
नवेंदु मिश्र
मेदिनीनगर – भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष अमित तिवारी ने कहा कि झारखंड राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन झारखंड के किसानों के साथ बड़ी ही निर्ममता के साथ अत्याचार कर रही है, बल्कि यह कहें कि उनके साथ उनके परिश्रम का भद्दा मजाक भी उड़ा रही है, क्योंकि जो किसान अपने खून – पसीने की कमाई से धान की उपज करके इस उम्मीद में बैठे हुए थे कि आने वाले समय में उनकी उपज का अच्छा खासा मूल्य मिलेगा । क्योंकि राज्य सरकार ने वादा किया था कि किसानों के साथ कोई अत्याचार नहीं करेगा । पैक्स गोदाम में धान जमा होते के साथ 15 दिन के अंदर किसानों का बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाएगा, जबकि दुर्भाग्य की बात यह है की पिछला बकाया भी अभी तक किसानों को नहीं मिला है। उससे भी बड़ा मजाक यह है की पैक्स में करीब दो-तीन महीना तक खुले में या जैसे तैसे तरीके से धान को एकत्रित करके रख तो लिया गया, लेकिन अब उन्हें किसानों को वापस ले जाने के लिए कहा जा रहा है। जबकि झारखंड जैसे राज्य में सिंचाई की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है, किसान डीजल का प्रयोग करके धान या किसी भी फसल की उपज करते हैं। क्योंकि राज्य में बिजली की व्यवस्था भी ठीक-ठाक नहीं है, खेती के लिए तो बिजली मिलती ही नहीं है और जहां है भी वहां बहुत लचर व्यवस्था में है, अर्थात यह किसान विरोधी सरकार अपने रवैया में परिवर्तन लाए नहीं तो राज्य की जनता बिगुल फूकने के लिए तैयार बैठी है। आज अपना ही पैसा निकालने के लिए चप्पल को घिस घिस के किसान खाली पैर हो चुके हैं उनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है। ज्ञान बघारते समय राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्री तो ऐसा ज्ञान देते हैं लगता है जैसे सीधे खेत से उठकर के यह मुख्यमंत्री बने हैं। इनसे ज्यादा अच्छा खेती-बाड़ी का हाल तो कोई जानता ही नहीं है, लेकिन जब से यह सरकार आई है किसानों के प्रति इसका रवैया अत्यंत ही ददुर्दांत है । खेती-बाड़ी करने में लोग डीजल तो जलाते ही हैं क्योंकि जब एक दो पटवन के बिना लह – लहाती खेती सुखे में परिणत हो जाती है उस समय किसान का कलेजा फटकर बाहर आ जाता है। वैसे भी डीजल से ज्यादा किसानों का खून ही जलते हैं, क्योंकि यहां सभी कार्य अपने हाथों से करने पड़ते हैं ताकि दो पैसे आ सके और जीवन यापन चल सके साथ ही भूखे मरने की नौबत न आए। लेकिन इस किसान विरोधी सरकार को इन सभी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है यह कुंभ करनी नींद में सोई हुई है। लेकिन इसका खामियाजा सरकार को उग्र आंदोलन के रूप में भुगतना पड़ेगा। सरकार सचेत हो जाए यह धमकी नहीं चेतावनी है। हमें सरकार से सिर्फ इतना ही निवेदन करना है कि आप ऐसा कोई भी कदम न उठाएं जिससे किसानों को किसी भी तरह का नुकसान हो।

