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क्या संसद अब संवाद का मंच नहीं बल्कि टकराव का मैदान बनती जा रही है: चौरसिया

क्या संसद अब संवाद का मंच नहीं बल्कि टकराव का मैदान बनती जा रही है: चौरसिया

जनता के मुद्दों से दूर होती बहसें और राजनीतिक ध्रुवीकरण का बढ़ता असर

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा की भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक संसद को अक्सर “लोकतंत्र का मंदिर” कहा जाता है। यह वह मंच है जहां देश की नीतियों, कानूनों और राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर विमर्श होता है। संविधान निर्माताओं की कल्पना में संसद वह स्थान था जहां सरकार और विपक्ष दोनों मिलकर जनता के हित में संवाद करेंगे, बहस करेंगे और बेहतर नीतियों का निर्माण करेंगे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में संसद की कार्यवाही जिस तरह से हंगामे, विरोध और टकराव का केंद्र बनती जा रही है, उसने लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अक्सर ऐसा देखा जा रहा है कि सदन की कार्यवाही शुरू होते ही नारेबाजी, वेल में आकर विरोध और बार-बार स्थगन की स्थिति बन जाती है। नतीजा यह होता है कि कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं या फिर कई जरूरी मुद्दों पर सार्थक बहस ही नहीं हो पाती। यह स्थिति केवल एक राजनीतिक दल या सरकार की वजह से नहीं बनी है, बल्कि यह एक व्यापक राजनीतिक संस्कृति का परिणाम है जिसमें संवाद की जगह टकराव ने ले ली है।दरअसल, संसद में टकराव की राजनीति कोई बिल्कुल नई बात नहीं है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कई बार विपक्ष ने सरकार को घेरने के लिए विरोध का रास्ता अपनाया है और कई बार सरकारों ने भी विपक्ष को पर्याप्त अवसर नहीं दिया। लेकिन पहले विरोध और संवाद के बीच एक संतुलन बना रहता था। विपक्ष अपनी बात मजबूती से रखता था, लेकिन अंततः बहस के माध्यम से समाधान खोजने की कोशिश होती थी। आज स्थिति कुछ अलग दिखाई देती है। अब अक्सर ऐसा लगता है कि संसद में बहस से अधिक महत्व राजनीतिक संदेश देने को मिल गया है। टीवी कैमरों और सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक दल अपने समर्थकों को संदेश देने के लिए संसद के भीतर भी आक्रामक रणनीति अपनाते हैं। परिणामस्वरूप संसद की कार्यवाही का बड़ा हिस्सा हंगामे में निकल जाता है और लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता जाता है।

इस बदलती प्रवृत्ति के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है भारतीय राजनीति का बढ़ता ध्रुवीकरण। आज राजनीति में वैचारिक मतभेद पहले से कहीं अधिक तीखे हो गए हैं। सरकार और विपक्ष के बीच भरोसे का स्तर भी कम हुआ है। जब राजनीतिक दल एक-दूसरे को केवल प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि शत्रु की तरह देखने लगते हैं, तो संवाद की गुंजाइश कम हो जाती है। संसद में भी यही स्थिति दिखाई देती है। विपक्ष को लगता है कि सरकार उसकी बात सुनना नहीं चाहती, जबकि सरकार का मानना होता है कि विपक्ष केवल व्यवधान पैदा करने की राजनीति कर रहा है। इस अविश्वास के माहौल में स्वस्थ बहस की संभावना स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है।

दूसरा बड़ा कारण है चुनावी राजनीति का लगातार बढ़ता दबाव। भारत में लगभग हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। ऐसे में राजनीतिक दल हमेशा चुनावी मोड में रहते हैं। संसद के भीतर भी कई बार बहस का स्वर चुनावी भाषणों जैसा हो जाता है। राजनीतिक दल अपने समर्थकों को संदेश देने के लिए आक्रामक रुख अपनाते हैं और समझौते की राजनीति को कमजोरी के रूप में देखा जाने लगता है। यह प्रवृत्ति संसदीय लोकतंत्र की उस मूल भावना के विपरीत है जिसमें विभिन्न विचारों के बीच संवाद के जरिए सहमति बनाने की कोशिश की जाती है।

तीसरा कारण मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव भी है। आज संसद की कार्यवाही केवल सदन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि तुरंत टीवी चैनलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हो जाती है। राजनीतिक दल जानते हैं कि उनका हर कदम लाखों-करोड़ों लोग देख रहे हैं। ऐसे में कई बार राजनीतिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। नारेबाजी, पोस्टर दिखाना या वेल में आकर विरोध करना राजनीतिक दलों के लिए अपने समर्थकों को संदेश देने का तरीका बन जाता है। लेकिन इससे संसद की गंभीरता और गरिमा प्रभावित होती है।

इस स्थिति का सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होता है। संसद का मुख्य उद्देश्य कानून बनाना, सरकार को जवाबदेह बनाना और राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर बहस करना है। जब सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित होती है, तो इन उद्देश्यों पर असर पड़ता है। कई बार महत्वपूर्ण विधेयक बहुत कम समय में पारित हो जाते हैं क्योंकि उनके लिए पर्याप्त चर्चा का अवसर नहीं मिलता। इससे न केवल कानूनों की गुणवत्ता प्रभावित होती है बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी कमजोर होती है। दूसरी ओर, जनता के महत्वपूर्ण मुद्दे—जैसे महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि—संसद में अपेक्षित गंभीरता से चर्चा का विषय नहीं बन पाते।

संसद में बढ़ते टकराव का एक और असर यह भी है कि जनता के बीच लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास कमजोर हो सकता है। जब लोग बार-बार टीवी पर देखते हैं कि संसद में केवल हंगामा हो रहा है और कोई ठोस बहस नहीं हो रही, तो उन्हें यह महसूस हो सकता है कि उनके प्रतिनिधि अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वाह नहीं कर रहे हैं। लोकतंत्र में जनता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण पूंजी होती है। अगर यह विश्वास कमजोर होता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती पर भी असर पड़ सकता है।हालांकि यह भी सच है कि विरोध लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। विपक्ष का काम केवल सरकार का समर्थन करना नहीं बल्कि उसकी नीतियों की आलोचना करना और उसे जवाबदेह बनाना भी है। कई बार विरोध के बिना सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान नहीं देती। इसलिए यह कहना गलत होगा कि संसद में विरोध नहीं होना चाहिए। सवाल यह है कि विरोध का तरीका क्या हो और उसकी सीमा क्या हो। अगर विरोध इस हद तक बढ़ जाए कि सदन की कार्यवाही ही ठप हो जाए, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए नुकसानदेह बन जाता है।इस संदर्भ में सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे संसदीय परंपराओं का सम्मान करें। सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त अवसर दे और महत्वपूर्ण विधेयकों पर व्यापक चर्चा सुनिश्चित करे। दूसरी ओर, विपक्ष को भी यह समझना होगा कि लगातार हंगामा और व्यवधान पैदा करने से जनता के मुद्दों का समाधान नहीं होगा। संसद में बहस और संवाद के जरिए ही लोकतांत्रिक समाधान निकल सकते हैं।

चौरसिया ने कहा कि संसदीय समितियों की भूमिका को मजबूत करना भी इस समस्या का एक समाधान हो सकता है। समितियों में अक्सर अपेक्षाकृत शांत और गंभीर माहौल में विभिन्न दलों के सांसद मिलकर विधेयकों की समीक्षा करते हैं। अगर अधिक से अधिक विधेयकों को समितियों के पास भेजा जाए और उनकी सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाए, तो कानून निर्माण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और सहमति आधारित हो सकती है।इसके अलावा संसदीय आचरण के नियमों को भी सख्ती से लागू करने की जरूरत है। अगर कोई सांसद लगातार नियमों का उल्लंघन करता है और सदन की कार्यवाही में बाधा डालता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इससे यह संदेश जाएगा कि संसद की गरिमा और अनुशासन के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि संसद केवल राजनीतिक संघर्ष का मंच नहीं बल्कि लोकतांत्रिक समाधान का केंद्र भी है। यहां होने वाली बहसें देश की नीतियों और भविष्य को प्रभावित करती हैं। अगर संसद केवल टकराव का अखाड़ा बनकर रह जाए तो इसका नुकसान पूरे लोकतंत्र को होगा।

चौरसिया ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र की ताकत हमेशा से उसकी बहुलता और संवाद की परंपरा रही है। अलग-अलग विचारधाराओं के लोग संसद में बैठकर बहस करते रहे हैं और कई बार तीखे मतभेदों के बावजूद सहमति का रास्ता निकालते रहे हैं। यही परंपरा लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। आज जरूरत इस बात की है कि संसद फिर से उसी संवाद की संस्कृति की ओर लौटे जहां मतभेद हों लेकिन संवाद भी हो, आलोचना हो लेकिन समाधान की तलाश भी हो।अगर संसद में संवाद की जगह केवल टकराव ही रह जाएगा, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए यह समय सभी राजनीतिक दलों के लिए आत्ममंथन का है। उन्हें यह तय करना होगा कि वे संसद को लोकतांत्रिक विमर्श का मंच बनाए रखना चाहते हैं या उसे केवल राजनीतिक संघर्ष का अखाड़ा बनने देंगे। लोकतंत्र की मजबूती इसी पर निर्भर करती है कि संसद में शोर से ज्यादा संवाद की आवाज सुनाई दे।

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