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माननीय उपमुख्यमंत्री सह मंत्री, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग श्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि भूमि सुधार जनकल्याण संवाद के दौरान आये नागरिकों से मिलकर महसूस हुआ कि राजस्व न्यायालयों में आम नागरिक न्याय की अपेक्षा लेकर आते हैं।

 त्रिलोकी नाथ प्रसाद/यदि समान प्रकृति के मामलों में अलग-अलग स्तरों पर भिन्न निर्णय होंगे, तो यह न्याय की मूल भावना के विपरीत है। हमारी सरकार का स्पष्ट उद्देश्य है कि राजस्व न्यायालय प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से पारदर्शी, समान और कानूनसम्मत न्याय सुनिश्चित किया जाए। इसी दिशा में महाधिवक्ता के विधिक परामर्श को मार्गदर्शक बनाकर निर्णयों में एकरूपता लाने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि हर नागरिक को भरोसेमंद और निष्पक्ष न्याय मिल सके।

•राजस्व न्यायालय प्रणाली में निर्णयों की असमानता दूर करना प्राथमिकता

•उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के निर्देश पर समान न्याय सुनिश्चित करने को दिशा-निर्देश जारी

•भूमि सुधार जन कल्याण संवाद में न्यायालयों के आदेशों की समीक्षा के दौरान तथ्य आया सामने

•एकरूपता लाने के लिए महाधिवक्ता के परामर्श को बनाया गया मार्गदर्शक

पटना : माननीय उपमुख्यमंत्री सह मंत्री, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग श्री विजय कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में पटना, लखीसराय, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा एवं भागलपुर में आयोजित किए गए भूमि सुधार जन कल्याण संवाद में राजस्व न्यायालय प्रबंधन प्रणाली (Revenue Court Management System) के अंतर्गत पारित हो रहे आदेशों की भी विस्तृत समीक्षा की गई। इन समीक्षा में यह तथ्य सामने आया कि प्रमंडलीय आयुक्त, समाहर्ता, अपर समाहर्ता, भूमि सुधार उप समाहर्ता एवं अंचल अधिकारी स्तर के न्यायालयों द्वारा पारित समरूप मामलों के निर्णयों में कई बार असमानता देखी जा रही है, जिससे आमजनों को समान प्रकृति के मामलों में भिन्न-भिन्न परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।
इस स्थिति को गंभीर मानते हुए माननीय उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिया कि राजस्व न्यायालयों में निर्णय प्रक्रिया को एकरूप, पारदर्शी और विधि-सम्मत बनाया जाए, ताकि आम नागरिकों को “एक ही प्रकार के मामले में एक जैसा न्याय” सुनिश्चित हो सके। इसी उद्देश्य से राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रधान सचिव श्री सी.के. अनिल द्वारा 13 जनवरी 2026 को सभी समाहर्ताओं को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
जारी निर्देशों में कहा गया है कि प्रशासनिक एवं अर्ध-न्यायिक निर्णय लेते समय विद्वान महाधिवक्ता के विधिक परामर्श को मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में अपनाया जाए। यद्यपि महाधिवक्ता का परामर्श बाध्यकारी नहीं है, फिर भी वह विधि-सम्मत, मान्य और न्यायिक कसौटी पर खरा उतरने वाला होता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विभिन्न स्तरों के राजस्व न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों में अनावश्यक भिन्नता न हो।
निर्देशों में यह भी रेखांकित किया गया है कि किसी निर्णय को जिस प्रक्रिया से लिया गया हो, उसी प्रक्रिया से उसमें संशोधन या समाप्ति की जानी चाहिए। विधि विभाग द्वारा गठित अधिवक्ताओं के पैनल को किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा एकतरफा भंग करना विधि-सम्मत नहीं है। ऐसे निर्णय अधिकार क्षेत्र से बाहर माने जाएंगे और उन्हें मनमाना तथा अस्थिर समझा जाएगा।
प्रधान सचिव द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि सभी अर्ध-न्यायिक आदेश प्राकृतिक न्याय, संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुपातिकता के सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए। किसी भी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध निर्णय लेने से पूर्व उन्हें सुनवाई का पूरा अवसर देना अनिवार्य है। बिना ठोस आधार, अस्पष्ट या तथ्यहीन आदेश न केवल अवैध माने जाएंगे, बल्कि वे न्यायिक व्यवस्था में असमानता को और बढ़ाएंगे।

विभागीय स्तर पर यह माना गया है कि इन दिशा-निर्देशों के प्रभावी अनुपालन से राजस्व न्यायालय प्रबंधन प्रणाली के तहत निर्णयों में एकरूपता आएगी, अपीलों की संख्या घटेगी और आम नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होगा।

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