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अमित शाह का एफसीआरए कानून: विदेशी फंडिंग पर लगाम और भारत विरोधी ताकतों का निशाना: चंदन चौरसिया

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना | वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा की जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में आपने धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो के नारे बार-बार सुने होंगे। लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ है जो हैरान करने वाला है। प्रदर्शनकारियों को कंट्रोल करने वाले लोग धर्मेंद्र प्रधान नहीं बल्कि किसी और को हटाना चाहते हैं। पूरे प्रदर्शन में पहली बार एक ताकतवर नेता का नाम आया है। इस नेता का नाम आते ही साफ हो गया है कि खेल कितना बड़ा और खतरनाक है। दरअसल मोदी सरकार के खिलाफ जंतर मंतर को एक ऐसी प्रयोगशाला में बदल दिया गया है जहां देश और विदेश की कई ताकतें सीजेपी नाम का एक एक्सपेरिमेंट कर रही हैं। इस एक्सपेरिमेंट की शुरुआत धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से हुई। उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी इस्तीफा मांगा गया। लेकिन पहली बार एक ऐसे ताकतवर नेता का नाम सामने आया है जो इस प्रदर्शन का सबसे बड़ा टारगेट है। पहली बार राहुल गांधी के मुंह से वह नाम निकल गया जिसे मोदी से पहले टारगेट करने की कोशिश हो रही है। यह नाम है भारत के गृहमंत्री अमित शाह का। करीब 20 दिनों की अघोषित विदेश यात्रा के बाद भारत लौटे राहुल गांधी ने अमित शाह से इस्तीफा मांगा है। राहुल गांधी अब खुलकर सीजेपी प्रदर्शन के केंद्र में आ गए हैं और उन्होंने पहली बार गृहमंत्री अमित शाह से इस्तीफा मांगा है।

चौरसिया ने कहा की सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमित शाह को क्यों टारगेट किया गया है? दरअसल अमित शाह एक ऐसा कानून लाने के लिए अड़ गए हैं जो भारत और विदेशों में बैठे एक खतरनाक इकोसिस्टम को तबाह कर सकता है। इसीलिए कई विदेशी ताकतें भी अमित शाह के पीछे पड़ गई हैं। अमित शाह जिस कानून को लाना चाहते हैं वह एफसीआरए है। एफसीआरए यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट। अमित शाह ही एफसीआरए कानून के सूत्रधार हैं। यह कानून पास हो गया तो भारत और विदेश में बैठे कई बड़े-बड़े लोग नप जाएंगे। जंगलों में फैले नक्सलवाद को खत्म कर चुके अमित शाह के टारगेट पर अब अर्बन नक्सल आ चुके हैं। अर्बन नक्सली नक्सलियों का सबसे खतरनाक रूप है। अर्बन नक्सलवाद बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, सेलिब्रिटीज और एनजीओस का ऐसा जाल है जो देश को खोखला करता जा रहा है। यह लोग भारत में बैठकर चीन, अमेरिका, पश्चिमी और मुस्लिम देशों का एजेंडा चलाते हैं। मिशनरी संस्थानों से धर्मांतरण का रैकेट चलवाते हैं। इसके लिए इन्हें पैसा मिलता है। अब उसी पैसे को ट्रैक करने और पूरी तरह से बंद करने की तैयारी ही एफसीआरए संशोधन कानून है। इस विदेशी पैसे का इस्तेमाल भारत को अस्थिर करने के लिए किया जाता रहा है। भारत के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स को लटकाने के लिए किया जाता रहा है। भारतीय नीतियों को प्रभावित करने के लिए किया जाता रहा है। इनमें डिफेंस, इकोनॉमिक और आईटी से जुड़ी नीतियां सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।

एफसीआरए संशोधन कानून के तहत अब पैसे का हिसाब और पूरा सोर्स बताना होगा। विदेशों से यह पैसा अब सिर्फ एसबीआई बैंक में अकाउंट खुलवाकर ही लिया जा सकता है। अगर कोई संस्था या एनजीओ गड़बड़ी करता पाया जाता है, तो उसकी संपत्ति पर भारत सरकार कब्जा कर सकती है। अगर यह संशोधित कानून पास हो गया तो विदेशी ताकतों का भारत में दखल खत्म हो जाएगा। यह शक्तियां भारत के लोगों का धर्म परिवर्तन नहीं करवा पाएंगी। भारत के विकास को नहीं रोक पाएंगी। पीएम मोदी को सत्ता से नहीं हटवा पाएंगी। इसीलिए यह कानून विदेशी मिशनरी संस्थाओं के साथ-साथ डीप स्टेट को भी डरा रहा है। इन सभी की दुकानें बंद हो जाएँगी। इसीलिए सबसे पहले एफसीआरए कानून के सूत्रधार अमित शाह को टारगेट किया जा रहा है। कुछ समय पहले भारत में तैनात अमेरिकी राजदूत ने अमित शाह से मुलाकात की थी। सूत्रों के मुताबिक इस मुलाकात में एफसीआरए का जिक्र भी हुआ था। अमेरिकी राजदूत ने अमित शाह से इस संशोधित कानून पर पुनर्विचार करने के लिए कहा था लेकिन शायद अमित शाह नहीं माने। ऐसे में अमित शाह पर दबाव बनाने के लिए नया तरीका निकाला गया है। सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार दुनिया के सबसे खतरनाक लोगों की गर्दन पकड़ी है। आने वाले कुछ दिनों में पीएम मोदी बहुत बड़ा ऐलान करने जा रहे हैं जिसके डर से इन खतरनाक लोगों ने भारतीय लोगों का ही इस्तेमाल करके पीएम मोदी को अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की है। सीजेपी की आड़ में सड़कों पर जो अराजकता फैलाई गई है वह पीएम मोदी को चुनौती देने का एक तरीका था। सरकार ने कुछ दिन पहले कर्नाटक में टिमोथी इनिशिएटिव नाम के एक अमेरिकी मिशनरी संस्थान पर यूएपीए कानून के तहत मामला दर्ज किया है। आप जानते ही हैं कि यूएपीए भारत का मुख्य आतंकवाद रोधी कानून है। टिमोथी इनिशिएटिव नाम की इस अमेरिकी मिशनरी संस्था ने अपने ऊपर से यूएपीए हटवाने के लिए कोर्ट का रुख किया लेकिन कोर्ट ने भी इनकी बात नहीं सुनी। कहा गया कि ऐसी संस्थाओं को जो विदेशी फंडिंग मिलती है वह भारत में चरमपंथ को बढ़ाने के लिए ऑक्सीजन का काम कर रही है। यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक शख्स को बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 24 डेबिट कार्ड्स के साथ पकड़ा गया। इन सभी डेबिट कार्ड्स पर एक ही नाम था संतोष कुमार। थोड़ी सी जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि यह सिर्फ 24 डेबिट कार्ड्स का मामला नहीं है बल्कि हजारों डेबिट कार्ड्स बांटे जा चुके हैं। 10-10 हजार करके 95 करोड़ रुपये निकाले जा चुके हैं। इस पैसे नक्सल-प्रभावी इलाकों और भारत के दूसरे संवेदनशील क्षेत्रों, इलाकों और भारत के दूसरे सेंसिटिव एरियाज में बांट दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पैसे का इस्तेमाल धर्मांतरण और भारत विरोधी कामों के लिए हुआ। इस घटना के बाद आपको समझ आएगा कि दिल्ली की सड़कों पर सीजेपी ने बवाल क्यों काटा। दरअसल सीजेपी की जंग नीट पेपर लीक के खिलाफ नहीं बल्कि एफसीआरए कानून के खिलाफ है। संसद के मॉनसून सत्र में मोदी सरकार एफसीआरए संशोधन बिल ला रही है। इसी कानून के तहत सोनम वांगचुक समेत कई बड़े लोग फंसने वाले हैं। सोनम वांगचुक की एक संस्था का तो लाइसेंस एफसीआरए कानून के तहत रद्द भी किया जा चुका है।

पीएम मोदी देश में सबसे बड़ा सफाई अभियान शुरू करने जा रहे हैं जो धर्मांतरण करने वाली मिशनरी संस्थाओं के खिलाफ है। उन एनजीओस के खिलाफ है जो नक्सलियों और अलगाववादियों को फंडिंग करते हैं। भारत की हर विकास परियोजना को रोकने के लिए प्रदर्शन करवाते हैं। इसीलिए सीजेपी के प्रोटेस्ट में भारत के रणनीतिक ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के खिलाफ भी बयानबाजी की गई थी। आपको बता दें कि संशोधन के बाद एफसीआरए यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट के तहत विदेशों से जो फंडिंग आती है उस फंडिंग के सोर्स की जानकारी भी अब देनी होगी। फंडिंग प्राप्त करने के लिए एसबीआई दिल्ली में अकाउंट खुलवाना पड़ेगा। यानी एनजीओस और मिशनरी संस्थान विदेशों से जो पैसा मंगवाएंगे उसे अपने एसबीआई अकाउंट में मंगवाना पड़ेगा। तीसरा संशोधन यह है कि इस पैसे का उपयोग धर्मांतरण के कामों में अब नहीं हो पाएगा। अगर कोई मिशनरी संस्था या एनजीओ गलत काम करते पकड़े जाते हैं तो उनकी संपत्ति पर सरकार का अधिकार हो जाएगा। यही कारण है कि पीएम मोदी के खिलाफ अमेरिकी डीप स्टेट ने सीजेपी को छोड़ दिया है। सीजेपी के प्रदर्शन में जितने बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं उनके एनजीओ हैं। वह मिशनरी संस्थाओं में काम करते हैं। इन सभी की फंडिंग पर अब रोक लगने जा रही है। इसीलिए अमेरिकी डीप स्टेट ना तो पीएम मोदी को चाहती है और ना ही एफसीआरए कानून को।

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