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• बिहार में भाजपा का ‘पहला शिखर’: सम्राट चौधरी के कंधों पर इतिहास, विरासत और परीक्षा

• नींव कैलाशपति मिश्र की, पहचान सुशील मोदी की—क्या उस विरासत को नई ऊंचाई देंगे सम्राट?
• 21 सीटों से मुख्यमंत्री तक का सफर—अब संगठन की जीत को शासन की कसौटी पर कसने का समय— वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/बिहार की राजनीति में यह क्षण केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक राजनीतिक यात्रा के पड़ाव का संकेत है। भारतीय जनता पार्टी, जो दशकों तक राज्य की राजनीति में सहयोगी की भूमिका में रही, आज पहली बार मुख्यमंत्री पद तक पहुंची है। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना एक व्यक्ति विशेष की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सामूहिक राजनीतिक साधना का परिणाम है, जिसकी शुरुआत आज से चार दशक पहले हुई थी।

इस उपलब्धि को समझने के लिए वर्तमान की चमक से आगे जाकर अतीत की धूल भरी पगडंडियों को देखना होगा, जहां संघर्ष, असफलता, धैर्य और रणनीति के कई अध्याय लिखे गए।

• संघर्ष की जड़ें: जब जमीन भी अपनी नहीं थी
बिहार में भाजपा का इतिहास भारतीय जनसंघ के दौर से शुरू होता है, लेकिन 1980 में पार्टी के गठन के बाद इसका असली राजनीतिक संघर्ष शुरू हुआ। उस समय कांग्रेस का वर्चस्व था और विपक्ष के लिए जगह बेहद सीमित।

इसी कठिन समय में एक नेता ने संगठन को खड़ा करने का बीड़ा उठाया—
कैलाशपति मिश्र: उन्हें यूं ही “भीष्म पितामह” नहीं कहा जाता। उन्होंने उस दौर में पार्टी को जमीनी स्तर पर स्थापित किया, जब चुनाव जीतना दूर, चुनाव लड़ना भी चुनौतीपूर्ण था। 1980 में 21 सीटों की जीत और 1985 में गिरकर 16 सीटों तक पहुंच जाना बताता है कि भाजपा के लिए बिहार कितनी कठिन जमीन थी।

लेकिन राजनीति में धैर्य ही सबसे बड़ा निवेश होता है। कैलाशपति मिश्र ने यही निवेश किया—कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा किया, विचारधारा को जमीन से जोड़ा और संगठन को टिकाऊ बनाया।

• सामाजिक राजनीति का दौर और भाजपा की तलाश
1990 का दशक बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय के उभार का दौर था।लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में एक नई राजनीतिक धारा बनी, जिसने पारंपरिक सत्ता संरचना को चुनौती दी।
इस दौर में भाजपा के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं था। फिर भी 1990 में 39 और 1995 में 41 सीटों की जीत ने संकेत दिया कि पार्टी अब हाशिए से बाहर निकल रही है।
यह वह समय था जब भाजपा ने सामाजिक समीकरणों को समझना शुरू किया और अपनी रणनीति को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालना सीखा।

• सुशील मोदी: संघर्ष से विश्वसनीयता तक

बिहार में भाजपा की राजनीतिक पहचान अगर किसी एक नेता के इर्द-गिर्द बनी, तो वह हैं—
सुशील कुमार मोदी : उन्होंने विपक्ष में रहते हुए न केवल सरकार को चुनौती दी, बल्कि भाजपा को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित किया। 2000 के चुनाव में 67 सीटों की जीत इसी रणनीतिक मेहनत का परिणाम थी।

सुशील मोदी की खासियत यह रही कि उन्होंने आक्रामक राजनीति और संतुलित व्यवहार का ऐसा मिश्रण पेश किया, जिसने उन्हें विरोधियों के बीच भी स्वीकार्य बनाया।

• गठबंधन की राजनीति: सत्ता का पहला स्वाद
नीतीश कुमार के साथ भाजपा का गठबंधन बिहार की राजनीति में निर्णायक मोड़ साबित हुआ। 2005 में सत्ता परिवर्तन के साथ भाजपा पहली बार सरकार का हिस्सा बनी। हालांकि मुख्यमंत्री जदयू का था, लेकिन भाजपा ने सत्ता संचालन की प्रक्रिया को करीब से समझा।

2010 में 91 सीटों की जीत ने यह साबित कर दिया कि भाजपा अब केवल सहयोगी नहीं, बल्कि सत्ता की केंद्रीय धुरी बनने की क्षमता रखती है। यह वह दौर था जब भाजपा ने संगठनात्मक ताकत को प्रशासनिक अनुभव से जोड़ना शुरू किया।

• टूटन, चुनौती और पुनर्निर्माण
2013 में गठबंधन टूटना भाजपा के लिए बड़ा झटका था। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व के उभार के साथ राज्य की राजनीति में समीकरण बदल गए।

2015 के चुनाव में भाजपा 53 सीटों पर सिमट गई। यह हार केवल चुनावी नहीं, बल्कि रणनीतिक भी थी। लेकिन यही हार आगे की जीत की जमीन बनी।
राजनीति में पराजय अक्सर आत्ममंथन का अवसर देती है। भाजपा ने इस अवसर का उपयोग किया—संगठन को फिर से मजबूत किया, नए चेहरे सामने लाए और अपनी रणनीति को पुनर्परिभाषित किया।

• वापसी: बदली हुई भाजपा
2017 में नीतीश कुमार की वापसी के साथ भाजपा फिर सत्ता में आई। 2020 के चुनाव में 74 सीटों की जीत ने यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी अब बिहार में स्थायी ताकत बन चुकी है।यह वह समय था जब भाजपा ने “सहयोगी” से “नेतृत्वकर्ता” बनने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाया।

• सम्राट चौधरी: नई राजनीति का चेहरा
सम्राट चौधरी का उदय इसी बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का परिणाम है। कम समय में उन्होंने जिस तेजी से अपनी पहचान बनाई, वह भाजपा की नई रणनीति को दर्शाता है—जहां अनुभव और युवा ऊर्जा का संतुलन है। 2025 के चुनाव में 89 सीटों की सफलता ने यह साबित कर दिया कि भाजपा अब बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

• विरासत और जिम्मेदारी
सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे उस विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं, जिसे कई पीढ़ियों ने मिलकर बनाया है।

कैलाशपति मिश्र ने संगठन दिया, सुशील मोदी ने पहचान दी, नीतीश कुमार ने शासन का अनुभव दिया अब सम्राट चौधरी के सामने इन तीनों को एक साथ साधने की चुनौती है।

• सत्ता बनाम संगठन: असली परीक्षा
राजनीति में चुनाव जीतना एक पड़ाव है, लेकिन असली परीक्षा शासन में होती है।सम्राट चौधरी को यह साबित करना होगा कि भाजपा केवल चुनाव जीतने वाली मशीन नहीं, बल्कि शासन देने वाली पार्टी भी है।बिहार जैसे जटिल सामाजिक और आर्थिक ढांचे वाले राज्य में यह चुनौती और भी बड़ी हो जाती है।

• निष्कर्ष: इतिहास से भविष्य की ओर
बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन इतिहास केवल उपलब्धियों से नहीं बनता—उसे निरंतरता और स्थिरता की जरूरत होती है।सम्राट चौधरी के नेतृत्व में भाजपा को अब यह साबित करना होगा कि वह इस उपलब्धि को स्थायी बना सकती है।

यह केवल एक राजनीतिक प्रयोग नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत भी हो सकती है—जहां संगठन, विचारधारा और शासन का संतुलन हो। बिहार की राजनीति ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। हर दौर में नए चेहरे आए, नई उम्मीदें जगीं और नई चुनौतियां सामने आईं।आज सम्राट चौधरी के सामने वही क्षण है—जहां इतिहास उनके साथ खड़ा है, लेकिन भविष्य उनकी परीक्षा लेने को तैयार है। सवाल यह नहीं कि भाजपा ने मुख्यमंत्री बना लिया, सवाल यह है कि क्या वह बिहार को नई दिशा दे पाएगी।

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