• बिश्केक से शांति का शंखनाद: युद्ध के दौर में मोदी का ‘शांति मंत्र’ और भारत की कूटनीतिक स्वायत्तता
• यूरेशिया की कूटनीतिक धुरी पर भारत का उदय

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया/पटना। वैश्विक राजनीति के सबसे जटिल और तनावपूर्ण दौर में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित 26वां शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन वैश्विक कूटनीति का नया केंद्र बनकर उभरा है। जब पूरी दुनिया दो ध्रुवों—एक तरफ अमेरिका और यूरोपीय देशों का पश्चिमी ब्लॉक और दूसरी तरफ रूस-चीन-ईरान का यूरेशियाई ब्लॉक—में बंटी नजर आ रही है, तब भारत ने एक बार फिर मध्य एशिया के इस ऐतिहासिक मंच से अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का लोहा मनवाया है। सम्मेलन के इतर, दुनिया की निगाहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई द्विपक्षीय मुलाकात पर टिकी थीं। ऐसे माहौल में, जब ब्लैक सी (यूक्रेन) और पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के संघर्षों ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को हिलाकर रख दिया है, भारत के प्रधानमंत्री का यह बयान कि “यह अंतहीन युद्ध का नहीं बल्कि अंत का समय है”, वैश्विक शांति के लिए एक नया विज़न दस्तावेज बन गया है।
“यह अंतहीन युद्ध का समय नहीं है”: वैश्विक संघर्षों पर भारत का दोटूक
बिश्केक में पीएम मोदी ने राष्ट्रपति पुतिन के सामने अत्यंत गरिमापूर्ण और दृढ़ शब्दों में कहा कि दुनिया को अब लंबे समय से खिंच रहे संघर्षों से आगे बढ़ना होगा। यह बयान साल 2022 के समरकंद शिखर सम्मेलन में दिए गए उनके ऐतिहासिक बयान (“यह युद्ध का युग नहीं है”) का ही एक अधिक गंभीर और सामयिक विस्तार है।
इस संदेश के पीछे भारत की कूटनीति के कई गहरे निहितार्थ छिपे हैं:
• संवाद और कूटनीति ही एकमात्र विकल्प: भारत ने साफ कर दिया है कि किसी भी युद्ध या वैश्विक संकट का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि केवल संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है।
• मानवता का हित सर्वोपरि: अंतहीन युद्ध केवल दो देशों का नुकसान नहीं करते, बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा, ईंधन आपूर्ति और समुद्री व्यापार को भी बाधित करते हैं। ब्लैक सी और पश्चिम एशिया के संकट के कारण भारतीय नाविकों की सुरक्षा और व्यापारिक जहाजों पर आए खतरों को भारत ने वैश्विक मंच पर प्रमुखता से उठाया है।
• परम मित्र से खरी बात: रूस भारत का सबसे पुराना, समय की कसौटी पर परखा हुआ और विशेष रणनीतिक भागीदार है। पुतिन जैसे शक्तिशाली नेता के सामने खड़े होकर शांति की वकालत करना यह दिखाता है कि भारत एक ऐसा सच्चा मित्र है जो संकट के समय सही और निष्पक्ष सलाह देने का साहस रखता है। इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने ‘केवल सच’ से बातचीत करते हुए कहा कि, “पुतिन के सामने भारत का यह शांति संदेश केवल एक बयान नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति में भारत की बढ़ती साख और नैतिक साहस का प्रतीक है।”
• आतंकवाद के खिलाफ ‘नो डबल स्टैंडर्ड्स’: पाकिस्तान और चीन को सीधा संदेश
शंघाई सहयोग संगठन एक ऐसा मंच है जहाँ भारत के साथ-साथ चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश भी मौजूद हैं। इस मंच का उपयोग करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्रीय सुरक्षा के सबसे बड़े नासूर—आतंकवाद—पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि शंघाई सहयोग संगठन देशों को एकजुट होकर “आतंकवाद के पूरे इकोसिस्टम और इसके वित्तपोषण को नेस्तनाबूत करना होगा।”
इस कड़े संदेश के कूटनीतिक मायने इस प्रकार हैं:
• दोहरे मापदंडों का अंत: भारत का यह प्रहार सीधे तौर पर ‘डबल स्टैंडर्ड्स’ यानी आतंकवाद पर दोहरी नीति अपनाने वाले देशों पर था। चीन अक्सर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी आतंकवादियों को ब्लैकलिस्ट होने से बचाता आया है। भारत ने शंघाई सहयोग संगठन के मंच से चीन की इस नीति को कटघरे में खड़ा किया है।
• क्षेत्रीय स्थिरता की शर्त: भारत का रुख स्पष्ट है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद पर पूरी तरह से लगाम नहीं लगाई जाती, तब तक मध्य एशिया और यूरेशिया में व्यापार, आर्थिक कनेक्टिविटी और ऊर्जा सहयोग की बातें बेमानी हैं।
• भारत का ‘बैलेंसिंग एक्ट’: पश्चिम और यूरेशिया के बीच सेतु
बिश्केक समिट में भारत की भागीदारी यह दर्शाती है कि नई दिल्ली आज वैश्विक भू-राजनीति में ‘बैलेंसिंग व्हील’ (संतुलन चक्र) की भूमिका निभा रही है। एक तरफ भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ ‘क्वाड’ जैसे सुरक्षा संगठनों में शामिल है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए बना है। वहीं दूसरी तरफ, भारत शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे संगठनों का भी संस्थापक और सक्रिय सदस्य है, जिन्हें अक्सर पश्चिम-विरोधी ब्लॉक के रूप में देखा जाता है।
यह संतुलन भारत की कूटनीतिक परिपक्वता को दिखाता है:
• स्वतंत्र विदेश नीति: भारत किसी भी वैश्विक गुट या खेमे का हिस्सा नहीं बनना चाहता। भारत के हित जहाँ देश की 140 करोड़ जनता और वैश्विक कल्याण से जुड़ते हैं, भारत उसी नीति पर चलता है। इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने ‘केवल सच’ से बातचीत करते हुए कहा कि, “बिश्केक में पीएम मोदी का यह रुख साफ करता है कि भारत अब किसी महाशक्ति के दबाव में काम करने वाला देश नहीं है, बल्कि वह खुद वैश्विक एजेंडा तय करने वाली एक स्वतंत्र कूटनीतिक ताकत बन चुका है।”
• रूस से अटूट आर्थिक रिश्ते: पश्चिमी देशों के तमाम प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद भारत ने रूस से अपनी रक्षा और ऊर्जा साझेदारी (सस्ता कच्चा तेल और उर्वरक आपूर्ति) को न केवल बनाए रखा, बल्कि उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। बिश्केक में दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार, अंतरिक्ष, मोबिलिटी और ऊर्जा सहयोग की प्रगति की समीक्षा की।
• आगामी ब्रिक्स समिट की तैयारी: पीएम मोदी ने राष्ट्रपति पुतिन को 12-13 सितंबर 2026 को भारत में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया है। यह दिखाता है कि भारत वैश्विक कूटनीति के एजेंडे को खुद तय कर रहा है।
• मध्य एशिया में भारत का विज़न: ‘सिक्योर’ और कनेक्टिविटी
शंघाई सहयोग संगठन समिट के दौरान भारत ने मध्य एशियाई देशों के साथ अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने पर भी विशेष बल दिया। पीएम मोदी के ‘ सिक्योर ‘ विज़न (एस – सिक्योरिटी, ई – इकनॉमिक कॉर्पोरेशन, सी – कनेक्टिविटी, यू – यूनिटी, आर – रिस्पेक्ट फॉर सॉवरेनेटीज़ी, ई – एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन) के तहत भारत मध्य एशिया को अपने विस्तारित पड़ोस के रूप में देखता है।
भारत चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे के माध्यम से मध्य एशिया के लैंडलॉक्ड (भूमि से घिरे) देशों को समुद्र तक सीधी पहुंच देना चाहता है। हालांकि, भारत का यह भी मानना है कि कनेक्टिविटी की कोई भी परियोजना संबंधित देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने वाली होनी चाहिए—यह सीधे तौर पर चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के तहत देशों को कर्ज के जाल में फंसाने की नीति पर एक कूटनीतिक प्रहार है।
• निष्कर्ष: ‘विश्वमित्र’ के रूप में वैश्विक मंच पर भारत की अपरिहार्यता
बिश्केक में आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि आज के दौर में भारत वैश्विक राजनीति का एक ऐसा अनिवार्य स्तंभ बन चुका है, जिसके बिना दुनिया के किसी भी बड़े संकट पर चर्चा अधूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह रूस के साथ अपनी विशेष दोस्ती का सम्मान करते हुए भी वैश्विक मंच से शांति, संवाद और आतंकवाद के खात्मे की पुरजोर वकालत की है, वह भारत की न्यायप्रिय और संतुलित कूटनीति का सबसे बड़ा प्रमाण है।
ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की आवाज बनकर उभर रहा भारत आज दुनिया के सामने एक ‘विश्वमित्र’ की भूमिका में है। युद्ध, हिंसा और ध्रुवीकरण से त्रस्त इस इक्कीसवीं सदी की दुनिया को आज किसी भी सैन्य गुटबाजी की नहीं, बल्कि भारत द्वारा दिखाए गए इसी संतुलन, संवाद और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) के मार्ग की सबसे ज्यादा जरूरत है। बिश्केक से उठी शांति की यह गूंज आने वाले दिनों में वैश्विक कूटनीति की दिशा और दशा तय करने में मील का पत्थर साबित होगी।


