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मध्य पूर्व की जंग और नई दिल्ली की कसौटी संतुलन, रणनीति और चुनावी सियासत की त्रिकोणीय परीक्षा: चौरसिया

ईरान–इज़राइल तनाव के बीच भारत की ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ पर सबसे बड़ा सवाल

तेल, महंगाई और चुनावी गणित—विदेश नीति का घरेलू राजनीति से सीधा रिश्ता

(चंदन चौरसिया, पत्रकार एवं सामाजिक विषयों के विश्लेषक)

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि मध्य पूर्व में बढ़ते ईरान-इज़राइल तनाव ने वैश्विक राजनीति को फिर अस्थिर मोड़ पर ला खड़ा किया है, लेकिन इस बार चुनौती केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह संकट नई दिल्ली की कूटनीतिक परिपक्वता, आर्थिक संतुलन और राजनीतिक दूरदृष्टि तीनों की एक साथ परीक्षा ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पिछले एक दशक में ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ यानी रणनीतिक स्वतंत्रता की नीति को मजबूती से स्थापित किया है। इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग, तकनीक और खुफिया साझेदारी गहरी हुई है, वहीं ईरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार जैसे रणनीतिक परियोजनाओं के कारण अनदेखा नहीं किया जा सकता। ऐसे में खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करना भारत के दीर्घकालिक हितों को प्रभावित कर सकता है। भारत की राजनीति में विदेश नीति अक्सर चुनावी मुद्दा नहीं बनती, लेकिन जब उसका असर सीधे जेब और जनभावनाओं पर पड़ने लगे तो तस्वीर बदल जाती है। सरकार की चुनौती यह है कि वह वैश्विक मंच पर संतुलित, जिम्मेदार और परिपक्व शक्ति की छवि बनाए रखे, जबकि घरेलू मोर्चे पर विपक्ष को किसी भी तरह की कूटनीतिक चूक का अवसर न मिले। यही वह बिंदु है जहां यह अंतरराष्ट्रीय संकट भारतीय राजनीति का आंतरिक परीक्षण बन जाता है।

चौरसिया ने कहा कि दूसरा बड़ा संकट आर्थिक है, और आर्थिक संकट हमेशा राजनीतिक संकट में बदलने की क्षमता रखता है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल तय है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है; ऐसे में तेल महंगा हुआ तो पेट्रोल-डीजल, परिवहन और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी। महंगाई का सीधा असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है,और यही वर्ग चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। विपक्ष पहले से ही बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में वैश्विक संकट से उपजी महंगाई उसे नया नैरेटिव दे सकती है। सरकार के सामने विकल्प सीमित हैं।या तो टैक्स में कटौती कर कीमतों को नियंत्रित करे, जिससे राजस्व पर दबाव बढ़े या फिर राजकोषीय संतुलन को प्राथमिकता दे और राजनीतिक जोखिम उठाए। दोनों ही स्थितियां राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हैं। इसके अलावा, भारतीय प्रवासी समुदाय की सुरक्षा भी एक बड़ा प्रश्न है। मध्य पूर्व में लाखों भारतीय काम करते हैं किसी भी प्रकार की अस्थिरता उनके रोजगार और जीवन पर असर डाल सकती है। यदि निकासी या राहत अभियान की जरूरत पड़ी, तो वह केवल मानवीय नहीं बल्कि राजनीतिक परीक्षा भी होगी।क्योंकि जनता सरकार से त्वरित और प्रभावी कार्रवाई की अपेक्षा करती है। इस पूरे परिदृश्य में आर्थिक प्रबंधन ही सरकार की राजनीतिक स्थिरता की कुंजी बन जाता है।

चौरसिया ने कहा कि तीसरा और सबसे सूक्ष्म संकट भारत की वैश्विक भूमिका से जुड़ा है। यदि इस संघर्ष में संयुक्त राज्य अमेरिका खुलकर इज़राइल के पक्ष में उतरता है और क्षेत्रीय समीकरण और जटिल होते हैं, तो भारत के लिए तटस्थता बनाए रखना और कठिन हो जाएगा। भारत आज खुद को केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। जी-20 की अध्यक्षता के बाद भारत ने बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय नेतृत्व का दावा किया है। ऐसे में यह संकट अवसर भी है और जोखिम भी। यदि भारत मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश करता है, तो उसे संतुलन और विश्वसनीयता दोनों बनाए रखनी होंगी। घरेलू राजनीति में भी यह मुद्दा वैचारिक विमर्श को जन्म दे सकता है।एक पक्ष मजबूत रणनीतिक साझेदारी की वकालत करेगा, तो दूसरा गुट गुटनिरपेक्षता की परंपरा की याद दिलाएगा। भारतीय लोकतंत्र में विदेश नीति पर आम सहमति रही है, लेकिन बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में यह सहमति चुनौती के दौर से गुजर सकती है। अंततः यह स्पष्ट है कि मध्य पूर्व का यह संकट केवल सीमा पार की घटना नहीं है यह भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता, आर्थिक स्थिरता और राजनीतिक परिपक्वता—तीनों का संयुक्त परीक्षण है। सरकार की रणनीति जितनी संतुलित और दूरदर्शी होगी, उतना ही वह घरेलू राजनीतिक जोखिम को कम कर पाएगी। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई दिल्ली किस तरह इस जटिल समीकरण को साधती है।क्योंकि आज की विदेश नीति ही कल की घरेलू राजनीति की दिशा तय कर सकती है।

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