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• युद्ध और मौसम की दोहरी मार से दुनिया पर मंडरा रहा महंगाई और भुखमरी का खतरा : चंदन चौरसिया

• होर्मुज संकट और अल नीनो का असर, आम लोगों की रसोई तक महंगाई की आग

• संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की चेतावनी, कमजोर देशों के सामने गहरा सकता है खाद्य और कृषि संकट

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि दुनिया इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां युद्ध, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अस्थिरता मिलकर एक बड़े वैश्विक संकट का रूप लेते दिखाई दे रहे हैं। दुनिया के कई हिस्सों में जारी तनाव और मौसम में हो रहे बड़े बदलावों ने आम लोगों की जिंदगी को सीधे प्रभावित करना शुरू कर दिया है। आने वाले महीनों में महंगाई, खाद्य संकट और कृषि क्षेत्र में भारी गिरावट जैसी स्थितियां और गंभीर हो सकती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और विकासशील देशों पर पड़ने की आशंका जतायी जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने हाल ही में जो चेतावनी जारी की है, वह पूरी दुनिया के लिए बेहद चिंताजनक है। एफएओ के अनुसार आने वाले छह से बारह महीने वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिहाज से बेहद नाजुक साबित हो सकते हैं। संगठन ने साफ कहा है कि युद्ध और मौसम की दोहरी मार के कारण दुनिया भर में खाद्य आपूर्ति प्रभावित होगी और इसका असर सीधे आम लोगों की रसोई तक पहुंचेगा।

चौरसिया ने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज क्षेत्र में जारी संकट ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। यह क्षेत्र वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। अगर यहां हालात और बिगड़ते हैं तो तेल की सप्लाई प्रभावित होगी, जिससे पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी होने से ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत बढ़ेगी। इसका सीधा असर खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ेगा।

जब ईंधन महंगा होता है तो खेती से लेकर बाजार तक हर प्रक्रिया प्रभावित होती है। खेतों में इस्तेमाल होने वाले डीजल पंप, खाद और कृषि मशीनों की लागत बढ़ जाती है। इसके साथ ही फसल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में भी अधिक खर्च आता है। यही कारण है कि महंगाई धीरे-धीरे हर घर की रसोई तक पहुंच जाती है। आने वाले समय में फल, सब्जियां, दाल, अनाज, दूध, खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं।

केवल युद्ध ही नहीं बल्कि मौसम में हो रहे बदलाव भी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएं अब खेती-किसानी के लिए गंभीर खतरा साबित हो रही हैं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार अल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक ऐसी प्रक्रिया है, जो पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित करती है। इसके कारण कई देशों में सूखा पड़ता है, जबकि कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं।

उन्होंने कहा कि अमेरिका के मौसम विज्ञान केंद्र ने मई से जुलाई के बीच अल नीनो के सक्रिय होने की संभावना 82 प्रतिशत तक बतायी है। यह आंकड़ा अपने आप में बेहद गंभीर संकेत देता है। अगर अल नीनो का प्रभाव बढ़ता है तो दुनिया के कई बड़े कृषि उत्पादक देशों में खेती प्रभावित हो सकती है। गेहूं, चावल, मक्का और खाद्य तेल वाली फसलों का उत्पादन घट सकता है। इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी वैश्विक खाद्य व्यवस्था पर पड़ेगा।

चौरसिया ने कहा कि दुनिया पहले ही कोरोना महामारी और कई आर्थिक संकटों का सामना कर चुकी है। महामारी के बाद से वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। ऐसे में युद्ध और मौसम का नया संकट स्थिति को और जटिल बना सकता है। कई देशों में पहले से ही महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। यदि खाद्य उत्पादन घटता है और ऊर्जा महंगी होती है, तो गरीब और मध्यम वर्ग के लिए जीवन यापन और कठिन हो जायेगा।

सबसे ज्यादा चिंता उन देशों को लेकर है, जो खाद्यान्न और ईंधन के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई कमजोर देशों में पहले से ही गरीबी और भुखमरी की समस्या बनी हुई है। यदि वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट गहराता है तो इन देशों में लाखों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्ट पहले भी संकेत दे चुकी हैं कि जलवायु परिवर्तन और युद्ध आने वाले समय में वैश्विक भूख का सबसे बड़ा कारण बन सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि भारत जैसे देश भी इस संकट से पूरी तरह अछूते नहीं रहेंगे। भारत कृषि प्रधान देश जरूर है, लेकिन यहां भी मौसम की अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है। कहीं सूखा तो कहीं अत्यधिक बारिश किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही है। यदि वैश्विक बाजार में खाद्य वस्तुओं और ईंधन के दाम बढ़ते हैं, तो उसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ेगा। खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के घरेलू बजट पर इसका बड़ा प्रभाव देखने को मिल सकता है।

महंगाई का सबसे बड़ा असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है। जब खाने-पीने की चीजें महंगी होती हैं तो परिवारों को अपने खर्च कम करने पड़ते हैं। गरीब परिवारों के लिए पौष्टिक भोजन जुटाना मुश्किल हो जाता है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर भी इसका असर पड़ता है। यही कारण है कि खाद्य संकट केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट भी बन जाता है।

दुनिया को अब केवल आर्थिक नीतियों से नहीं बल्कि दीर्घकालिक और टिकाऊ रणनीतियों से इस संकट का सामना करना होगा। सरकारों को कृषि क्षेत्र को मजबूत करना होगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। किसानों को आधुनिक तकनीक, सिंचाई व्यवस्था और मौसम आधारित कृषि सलाह उपलब्ध करानी होगी ताकि फसल नुकसान को कम किया जा सके।

ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर भी तेजी से काम करने की जरूरत है। यदि दुनिया केवल तेल आधारित व्यवस्था पर निर्भर रहेगी तो हर युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव का असर सीधे आम लोगों पर पड़ेगा। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गयी है।

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि आने वाला समय दुनिया के लिए एक बड़ी परीक्षा की तरह है। यदि अभी से सावधानी और तैयारी नहीं की गयी तो आने वाले महीनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं। दुनिया को समझना होगा कि युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, उसका असर पूरी मानवता पर पड़ता है। इसी तरह जलवायु परिवर्तन केवल मौसम का बदलाव नहीं बल्कि मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।

उन्होंने कहा कि इस संकट से बचने के लिए वैश्विक सहयोग बेहद जरूरी है। देशों को आपसी संघर्ष कम करके खाद्य सुरक्षा और जलवायु संकट जैसे मुद्दों पर मिलकर काम करना होगा। यदि दुनिया ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाये तो महंगाई, बेरोजगारी और भुखमरी जैसी समस्याएं और भयावह रूप ले सकती हैं।आम लोगों को भी आने वाले समय के प्रति जागरूक रहने की जरूरत है। अनावश्यक बर्बादी रोकना, जल संरक्षण करना और स्थानीय कृषि को बढ़ावा देना जैसे छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। यह केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरी मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्थिर दुनिया बनायी जाये।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जब-जब युद्ध और मौसम संकट साथ आये हैं, तब-तब दुनिया ने भारी आर्थिक और मानवीय नुकसान झेला है। आज फिर दुनिया उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां एक छोटी चूक करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि यह समय चेतावनी को समझने और संभलने का है। यदि अभी से तैयारी की जाये तो आने वाले संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन यदि दुनिया केवल इंतजार करती रही, तो महंगाई और खाद्य संकट की यह आग हर देश और हर परिवार तक पहुंच सकती है।

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