*सुरक्षा का साम्राज्य और लोकतंत्र – आखिर जनता से खतरा किसे है?*
जितेन्द्र कुमार सिन्हा ::मानवीय कमजोरियों में यदि किसी एक गुण को सर्वोच्च स्थान दिया जाए तो वह है दिखावा। व्यक्ति, समाज, संस्थाएं और यहां तक कि राष्ट्र भी कभी-कभी अपनी वास्तविक शक्ति से अधिक उसका प्रदर्शन करने में विश्वास रखते हैं। किंतु यदि दिखावे की इस कला के सबसे बड़े साधकों की बात की जाए तो राजनीति का संसार सबसे आगे दिखाई देता है। यहां व्यक्ति का कद उसके विचारों, कार्यों, उपलब्धियों अथवा जनसेवा से नहीं, बल्कि उसके आसपास मौजूद सुरक्षा कर्मियों, गाड़ियों के काफिलों और सायरनों के शोर से मापा जाने लगा है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि जिस व्यवस्था का मूल आधार जनता है, उसी व्यवस्था के जनप्रतिनिधि जनता से सबसे अधिक सुरक्षित दूरी बनाए रखने में विश्वास करते हैं। लोकतंत्र का अर्थ था कि जनता का सेवक जनता के बीच रहेगा, उसकी समस्याओं को समझेगा और उसके साथ संवाद करेगा। लेकिन आज स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। अब जनसेवक जितना बड़ा होता जाता है, वह जनता से उतना ही दूर और सुरक्षा घेरे से उतना ही घिरा हुआ दिखाई देता है।
आज किसी भी शहर की व्यस्त सड़क पर अचानक ट्रैफिक रोक दिया जाए, लोगों को घंटों खड़ा रहना पड़े, एम्बुलेंस तक रुक जाए और सैकड़ों पुलिसकर्मी सड़क के दोनों ओर तैनात दिखाई दें तो आम नागरिक के मन में पहला विचार आता है कि शायद कोई बड़ी आपात स्थिति उत्पन्न हो गई है। लेकिन कुछ ही क्षणों बाद पता चलता है कि यह सब इसलिए हुआ क्योंकि कोई नेता, मंत्री या विशेष व्यक्ति अपने कार्यक्रम के लिए निकल रहे हैं। लोकतंत्र में जनता को रास्ता देना चाहिए या जनता का रास्ता रोककर नेताओं को निकालना चाहिए- यह प्रश्न अब अप्रासंगिक होता जा रहा है।
सुरक्षा श्रेणियां—X, Y, Y+, Z, Z+ और SPG अब केवल सुरक्षा व्यवस्था की तकनीकी श्रेणियां नहीं रह गई हैं। ये राजनीतिक प्रतिष्ठा के प्रतीक बन चुकी हैं। किसी नेता के समर्थकों के बीच यह चर्चा कम होती है कि उसने कितने विद्यालय खुलवाए, कितनी सड़कें बनवाईं या कितनी समस्याओं का समाधान किया। चर्चा इस बात की अधिक होती है कि उनके नेता को कौन-सी सुरक्षा श्रेणी प्राप्त है और उनके साथ कितने सुरक्षाकर्मी चलते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि सुरक्षा अब आवश्यकता से अधिक प्रतिष्ठा का विषय बन चुकी है। जिसके साथ दो सुरक्षाकर्मी हों, वह साधारण माना जाता है। जिसके साथ दस हों, वह प्रभावशाली समझा जाता है। और जिसके काफिले के कारण पूरा शहर जाम हो जाए, वह राष्ट्रीय स्तर का महापुरुष घोषित कर दिया जाता है। मानो लोकतंत्र में लोकप्रियता का पैमाना जनसमर्थन नहीं बल्कि सुरक्षा कर्मियों की संख्या हो।
विडंबना यह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में देश के बड़े-बड़े नेता बिना किसी सुरक्षा घेरे के लाखों लोगों के बीच चले जाते थे। जनता उन्हें अपने बीच का व्यक्ति मानती थी। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं की लोकप्रियता उनके विचारों और व्यक्तित्व से निर्मित हुई थी। आज अनेक नेता ऐसे हैं जिनके नाम से जनता शायद परिचित भी न हो, लेकिन उनके काफिलों की लंबाई देखकर लगता है मानो राष्ट्र का भाग्य उन्हीं के हाथों में सुरक्षित है।
लोकतंत्र में सुरक्षा आवश्यक है। कोई भी संवैधानिक पदाधिकारी या जनप्रतिनिधि यदि वास्तविक खतरे का सामना कर रहा हो तो उसकी रक्षा राज्य का दायित्व है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब सुरक्षा व्यवस्था वास्तविक आवश्यकता से अधिक राजनीतिक प्रदर्शन का माध्यम बन जाती है। तब यह जनता में यह संदेश देती है कि सत्ता स्वयं को जनता से अलग और श्रेष्ठ मानने लगी है।
सुरक्षा के नाम पर जो संसाधन लगाए जाते हैं, वे भी विचारणीय हैं। हजारों पुलिसकर्मी, सैकड़ों वाहन और करोड़ों रुपये का खर्च अंततः जनता के करों से ही आता है। ऐसे देश में जहां अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के लिए संसाधनों की कमी की चर्चा होती है, वहां सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर बढ़ते खर्च पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
वर्तमान राजनीति में एक और प्रवृत्ति देखने को मिलती है। जैसे-जैसे किसी नेता की लोकप्रियता घटती है, वैसे-वैसे उसका सुरक्षा घेरा बढ़ता हुआ दिखाई देता है। मानो जनता के बीच घटती स्वीकार्यता की भरपाई सुरक्षाकर्मियों की संख्या से की जा रही हो। लोकतंत्र में वास्तविक सुरक्षा जनता का विश्वास होता है, लेकिन जब यह विश्वास कम होने लगता है तो उसकी जगह बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी ले लेते हैं।
हाल के वर्षों में कई राजनीतिक घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि सुरक्षा व्यवस्था अब केवल सुरक्षा का विषय नहीं रह गई है। यह राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन चुकी है। सुरक्षा में वृद्धि या कमी को राजनीतिक सम्मान, अपमान, प्रभाव और शक्ति के चश्मे से देखा जाने लगा है। परिणामस्वरूप सुरक्षा पर होने वाली बहस भी वस्तुनिष्ठ न रहकर राजनीतिक हो जाती है।
व्यंग्यकारों ने अक्सर कहा है कि भारत में नेता जितना बड़ा होता है, उसकी जनता तक पहुंच उतनी ही कठिन हो जाती है। आम नागरिक को अपने प्रतिनिधि से मिलने के लिए दर्जनों स्तरों की अनुमति चाहिए होती है, जबकि चुनाव के समय वही नेता हर गली-मोहल्ले में दिखाई देता है। चुनाव समाप्त होते ही जनता और जनप्रतिनिधि के बीच सुरक्षा, प्रोटोकॉल और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की दीवार खड़ी हो जाती है।
यह स्थिति केवल हास्य का विषय नहीं है बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न भी है। यदि जनप्रतिनिधि जनता से दूर होते जाएंगे, यदि संवाद की जगह सुरक्षा घेरे ले लेंगे और यदि जनसेवा की जगह प्रतिष्ठा प्रदर्शन को महत्व मिलेगा, तो लोकतंत्र का मूल भाव कमजोर होगा। लोकतंत्र की शक्ति जनता के विश्वास में निहित है, न कि सायरन बजाते काफिलों में।
राजनीतिक संस्कृति का उद्देश्य यह होना चाहिए कि नेता जनता के बीच सहजता से जा सके और जनता भी बिना भय तथा औपचारिकताओं के अपने प्रतिनिधि तक पहुंच सके। सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक हो सकती है, लेकिन वह लोकतांत्रिक संवाद की बाधा नहीं बननी चाहिए।
अंततः प्रश्न यही है कि आखिर जनता से किसे खतरा है? यदि कोई नेता वास्तव में जनता का विश्वास अर्जित कर चुका है, तो उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा जनता ही होगी। लेकिन यदि सुरक्षा घेरा लगातार बढ़ता जा रहा है, तो यह केवल खतरे की कहानी नहीं कहता; यह जनता और नेतृत्व के बीच बढ़ती दूरी की कहानी भी कहता है।
लोकतंत्र का वास्तविक सौंदर्य बंदूकधारी सुरक्षाकर्मियों की कतारों में नहीं, बल्कि उस विश्वास में है जहां नेता बिना भय के जनता के बीच चल सके और जनता बिना रोक-टोक के अपने नेता तक पहुंच सके। जिस दिन यह विश्वास पुनः स्थापित होगा, उस दिन शायद सुरक्षा श्रेणियों की चर्चा कम और जनसेवा की चर्चा अधिक होगी।
राजनीति का दुर्भाग्य यह है कि आज जनसेवा की तुलना में प्रोटोकॉल, काफिले, लालबत्ती संस्कृति के अवशेष और सुरक्षा श्रेणियाँ अधिक चर्चा का विषय बन गई हैं। जनता सड़क पर खड़ी रहती है और जनसेवक सुरक्षा के घेरे में निकल जाते हैं। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि लोकतंत्र में सर्वोच्च कौन है- जनता या उसके प्रतिनिधि?
एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान यह नहीं कि उसके नेताओं के पास कितनी सुरक्षा है, बल्कि यह है कि वे बिना भय और आडंबर के जनता के बीच कितनी सहजता से जा सकते हैं। इतिहास गवाह है कि जिन नेताओं को जनता ने हृदय से स्वीकार किया, उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा जनता का विश्वास ही था। यही कारण है कि लोकतंत्र की आत्मा सायरन बजाते काफिलों में नहीं, बल्कि उन रास्तों में बसती है जहाँ नेता और जनता के बीच कोई बैरिकेड नहीं होता है।
—————


