधिक सोचे 349, 399, 499 या उससे अधिक के मासिक रिचार्ज करा रहे हैं। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस परिवर्तन का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व ट्विटर) और अन्य डिजिटल मंच स्वयं को निःशुल्क बताते हैं। वास्तव में इन प्लेटफॉर्मों पर खाता बनाने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता। लेकिन इनका उपयोग करने के लिए इंटरनेट चाहिए और इंटरनेट के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, इन प्लेटफॉर्मों पर बिताया गया समय भी एक प्रकार की कीमत है जिसे लोग अनजाने में चुकाते हैं।

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सुविधा के साथ-साथ आदत भी पैदा करता है। प्रारंभ में लोग केवल संपर्क बनाए रखने या जानकारी प्राप्त करने के लिए इनका उपयोग करते हैं। धीरे-धीरे यह उपयोग निर्भरता में बदल जाता है। सुबह उठते ही मोबाइल देखना, दिनभर नोटिफिकेशन पर ध्यान देना और रात को सोने से पहले सोशल मीडिया स्क्रॉल करना अनेक लोगों की दिनचर्या बन चुकी है। यह आदत इतनी गहरी हो जाती है कि व्यक्ति इसके बिना असहज महसूस करने लगता है।

बाजार की शक्ति भी इसी मनोविज्ञान पर आधारित होती है। किसी उत्पाद या सेवा को पहले सुविधा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। फिर उसे आकर्षक बनाया जाता है। उसके बाद वह जीवनशैली का हिस्सा बन जाती है। अंततः वह ऐसी आवश्यकता प्रतीत होने लगती है जिसके बिना जीवन अधूरा लगे। इस पूरी प्रक्रिया में उपभोक्ता स्वेच्छा से उस सेवा पर निर्भर हो जाता है और फिर उसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहता है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि सुविधा और आवश्यकता में अंतर होता है। आवश्यकता वह है जिसके बिना जीवन संभव नहीं है, जबकि सुविधा वह है जो जीवन को आसान बनाती है। लेकिन आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने इन दोनों के बीच की रेखा धुंधली कर दी है। परिणामस्वरूप अनेक सुविधाएँ अब आवश्यकताओं के रूप में देखी जाने लगी हैं।

इंटरनेट और सोशल मीडिया इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। यह सत्य है कि आज डिजिटल माध्यम शिक्षा, रोजगार, व्यापार और संचार के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इनके बिना आधुनिक जीवन की कल्पना कठिन है। लेकिन इनके उपयोग और इनके प्रति निर्भरता में अंतर है। उपयोग व्यक्ति को सक्षम बनाता है, जबकि निर्भरता उसे नियंत्रित करने लगती है।

मनुष्य की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह सुविधाओं का स्वामी बना रहे, उनका दास न बने। तकनीक का उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना है, जीवन पर अधिकार स्थापित करना नहीं। यदि कोई सुविधा व्यक्ति के निर्णयों, आदतों और समय पर नियंत्रण स्थापित करने लगे तो उसे पुनर्विचार की आवश्यकता है।

भारतीय समाज ने पिछले तीन दशकों में अभूतपूर्व परिवर्तन देखा है। टेलीफोन से मोबाइल तक, मोबाइल से स्मार्टफोन तक और स्मार्टफोन से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक की यात्रा अत्यंत तेज रही है। इस यात्रा ने अवसर भी दिए हैं और नई चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। एक ओर जानकारी तक पहुँच आसान हुई है, दूसरी ओर सूचना का अतिरेक और ध्यान भंग होने की समस्या भी बढ़ी है।

सबसे रोचक तथ्य यह है कि लोग अब सुविधाओं के बढ़ते खर्च को सामान्य मानने लगे हैं। बिजली का बिल, इंटरनेट का बिल, ओटीटी सदस्यता, क्लाउड स्टोरेज, डिजिटल सेवाओं के शुल्क और मोबाइल रिचार्ज, ये सब आधुनिक जीवन के नियमित खर्च बन चुके हैं। पहले जो खर्च असाधारण लगता था, वह आज सामान्य प्रतीत होता है। यही आदत की शक्ति है।

आदत का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। जब कोई सुविधा लंबे समय तक उपयोग में रहती है तो व्यक्ति उसे अपने जीवन स्तर का हिस्सा मानने लगता है। फिर उसका खर्च उसे बोझ नहीं लगता, बल्कि सामान्य आवश्यकता जैसा महसूस होता है। यही कारण है कि लोग अन्य खर्चों में कटौती कर सकते हैं, लेकिन इंटरनेट रिचार्ज या मोबाइल डेटा पर खर्च कम करने से बचते हैं।

वास्तव में आधुनिक मनुष्य दो दुनियाओं के बीच खड़ा है। एक दुनिया प्रकृति की है जहाँ जीवन के मूल तत्व निःशुल्क उपलब्ध हैं। दूसरी दुनिया बाज़ार की है जहाँ सुविधा, मनोरंजन और आधुनिक जीवनशैली की कीमत चुकानी पड़ती है। पहली दुनिया हमें जीवन देती है, जबकि दूसरी दुनिया हमें जीवन जीने के तरीके प्रदान करती है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य इन दोनों के बीच संतुलन खो देता है। यदि वह केवल प्राकृतिक जीवन की ओर लौटने की बात करे तो आधुनिक समाज की वास्तविकताओं से दूर हो जाएगा। और यदि वह केवल सुविधाओं पर निर्भर हो जाए तो अपनी स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता खो सकता है। इसलिए संतुलन ही सबसे उचित मार्ग है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक और सुविधाओं का उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करें। सोशल मीडिया का प्रयोग करें, लेकिन उसके गुलाम न बनें। इंटरनेट का लाभ उठाएँ, लेकिन अपने समय और ध्यान का नियंत्रण स्वयं रखें। आधुनिक सुविधाओं का आनंद लें, लेकिन यह याद रखें कि जीवन का आधार अभी भी वही प्रकृति है जिसने हमें जल, वायु और प्रकाश जैसे अमूल्य उपहार बिना किसी शुल्क के दिए हैं।

अंततः यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिक जीवन में अनेक प्रकार के आर्थिक बोझ अनिवार्य हो चुके हैं। यदि हम बिजली, इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क और अन्य सुविधाओं का लाभ लेते हैं तो उनकी कीमत भी चुकानी होगी। और शायद यही कारण है कि आज अधिकांश लोग यह सोचकर आगे बढ़ जाते हैं कि जब इतने सारे खर्च पहले से ही जीवन का हिस्सा हैं, तो फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल आदतों की कीमत भी सही। आखिरकार यह केवल रिचार्ज का खर्च नहीं, बल्कि उस जीवनशैली की कीमत है जिसे हमने स्वयं चुना है।

इस पूरी यात्रा में एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि सुविधाएँ जीवन को आसान बना सकती हैं, पर जीवन का आधार नहीं बन सकतीं। जीवन का वास्तविक आधार आज भी वही प्रकृति है जो बिना किसी शुल्क, बिना किसी रिचार्ज और बिना किसी शर्त के हमें जीने का अवसर देती है। यही ईश्वर की व्यवस्था है और यही मनुष्य की सीमाओं का सबसे बड़ा स्मरण भी।
————–

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!