सहरसा : महाकवि विद्यापति की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत यूरोप की धरती पर मंचन गर्व का विषय

सहरसा, 21 सितंबर (के.स.)। अजय कुमार, मिथिलांचल, महाकवि विद्यापति की कर्म एवं जन्मभूमि, की भाषा और साहित्यिक परंपरा की गूँज सर्वदिशाओं में सुनाई देती रही है और अब यह यूरोप तक भी पहुँच चुकी है। इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में रविवार को स्थानीय समय 12 बजे से देर शाम तक पहली बार महाकवि विद्यापति समारोह 2026 का भव्य एवं सफल आयोजन किया गया।
यह समारोह इंटरनेशनल मैथिल डायस्पोरा (IMD), जर्मनी द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें यूरोप के विभिन्न देशों में रह रहे मैथिल परिवारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। फ्रैंकफर्ट के सालबाउ गैलुस में आयोजित इस समारोह में कार्यक्रम की सम्मानित अतिथि राजीव कुमार, भारत की महावाणिज्यदूत, फ्रैंकफर्ट में उपस्थित रहें और समारोह को संबोधित किया।
यह कार्यक्रम पूर्ण रूप से मिथिला एवं भारत की भाषा, साहित्य, संस्कृति और संगीत को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के उद्देश्य को समर्पित था तथा भविष्य में भी इस विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की गई। कार्यक्रम में मैथिली लोक संगीत, पारंपरिक मिथिला प्रस्तुतियाँ, भारतीय शास्त्रीय संगीत, विद्यापति भजन, भारतीय इतिहास की झलकियाँ, समकालीन भारतीय नृत्य, कविता एवं साहित्यिक प्रस्तुतियाँ आकर्षण का केंद्र रहीं।
इसके साथ ही फ़्रैंकफ़र्ट ब्लुज बैंड की संगीत प्रस्तुति ने भी पूरे वातावरण को संगीतमय बना दिया। यह आयोजन केवल मैथिल समुदाय का मिलन समारोह नहीं था, बल्कि एक प्रभावशाली अंतर-सांस्कृतिक मंच के रूप में भी उभरकर सामने आया। इस मंच ने भारत से दूर रह रहे प्रवासियों को अपनी गौरवशाली भारतीय एवं मैथिली विरासत से जुड़ने, उसे जीवंत रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का अवसर प्रदान किया। साथ ही, आपसी संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से विविध संस्कृतियों को समझने और अनुभव करने का अवसर भी मिला।
इस आयोजन के अवसर पर “मिथिला प्रभा” पत्रिका का भी विमोचन किया गया। यह पत्रिका मिथिला की समृद्ध संस्कृति तथा महाकवि विद्यापति की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को एक नया आयाम देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।यह संपूर्ण कार्यक्रम इंटरनेशनल मैथिल डायस्पोरा (IMD), जर्मनी द्वारा आयोजित एक सुंदर सांस्कृतिक एवं सामुदायिक पहल थी। इसका मुख्य उद्देश्य मैथिली एवं भारतीय भाषा, साहित्य, कला और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना है।
महाकवि विद्यापति की अमर साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को यूरोप की धरती पर इस प्रकार सम्मानित किया जाना न केवल मैथिल समुदाय के लिए गर्व का विषय है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।



