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बंगाल की बदलती बयार: 2014 से शुरू हुआ सफर अब सत्ता परिवर्तन की दस्तक तक: चंदन चौरसिया

जनता के मूड में बदलाव—भारतीय जनता पार्टी का उभार और तृणमूल कांग्रेस की साख पर सवाल

महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और विकास की राजनीति—नरेंद्र मोदी के एजेंडे के सामने ममता बनर्जी की चुनौतियां गहराईं

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। वरिष्ट पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2014 का लोकसभा चुनाव केवल एक चुनावी परिणाम नहीं था, बल्कि एक नई राजनीतिक पटकथा की शुरुआत थी। लंबे समय तक वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव में रहे इस राज्य में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने अपनी मौजूदगी को मजबूती से दर्ज कराया। यह वही दौर था जब राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास, सुशासन और निर्णायक नेतृत्व का नया विमर्श उभर रहा था। बंगाल, जो कभी भाजपा के लिए सीमांत प्रदेश माना जाता था, धीरे-धीरे पार्टी के विस्तार का केंद्र बनता गया। 2014 में सीमित सीटों और वोट प्रतिशत से शुरू हुआ यह सफर 2019 तक आते-आते एक बड़े जनसमर्थन में बदल गया। यह बदलाव केवल चुनावी आंकड़ों का खेल नहीं था, बल्कि जनता के भीतर पनप रहे असंतोष का परिणाम था—एक ऐसा असंतोष जो भ्रष्टाचार, कट मनी, राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात के खिलाफ आकार ले रहा था।

चौरसिया ने कहा कि 2016 के विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा को सीमित सफलता मिली, लेकिन यहीं से संगठनात्मक मजबूती और जमीनी विस्तार की नींव रखी गई। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए बंगाल की राजनीति में खुद को मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में स्थापित कर लिया। यह वह क्षण था जब तृणमूल कांग्रेस की पकड़ पहली बार कमजोर होती नजर आई। ममता सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप—चाहे वह शिक्षक भर्ती घोटाला हो, कोयला घोटाला हो या फिर कट मनी की संस्कृति—इन सभी ने जनता के विश्वास को झकझोर दिया। महिला सुरक्षा के मुद्दे पर भी सरकार लगातार सवालों के घेरे में रही। राज्य में बढ़ती घटनाओं ने यह संदेश दिया कि कानून व्यवस्था की स्थिति संतोषजनक नहीं है। ऐसे में भाजपा ने इन मुद्दों को न केवल राजनीतिक रूप से उठाया, बल्कि उन्हें जनआंदोलन का रूप देने में भी सफलता पाई। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव तक पहुंच बनाकर यह नैरेटिव स्थापित किया कि बदलाव अब आवश्यक ही नहीं, बल्कि अपरिहार्य हो चुका है।

चौरसिया ने कहा कि 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अभूतपूर्व बढ़त दर्ज की और यह स्पष्ट कर दिया कि बंगाल अब एकतरफा राजनीति का प्रदेश नहीं रहा। हालांकि सत्ता परिवर्तन उस समय संभव नहीं हो सका, लेकिन परिणामों ने यह संकेत दे दिया कि तृणमूल कांग्रेस की जमीन खिसक रही है। इसके बाद के वर्षों में स्थिति और अधिक बदली है। एक ओर जहां भाजपा ने अपने संगठन को और मजबूत किया, वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस आंतरिक कलह, भ्रष्टाचार के आरोपों और प्रशासनिक विफलताओं से जूझती रही। आज स्थिति यह है कि राज्य की जनता खुलकर बदलाव की बात कर रही है। युवा वर्ग रोजगार और पारदर्शिता की मांग कर रहा है, महिलाएं सुरक्षा और सम्मान चाहती हैं, और आम नागरिक एक ऐसी सरकार की उम्मीद कर रहे हैं जो विकास को प्राथमिकता दे। इस पूरे परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर कर सामने आई है। 2024 के लोकसभा चुनाव और आने वाले विधानसभा चुनाव इस बात के संकेत दे रहे हैं कि बंगाल की राजनीति अब निर्णायक मोड़ पर खड़ी है—जहां एक ओर पुरानी व्यवस्था के प्रति नाराजगी है, वहीं दूसरी ओर नए नेतृत्व और नई सोच के प्रति उम्मीदें। अगर यही रुझान जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब बंगाल की सत्ता में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा और भाजपा का यह लंबा संघर्ष अपने चरम पर पहुंचेगा।

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