*दिमागी नक्सल’ – विचारधारा, लोकतंत्र और असहमति के बीच खिंचती नई रेखा*
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, ::भारत में नक्सलवाद केवल एक राजनीतिक शब्द नहीं रहा है। यह देश के लिए लंबे समय तक हिंसा, असुरक्षा, विकास में बाधा और राज्य के सामने गंभीर चुनौती का पर्याय रहा है। दशकों तक सुरक्षा बलों, प्रशासन और आम नागरिकों ने नक्सली हिंसा का दंश झेला। समय के साथ सरकारों की सुरक्षा रणनीति, विकास योजनाओं और स्थानीय स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण नक्सलवाद का प्रभाव काफी सीमित हुआ है। ऐसे समय में जब देश नक्सलवाद के हिंसक अध्याय के कमजोर पड़ने को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देख रहा है, ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्द का सार्वजनिक विमर्श में प्रवेश स्वाभाविक रूप से बहस पैदा करता है। प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले की प्राचीर से इस शब्द का इस्तेमाल किए जाने के बाद इस पर राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक चर्चा और तेज हुई है। प्रश्न यह नहीं है कि नक्सली विचारधारा खतरनाक है या नहीं। हिंसक विचारधारा के लोकतांत्रिक समाज पर पड़ने वाले खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता। असली प्रश्न यह है कि किसे ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाएगा, किस आधार पर कहा जाएगा और असहमति तथा हिंसक विचारधारा के बीच सीमा कैसे निर्धारित होगी?
नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी क्षेत्र से हुई थी। भूमि, वर्ग संघर्ष और सामाजिक-आर्थिक असमानता के प्रश्नों से निकला यह आंदोलन आगे चलकर सशस्त्र क्रांति की विचारधारा में बदलता गया। समय के साथ इसके विभिन्न गुट बने और देश के अनेक आदिवासी एवं पिछड़े इलाकों में इसका प्रभाव बढ़ा। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कई क्षेत्रों में नक्सली हिंसा ने लंबे समय तक शासन और सामान्य जनजीवन को प्रभावित किया। सुरक्षा बलों पर हमले, नागरिकों की हत्या, सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना और विकास कार्यों में बाधा जैसी घटनाओं ने नक्सलवाद को केवल वैचारिक आंदोलन नहीं रहने दिया। जहां विचार की जगह बंदूक ले लेती है, वहां लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट पैदा होता है। इसलिए नक्सलवाद के हिंसक स्वरूप का अंत होना निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। लेकिन हिंसा के विरुद्ध संघर्ष और विचारों के विरुद्ध संघर्ष को एक ही मान लेना लोकतांत्रिक समाज के लिए नई जटिलताएं पैदा कर सकता है।
‘दिमागी नक्सल’ कोई स्थापित संवैधानिक, कानूनी या न्यायिक श्रेणी नहीं है। यह मूलतः एक राजनीतिक-विचारात्मक है, जिसका इस्तेमाल उन लोगों के संदर्भ में किया जा सकता है जिन पर नक्सली या माओवादी विचारधारा के प्रति बौद्धिक सहानुभूति रखने अथवा उसे वैचारिक समर्थन देने का आरोप लगाया जाता है। लेकिन यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न उठता है कि विचारधारा से सहमति और हिंसा में भागीदारी क्या एक ही बात है? किसी विश्वविद्यालय में कोई छात्र राज्य की नीति का विरोध करता है, कोई बुद्धिजीवी सरकार की आलोचना करता है, कोई लेखक आदिवासियों के अधिकारों की बात करता है या कोई सामाजिक कार्यकर्ता सुरक्षा अभियानों के तौर-तरीकों पर प्रश्न उठाता है, तो क्या उसे स्वतः किसी हिंसक विचारधारा का समर्थक मान लिया जाना चाहिए? इसका उत्तर लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्पष्ट होना चाहिए या नहीं। असहमति लोकतंत्र का विरोध नहीं है, बल्कि उसकी अनिवार्य शर्त है।
भारत के विश्वविद्यालय हमेशा से राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल और उसके बाद के दौर तक छात्रों ने विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों में भाग लिया है। छात्र आंदोलनों में नाराजगी, आदर्शवाद, उग्र भाषा और राजनीतिक विचारों का होना असामान्य नहीं है। युवा अक्सर स्थापित व्यवस्था से प्रश्न करते हैं। यही प्रश्न समाज को बदलने की ऊर्जा भी प्रदान करते हैं। लेकिन यदि किसी छात्र आंदोलन में हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, अलगाववादी गतिविधियों या प्रतिबंधित संगठनों से वास्तविक संबंध के प्रमाण मिलते हैं, तो कानून अपना काम करे। दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब जांच और प्रमाण की जगह केवल लेबल इस्तेमाल होने लगे। किसी आंदोलन को ‘देशद्रोही’, ‘नक्सली’ या ‘दिमागी नक्सल’ कह देना आसान है, लेकिन उसके कारणों को समझना कठिन है। लोकतंत्र कठिन रास्ता चुनने का नाम है, क्योंकि वह संवाद, प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रिया का रास्ता है।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि बुद्धिजीवी समाज में किसी हिंसक विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग नहीं हो सकते हैं। इतिहास बताता है कि दुनिया की अनेक हिंसक राजनीतिक विचारधाराओं को बौद्धिक समर्थन मिला है। भारत में भी विभिन्न दौरों में माओवादी विचारधारा के समर्थक या सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवियों पर बहस होती रही है। इसलिए इस संभावना को केवल ‘राजनीतिक जुमला’ कहकर खारिज करना भी सही नहीं होगा। किसी विचारधारा की वास्तविक शक्ति केवल उसके हथियारबंद कैडर में नहीं होती है। विचार, साहित्य, प्रचार, संगठन और वैचारिक नेटवर्क भी किसी आंदोलन को लंबे समय तक जीवित रख सकते हैं। यही कारण है कि हिंसक विचारधारा का मुकाबला केवल बंदूक से नहीं किया जा सकता। उसके वैचारिक आधार को भी समझना होगा।
यहीं लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है। भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। साथ ही यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है। हिंसा के लिए उकसाना, आतंकवादी या प्रतिबंधित गतिविधियों में सहयोग करना, आपराधिक षड्यंत्र और वास्तविक हिंसक गतिविधियां कानून के दायरे में आती हैं। इसलिए दो सीमाओं को स्पष्ट रखना जरूरी है। पहली सीमा है विचार और आलोचना। सरकार, व्यवस्था, आर्थिक नीतियों, पुलिस कार्रवाई या सामाजिक असमानता की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है। दूसरी सीमा है हिंसा और आपराधिक सहयोग। यदि कोई व्यक्ति हिंसक संगठन के लिए धन जुटाता है, हथियार उपलब्ध कराता है, हिंसा की योजना में भाग लेता है या प्रतिबंधित संगठन की आपराधिक गतिविधियों में सक्रिय सहयोग करता है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इन दोनों को मिला देना लोकतंत्र को कमजोर करेगा।
‘दिमागी नक्सल’ शब्द की सबसे बड़ी समस्या इसकी परिभाषा और सीमा है। यदि इसका अर्थ उन लोगों से है जो हिंसक माओवादी संगठनों की विचारधारा को स्वीकार करते हैं और उनकी हिंसक गतिविधियों का समर्थन या सहयोग करते हैं, तो इस पर गंभीर बहस की जा सकती है। लेकिन यदि इसका इस्तेमाल सरकार की आलोचना करने वाले प्रत्येक छात्र, शिक्षक, पत्रकार, लेखक या सामाजिक कार्यकर्ता के लिए किया जाने लगे, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरनाक होगा। किसी लोकतंत्र में असहमति को देशद्रोह से जोड़ना आसान होता है लेकिन घातक प्रवृत्ति है। इससे समाज में भय पैदा होता है और लोग अपने विचार व्यक्त करने से बचने लगते हैं। लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती है कि सरकार की कितनी प्रशंसा हो रही है। बल्कि इससे मापी जाती है कि सरकार की आलोचना करने वाले व्यक्ति को कितनी सुरक्षा और स्वतंत्रता प्राप्त है।
भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे हजारों लोग रहे हैं जिन्होंने सरकारों का विरोध किया, गिरफ्तारियां दीं, लाठियां खाई और जेल गए। हर विरोधी को देशद्रोही नहीं कहा गया। स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं सत्ता के विरुद्ध असहमति का विशाल उदाहरण था। लोकतांत्रिक भारत में भी अलग-अलग विचारधाराओं के लोग आंदोलनों में शामिल हुए। इसलिए आज के छात्र या नागरिक के विरोध को समझने के लिए उसके विचारों, उद्देश्यों और तरीकों की जांच जरूरी है। विरोध करना और हिंसा करना दो अलग बातें हैं। इसी तरह सरकार की आलोचना करना और देश का विरोध करना भी एक बात नहीं है। देश और सरकार को एक मान लेना लोकतांत्रिक सोच की सबसे बड़ी भूलों में से एक हो सकती है।
यदि भारत वास्तव में नक्सलवाद से स्थायी मुक्ति चाहता है, तो सुरक्षा अभियान के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय भी जरूरी है। जहां आदिवासी समुदायों को भूमि, वन, जल और आजीविका से जुड़े अधिकारों की चिंता है, वहां केवल पुलिस की उपस्थिति पर्याप्त नहीं होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार, न्याय और प्रशासनिक संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक हैं। किसी भी हिंसक विचारधारा की जमीन वहां तैयार होती है जहां लोगों को लगता है कि व्यवस्था उनकी बात नहीं सुनती। इसलिए नक्सलवाद के खिलाफ अंतिम जीत का अर्थ केवल हथियारबंद कैडर की संख्या कम होना नहीं है। वास्तविक सफलता तब होगी जब उन परिस्थितियों को भी कमजोर किया जाए जिनका इस्तेमाल हिंसक विचारधाराएं अपना आधार बनाने के लिए करती हैं।
आज देश के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर हिंसक विचारधाराओं से कठोरता से निपटना है, दूसरी ओर लोकतांत्रिक असहमति को सुरक्षित रखना है। इन दोनों के बीच संतुलन आसान नहीं है, लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि वह कठिन सवालों का समाधान संवाद से खोजता है। विश्वविद्यालयों में बहस होनी चाहिए। सरकार की नीतियों पर प्रश्न होने चाहिए। सुरक्षा अभियानों पर चर्चा होनी चाहिए। आदिवासी अधिकारों पर विमर्श होना चाहिए। आर्थिक असमानता पर सवाल उठने चाहिए। लेकिन हिंसा को वैचारिक रोमांस में बदलने की अनुमति भी नहीं होनी चाहिए।
हिंसक विचारधारा का स्थायी मुकाबला केवल दमन से नहीं किया जा सकता। विचार का जवाब विचार से देना होगा। यदि कोई युवा नक्सली विचारधारा की ओर आकर्षित होता है तो यह पूछना जरूरी है कि उसे उस विचार में क्या दिखाई देता है कि सामाजिक न्याय, समानता, व्यवस्था-विरोध या कोई दूसरा आकर्षण? यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था उन प्रश्नों का बेहतर उत्तर देती है तो हिंसक विचारधारा की जमीन स्वतः कमजोर होगी। इसलिए विश्वविद्यालयों और समाज में वैचारिक बहस को बंद करने के बजाय उसे मजबूत किया जाना चाहिए।
‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों पर बहस करते समय सबसे जरूरी सिद्धांत होना चाहिए कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके लेबल से नहीं, उसके कार्यों और प्रमाणों से तय हो। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप हैं तो जांच हो। प्रमाण हों तो कानून के तहत कार्रवाई हो। अदालत में मामला जाए और दोष सिद्ध होने पर सजा मिले। लेकिन केवल राजनीतिक मतभेद को आपराधिक या देशविरोधी गतिविधि का प्रमाण मान लेना न्याय की भावना के विपरीत होगा। लोकतंत्र में किसी पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसे सिद्ध करना कठिन और आवश्यक है।
आज ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर बहस हो रही है। यह बहस केवल एक शब्द की बहस नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि भारत अपने लोकतंत्र को किस तरह देखता है। क्या हिंसक विचारधाराओं के खिलाफ कठोर रह सकते हैं और फिर भी असहमति के अधिकार की रक्षा कर सकते हैं? क्या विश्वविद्यालयों में उग्र विचारों पर बहस कर सकते हैं और साथ ही हिंसा को अस्वीकार कर सकते हैं? क्या सरकार की आलोचना को देश की आलोचना से अलग रख सकते हैं? इन सवालों का उत्तर ‘हां’ होना चाहिए। क्योंकि भारत की ताकत उसकी विविधता और बहस की परंपरा में है। नक्सलवाद की हिंसक चुनौती से देश ने लंबी लड़ाई लड़ी है। अब यदि उसके वैचारिक प्रभावों से भी मुकाबला करना है तो वह मुकाबला तर्क, शिक्षा, विकास, न्याय और लोकतांत्रिक संवाद से होना चाहिए। हिंसा के समर्थकों के लिए कानून कठोर हो, लेकिन असहमति रखने वालों के लिए लोकतंत्र के दरवाजे खुले रहे। यही अंतर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र और एक वैचारिक रूप से असहिष्णु व्यवस्था के बीच रेखा खींचता है। अंततः सवाल यह नहीं कि किसी को ‘दिमागी नक्सल’ कहा गया या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भारत अपने नागरिकों को बिना भय के प्रश्न पूछने, असहमति व्यक्त करने और फिर भी राष्ट्र की लोकतांत्रिक मुख्यधारा में बने रहने का अधिकार दे सकता है? यदि इसका उत्तर हां है, तो नक्सलवाद जैसी हिंसक विचारधारा का मुकाबला भी अधिक मजबूती से किया जा सकेगा और लोकतंत्र भी अधिक परिपक्व होगा।
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