अनंत चतुर्दशी व्रत आज

ज्योतिष/धर्म

*अनंत चतुर्दशी व्रत आज:-*
*आज ही अनंत चतुर्दशी व्रत एवं व्रत की पूर्णिमा का व्रत पूर्ण किया जाएगा।*

*आज अनंत चतुर्दशी पर धनिष्ठा नक्षत्र और सुकर्मा योग में बेहद शुभ योग बन रहा है। इन शुभ संयोगों के कारण आज के व्रत का महत्व और बढ़ गया है। पंचांग के अनुसार, आज अनंत चतुर्दशी के दिन सुकर्मा योग में रवि योग बन रहा हैं। और इस योग में किए गए कार्यों में जातक को पूर्ण सफलता हासिल होती है। रवि योग में पूजा करने से दोगुना पुण्य प्राप्त होता है।*

*पूजा मुहूर्त :-*

*आज अनंत चतुर्दशी का व्रत पूजन अभिजीत मुहूर्त 11:36 से आरम्भ कर सायं 4 बजे तक किया जा सकता है।*

*आज 10 से 11 बजे तक स्नानादि करने के बाद पूर्वाभिमुख आसन लगा जल पात्र में गंगाजल डाल कर आचमन, पवित्री, आसन शुद्धि, तिलक धारण, पवित्री धारण, दीप प्रज्वलन, दिशा शुद्धि, मंगल पाठ पूर्वक व्रत का संकल्प कर गणेश पूजन, कलश स्थापन कर वरुण सहित पंच देवताओं की पूजन कर लें। पुनः सामने एक छोटी चौकी पर पीले वस्त्र बिछाएं और उस पर सोने, चांदी, पीतल या कुशा की अनंत भगवान श्री हरि विष्णु की प्रतिमा रख उसमे श्री हरि विष्णु का आवाहन, स्थापन कर यथा शक्ति जल, पंचामृत फिर जल से स्नान, वस्त्र, आचमन, जनेऊ, आचमन, चंदन, तिल, फूल, फूलमाला, तुलसी पत्र, रोली, अबीर, इत्र, धूप, दीप और हलुआ, पुड़ी, खीर, दही, चिउड़ा, चीनी आदि के नैवेद्य से पूजन कर लें। फिर नीचे सामने एक जलपात्र में जल, पान सुपारी लाल रोली, फूल,अक्षत, दूर्वा आदि डाल कर समुद्र का ध्यान पूजन कर उस जलपात्र में, शुद्ध रेशम या कपास के सूत से बने और हल्दी से रंगे हुए चौदह गांठ के अनंत को रख कर पूजन करें फिर उसे अथाह समुद्र मानते हुवे अनंत भगवान की ढूंढे,*

*प्रश्न:- क्या ढूंढ रहे हो ?*
*उत्तर:- श्री समुद्र…!*

*प्रश्न:- क्या खोज रहे हो ?*
*उत्तर:- अनंत भगवान..!*

*प्रश्न:- पाए ?*
*उत्तर:- जी पाए..!*

*आदेश:- तो माथे शिर से लगाओ..!*

*उत्तर:- जी लगाया !*

*इस प्रकार 5 बार अनंत भगवान को ढूंढ कर माथे (शिर) से लगा कर अनंत देव का ध्यान करके इस शुद्ध अनंत को पुरुष दाहिनी और स्त्री बायीं भुजा/हाथ में बांध लें। और भगवान की आरती और क्षमा प्रार्थना करें।*

*इस व्रत में अर्पित प्रसाद को (दही चुड़ा चीनी, या सेवई पूड़ी, हलुआ पूड़ी का भोग लगा कर) औरों में बांट कर एक बार प्रसाद ग्रहण (भोजन) किया जाता है।*

*इसी दिन प्रथम पूज्य गणेश जी की मूर्तियों का विशेष पूजन कर विसर्जन भी किया जाता है।*

*अनंत व्रत कथा:-*
एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही, अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी। बहुत सावधानी करने पर भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे।
एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया। द्रौपदी ने यह देखकर ‘अंधों की संतान अंधी’ कह कर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन चिढ़ गया।
यह बात उसके हृदय में बाण समान लगी। उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली। उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे। उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर उस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया।
पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा। वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे। एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा।
तब श्रीकृष्ण ने कहा- ‘हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।’
इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई –
प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई।
पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए।
कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे।
सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई।
कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी। उन्होंने डोरे को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया, इससे भगवान अनंत जी का अपमान हुआ। परिणामत: ऋषि कौंडिन्य दुखी रहने लगे। उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई। इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कहीं।
पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए। वन में कई दिनों तक भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन भूमि पर गिर पड़े।
तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले- ‘हे कौंडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा। तुम दुखी हुए। अब तुमने पश्चाताप किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हुँ। अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। चौदह वर्षपर्यंत व्रत करने से तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा। तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे। कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई।’
श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया जिसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक राज्य करते रहे।
*भगवान श्री हरि विष्णु के व्रत पूजन से सबके जीवन में सुख और समृद्धि भर जाए और सबको उत्तम आयु आरोग्यता, सुख संपदा एवं राज्य वैभव प्राप्त होवे!*

*आपके सभी मनोकामना पूर्णता और सर्व साफल्यता लिए श्री हरि विष्णु से आराकाशा की विशेष प्रार्थना, और आपके सुखी जीवन की हार्दिक शुभकामना…*
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*हरि ॐ गुरुदेव..!*
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*ज्योतिषाचार्य आचार्य राधाकान्त शास्त्री*
*🌺शुभम बिहार यज्ञ ज्योतिष आश्रम🌺*
*राजिस्टार कालोनी, पश्चिम करगहिया रोड, नजदीक:- थाना:- कालीबाग ओ.पी. बेतिया, पश्चिम चम्पारण, बिहार,*
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(अहर्निशं सेवा महे)
*आवश्यक मे कॉल से वार्तालाप समय:- सायं 4 से रात्रि 11 बजे तक।*
*!!भवेत् तावत् शुभ मंगलम्!!*

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