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*बिहार में गैर-निर्वाचित व्यक्तियों को मंत्री बनाना लोकतांत्रिक मर्यादा पर प्रश्नचिह्न – बबलू प्रकाश*

*दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर घमासान, AAP ने उठाए संवैधानिक सवाल*

*जनता ने नहीं चुना… फिर भी दूसरी बार मंत्री! बिहार में आखिर चल क्या रहा है ?*

*न विधायक, न विधान पार्षद… फिर भी मंत्री! क्या बिहार में लोकतंत्र की नई परिभाषा लिखी जा रही है ।

त्रिलोकी नाथ प्रसाद।आम आदमी पार्टी, बिहार के राज्य कार्यक्रम प्रभारी बबलू प्रकाश ने बिहार सरकार में दीपक प्रकाश को पुनः मंत्री बनाए जाने पर गंभीर संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रश्न उठाए हैं।

बबलू प्रकाश ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) किसी गैर-विधायक व्यक्ति को सीमित अवधि के लिए मंत्री बनाए जाने की अनुमति अवश्य देता है, लेकिन यह प्रावधान एक अपवाद है, न कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य नियम। लोकतंत्र की मूल भावना यही है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही शासन की बागडोर संभालें।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने S.R. Chaudhuri बनाम State of Punjab (2001) मामले में स्पष्ट टिप्पणी की थी कि अनुच्छेद 164(4) का उपयोग संविधान की भावना को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति निर्धारित अवधि में सदन का सदस्य नहीं बनता, तो इस प्रावधान को बार-बार उपयोग कर लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से बचा नहीं जा सकता।

बबलू प्रकाश ने कहा कि बिहार में जिस प्रकार गैर-निर्वाचित व्यक्तियों को मंत्री बनाया जा रहा है, उससे कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े होते हैं: क्या जनता के जनादेश के बिना मंत्री पद देना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप है? क्या सरकार स्पष्ट करेगी कि ऐसे मंत्री कब तक विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य बनेंगे? यदि कोई व्यक्ति जनता द्वारा निर्वाचित नहीं है, तो उसे मंत्री पद की सभी सुविधाएँ और विशेषाधिकार किस आधार पर प्रदान किए जा रहे हैं? क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित संवैधानिक मर्यादाओं और सिद्धांतों का पूर्ण पालन करेगी?

उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी किसी व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं कर रही है, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की उस भावना की रक्षा करना चाहती है जिसमें जनता सर्वोच्च है और सत्ता जनता के जनादेश से संचालित होती है।

बबलू प्रकाश ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे इस विषय पर सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करें तथा यह सुनिश्चित करें कि बिहार में संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग केवल राजनीतिक सुविधा के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हो।

लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, सत्ता नहीं। संविधान का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, आचरण से होना चाहिए।

 

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