परिसीमन 2026: क्या भारत का राजनीतिक नक्शा बदल जाएगा, और क्यों यह विषय अत्यंत संवेदनशील है?

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया/भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2026 एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ साबित होने जा रहा है। देश में ‘परिसीमन’ की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। सरल शब्दों में कहें तो, देश की आबादी के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं को दोबारा तय करने की प्रक्रिया को ही परिसीमन कहा जाता है। यह कोई साधारण प्रशासनिक कार्य नहीं है, बल्कि यह वह प्रक्रिया है जो सीधे तौर पर तय करती है कि संसद में किस राज्य की कितनी आवाज होगी, किस क्षेत्र का कितना राजनीतिक दबदबा होगा और आपके एक वोट की कीमत क्या होगी।
आम जनता के लिए यह उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल है, प्रतियोगी छात्रों के लिए यह भारतीय संविधान और शासन व्यवस्था का एक अनिवार्य अध्याय है, और विशेषज्ञों के लिए यह देश के संघीय ढांचे की सबसे बड़ी परीक्षा है। आइए, इस पूरे विषय को इसके इतिहास, वर्तमान विवाद और भविष्य के असर के साथ गहराई से समझते हैं।
• परिसीमन का संवैधानिक इतिहास और 2026 में इसके अचानक चर्चा में आने का मुख्य कारण
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत यह प्रावधान है कि प्रत्येक जनगणना के बाद केंद्र सरकार द्वारा एक परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। इस आयोग का मुख्य कार्य जनसंख्या के संतुलन के आधार पर चुनावी क्षेत्रों का निर्धारण करना होता है, ताकि देश के हर नागरिक को समान प्रतिनिधित्व मिल सके। सिद्धांत यह है कि प्रत्येक सांसद लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करे।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है:
• प्रथम परिसीमन आयोग: 1952
• द्वितीय परिसीमन आयोग: 1963
• तृतीय परिसीमन आयोग: 1973
• चतुर्थ परिसीमन आयोग: 2002
• सीटों पर रोक की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1971 की जनगणना के बाद जब परिसीमन हुआ, तब यह महसूस किया गया कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के सरकारी कार्यक्रमों को मुस्तैदी से लागू किया (विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों ने), उनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम हो गई। इसके विपरीत, उत्तर भारत के राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ती रही। अगर आबादी के अनुपात में सीटें बढ़ाई जातीं, तो जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की संसद में सीटें कम हो जातीं और उन्हें एक तरह से “अच्छा काम करने की सजा” मिलती।
इस विसंगति को रोकने के लिए, इंदिरा गांधी सरकार ने 42वें संविधान संशोधन (1976) के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या को वर्ष 2000 तक के लिए फ्रीज (स्थिर) कर दिया। बाद में, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 84वें संविधान संशोधन (2001) के माध्यम से इस रोक को अगले 25 वर्षों के लिए यानी वर्ष 2026 तक बढ़ा दिया। अब चूंकि वह समय सीमा आ चुकी है, इसलिए परिसीमन का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है।
• नए संसद भवन की क्षमता और संकेत
दिल्ली में निर्मित भारत का नया संसद भवन इस बात का स्पष्ट भौतिक संकेत है कि भविष्य में सीटों की संख्या बढ़ने वाली है। पुराने संसद भवन में बैठने की जगह सीमित थी, जबकि नए लोकसभा कक्ष को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि इसमें 888 सदस्य एक साथ बैठ सकते हैं। यह इस बात का साफ इशारा है कि सरकार आगामी परिसीमन के माध्यम से संसद के आकार को बड़ा करने की तैयारी में है।
• उत्तर बनाम दक्षिण का राजनीतिक टकराव और भारतीय संघवाद के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियां
परिसीमन 2026 कोई साधारण गणितीय प्रक्रिया नहीं है; यह एक गहरा राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक मुद्दा बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगामी परिसीमन पूरी तरह से केवल और केवल जनसंख्या के मौजूदा आंकड़ों पर आधारित रहा, तो भारत के राजनीतिक मानचित्र में एक बहुत बड़ा असंतुलन पैदा हो जाएगा। इसे हम मुख्यतः तीन बड़ी चुनौतियों के रूप में देख सकते हैं।
1. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का गंभीर असंतुलन
विभिन्न शोध संस्थानों और सांख्यिकीय अनुमानों के अनुसार, यदि लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 848 या उससे अधिक किया जाता है, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों की सीटों में भारी उछाल आएगा। अकेला उत्तर प्रदेश 140 से अधिक सीटों के साथ संसद का सबसे शक्तिशाली राज्य बन सकता है।
दूसरी ओर, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटों में मामूली वृद्धि होगी या अनुपात के मामले में उनका हिस्सा घट जाएगा। उदाहरण के लिए, वर्तमान में केरल और उत्तर प्रदेश की सीटों का जो अनुपात है, वह भविष्य में उत्तर प्रदेश के पक्ष में बेहद झुक जाएगा।
• उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश की वर्तमान लोकसभा सीटें 80 हैं, जो आबादी के आधार पर भविष्य में बढ़कर लगभग 140 या उससे अधिक हो सकती हैं।
• बिहार: बिहार की वर्तमान लोकसभा सीटें 40 हैं, जिनके बढ़कर लगभग 75 या उससे अधिक होने का अनुमान है।
• तमिलनाडु: दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य की वर्तमान लोकसभा सीटें 39 हैं, जिनमें बहुत मामूली बढ़त होगी और यह लगभग 50 के आसपास पहुंच सकती हैं।
• केरल: केरल राज्य की वर्तमान लोकसभा सीटें 20 हैं, और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन काम करने के कारण इसकी सीटें भविष्य में भी लगभग 20 से 22 के बीच ही सीमित रह सकती हैं।
2. ‘सहकारी संघवाद’ पर चोट
दक्षिण भारतीय राज्यों का तर्क है कि उन्होंने बीते दशकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और आर्थिक नीतियों के दम पर अपनी जनसंख्या वृद्धि दर को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और टैक्स राजस्व में भी इन राज्यों का योगदान उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है। ऐसे में, यदि जनसंख्या के आधार पर उनकी राजनीतिक ताकत को कम कर दिया गया, तो यह भारतीय संघवाद की मूल भावना के खिलाफ होगा। कोई भी राज्य यह स्वीकार नहीं करना चाहेगा कि बेहतर प्रदर्शन करने के बदले देश की केंद्रीय सत्ता की चाबी से उसका हक कम हो जाए।
3. महिला आरक्षण विधेयक का पेंच
संसद द्वारा पारित ऐतिहासिक महिला आरक्षण विधेयक, जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने की गारंटी देता है, कानूनी रूप से परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। कानून के अनुसार, महिला आरक्षण तभी लागू हो पाएगा जब अगली जनगणना और उसके बाद का परिसीमन पूरा हो जाएगा। इसका मतलब यह है कि देश की आधी आबादी को उनका हक दिलाने के लिए भी इस जटिल परिसीमन प्रक्रिया से गुजरना ही होगा, जिससे इस मुद्दे की संवेदनशीलता और समय सीमा दोनों अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
• निष्कर्ष: क्या हो सकती है आगे की राह ?
परिसीमन 2026 भारत के सामने एक ऐसी पहेली है जहां ‘लोकतांत्रिक सिद्धांत’ (एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य) और ‘संघीय न्याय’ (बेहतर काम करने वाले राज्यों के अधिकारों की रक्षा) आपस में टकरा रहे हैं। एक तरफ जहां विशाल आबादी वाले क्षेत्रों को अधिक प्रतिनिधित्व देना लोकतंत्र की मांग है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना देश की अखंडता और एकता के लिए अनिवार्य है।
इस समस्या का समाधान खोजने के लिए नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों ने कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए हैं:
• सीटों का पुनर्संतुलन और वेटेज सिस्टम: केवल जनसंख्या को एकमात्र पैमाना न मानकर, राज्यों के विकास सूचकांक (Development Index), साक्षरता दर और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को भी परिसीमन के फॉर्मूले में कुछ ‘वेटेज’ (अंक) दिया जाना चाहिए।
• राज्यसभा को अधिक शक्तिशाली बनाना: अमेरिकी सीनेट की तर्ज पर, जहाँ हर राज्य को चाहे वह छोटा हो या बड़ा, बराबर प्रतिनिधित्व मिलता है, भारत में भी राज्यों की परिषद यानी राज्यसभा की भूमिका और सीटों के आवंटन में बदलाव किया जा सकता है ताकि छोटे व दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों की रक्षा संसद के ऊपरी सदन में मजबूती से हो सके।
• राजनीतिक आम सहमति: इस संवेदनशील विषय पर किसी भी प्रकार की जल्दबाजी या एकतरफा निर्णय के बजाय केंद्र सरकार को सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, क्षेत्रीय दलों और नागरिक समाज के साथ मिलकर एक व्यापक आम सहमति बनानी होगी।अंततः, परिसीमन केवल सीटों को घटाने-बढ़ाने का खेल नहीं है, बल्कि यह विविधता से भरे भारत देश को एक सूत्र में पिरोए रखने की कला है। 2026 का यह राजनीतिक चक्रव्यूह भारत की परिपक्वता, दूरदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की वास्तविक परीक्षा लेगा।

