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युवा पीढ़ी का अंधकारमय भविष्य और पल्ला झाड़ती सरकार

निशिकांत ठाकुर/मुट्ठी से जब रेत फिसलने लग जाए, तो इसके बचाव में हजारों कारण गिनाए जा सकते हैं, लेकिन रेत तो मुट्ठी में है ही नहीं। ऐसा कुछ भारत में ही नहीं, विश्व के लगभग सभी देशों में होता आया है। जिनके साथ ऐसा होता है, वे इसके बचाव में बहाने ढूंढते है और इस कार्य में वे सफल भी हो जाते हैं, क्योंकि जिनका नुकसान हुआ होता है, उनकी पहुंच वहां तक होती नहीं है और वे बिल्कुल कड़क कपड़ों में बेदाग साफ बच निकलते हैं। यहां इस बात का उल्लेख करना उचित होगा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने यही तय किया कि देश में वही राजनीतिज्ञ होते हैं या हो सकते हैं, जो आम जनता के बीच से निकलकर सामने आते हैं, उनके सुख—दुःख में साथ रहते हैं और उनकी भावनाओं को समझते हैं या समझने का प्रयास करते हैं। माना यह भी जाता है ऐसे राजनीतिज्ञ जनहित के लिए राज्य और देश की सबसे बड़ी पंचायत में खड़े होकर उसका हल निकालने के लिए कटिबद्ध भी प्रतीत होते हैं। ऐसे राजनीतिज्ञ अभी भी राजनीति के उच्चतम शिखर पर बैठे हैं और जनहित में उचित निर्णय लेने के लिए सरकार को प्रेरित करते हैं। लेकिन, ऐसे सच्चे नेताओं का प्रतिशत बहुत कम है, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे नेताओं से सदन भरा पड़ा है जिन्हें राजनीति विरासत में या कृपा के तौर पर मिली है। ऐसे नेता कभी सार्वजनिक जीवन में घुसकर राजनीति करना नहीं सीखते, विरासत में या कृपा से मिली ऊंची झक तौलिये वाली कुर्सी पर विराजमान होकर मलाई काटते हैं और जनता के सुख—दुख, चिंता—तकलीफ से उन्हें कोई लेना देना नहीं होता!
नीट  यूजी 2026 पेपर लीक के बाद परीक्षा रद्द किए जाने से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह शुक्रवार को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के काम करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक साफ और व्यक्तिगत स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, ऐसी समस्याएं पैदा होती रहेंगी और करोड़ों बच्चों का भविष्य अंधकारमय बना रहेगा। एनटीए जैसी संस्थाओं का एडहॉक स्वरूप एक बड़ी समस्या है और संस्थागत क्षमता विकसित किए बिना सुधार टिकाऊ नहीं होंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने एनटीए को यूपीएससी जैसे संस्थानों से सीख लेने की सलाह देने के साथ यह भी जोड़ा कि एनटीए को अपनी प्रणाली और अनुशासन में सुधार करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने शत—प्रतिशत सही बात कही है, लेकिन उनकी सलाह को अब माने कौन? यदि हम अपनी क्षमता और योग्यता के बलबूते जनता के लिए, समाज के लिए समर्पित कार्य करने के लिए आए हैं, तो निश्चितरूप से हम किसी कमी को निजी जिम्मेदारी मानते हुए निर्वाह करते हैं और यदि हम संविधान की शपथ लेकर आए हैं, तो उसका पालन करते, लेकिन यदि हम पैराशूट या बैसाखी के इम पर उतर आए हैं तो हमारे लिए संविधान के प्रति शपथ लेने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। शिक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अगले वर्ष से एक बड़ा कदम उठाया जाएगा, जिसमें दसवीं और बारहवीं के बोर्ड रिजल्ट आते ही सीबीएसई की ओर से मार्कशीट सीधे छात्र के डिजिलॉकर अकाउंट में भेजी जाएगी। ठीक इसी तरह 2027 से मार्कशीट के साथ—साथ आंसरशीट की स्कैन कॉपी भी डिजीलॉकर में भेजी जाएगी। छात्र इसके बाद पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर सकेंगे। यह संदेश भविष्य में छात्रों को राहत देगा।
अब यह जानते हैं कि जिस पेपर लीक को लेकर आज देश अशांत बना हुआ है और जिनकी असफलताओं का झंडा आज देश—विदेश में लहरा रहा है, वे कौन हैं और उनकी शिक्षा व्यवस्था कैसी हो सकती है। हम अपने देश के केंद्रीय शिक्षा मंत्री की बात कर रहे हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भुवनेश्वर के उत्कल विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की है। वह मूल रूप से ओडिशा के अंगुल जिले के रहने वाले हैं और उनके पिता डॉ. देबेन्द्र प्रधान भी भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। धर्मेंद्र प्रधान ने 1983 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी।
वे 2004 में देवगढ़ (ओडिशा) से 14वीं लोकसभा के लिए सांसद चुने गए। इसके बाद वे मध्य प्रदेश और ओडिशा से राज्यसभा के सदस्य भी रहे हैं। केंद्र में शिक्षा मंत्री बनने से पहले, उन्होंने 2014 से 2021 तक केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री और कौशल विकास मंत्री के रूप में कार्य किया। धर्मेंद्र प्रधान जुलाई 2021 से केंद्रीय शिक्षा मंत्री का पदभार संभाल रहे हैं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में उनकी प्रमुख भूमिका रही है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल (2021 से अब तक) में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और उनमें धांधली के कई मामले सामने आए हैं, हालांकि इस तरह के घोटालों की कोई आधिकारिक या सर्वमान्य संख्या मौजूद नहीं है। विपक्ष और छात्र संगठनों ने उनके कार्यकाल के दौरान दर्जनों या 80 से अधिक बार (विभिन्न राज्य स्तरीय परीक्षाओं सहित) पेपर लीक होने का दावा किया है। धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में हुए कुछ सबसे प्रमुख और विवादित पेपर लीक/धांधली के मामलों में मेडिकल प्रवेश परीक्षा के पेपर लीक और धांधली के गंभीर आरोप लगे। इन मामलों के चलते देशभर में भारी आक्रोश देखा गया जिसकी सीबीआई जांच जारी है। जून 2024 में आयोजित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा को ‘अखंडता से समझौता’ होने के कारण परीक्षा के एक दिन बाद ही रद्द कर दिया गया था [कई राज्यों (जैसे राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि) में भी विभिन्न भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं, जिनमें कुछ केंद्रीय स्तर की परीक्षाओं की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं।
इन व्यापक अनियमितताओं के कारण विपक्ष और छात्र संगठनों द्वारा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की लगातार मांग की जाती रही है सरकार की ओर से इन मामलों में सख्ती दिखाते हुए जांच के आदेश, सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम लागू करने और उच्चस्तरीय कमेटियों के गठन जैसे कदम उठाए गए हैं। देश में स्वतंत्रता के बाद से अब तक (2026 तक) कुल 31 केंद्रीय शिक्षा मंत्री (पूर्ववर्ती मानव संसाधन विकास मंत्री सहित) रह चुके हैं। इनमें सबसे चर्चित शिक्षामंत्री के रूप में धर्मेंद्र प्रधान का नाम लिया जा रहा है ।
एक राष्ट्रीय समाचार पत्र को साक्षात्कार देते हुए शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि नींट के पेपर लीक बच्चों के मुद्दों पर राजनीति नहीं हो। हालांकि, कुछ कमियां जानकारी में आई हैं, जिसकी जिम्मेदारी हम लेते हैं। यह एक अच्छा संदेश देशभर के छात्रों के लिए है कि शिक्षामंत्री ने खामियों को स्वीकार किया। लेकिन, मामला इतने से ही शांत होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। अब छात्र यह कह रहे हैं रोजगार के लिए देश में युवा भटकर अपने जीवन को कोस रहे हैं और कुछ देश के लिए घातक अधिकारियों, नेताओं और दलाल अपने घर को धन से पाट रहे हैं। यहां यही बात हुई कि इतने वर्षों में एक दलाल की संस्था ने अपना दबदबा बनाए रखा और देश के नौजवानों के भविष्य को अंधकारमय करता रहा। अब देश की शिक्षा को पूर्ण नियत्रण करने वाला मंत्री और अधिकारी युवाओं के भविष्य को आधार में लटकाकर मस्ती का जीवन जी रहा है। सच में यह तर्क उचित नहीं है। इसकी सजा यदि देश के लाखों छात्रों के भाग्य को अंधकारमय कर रहा है, तो फिर उसका एक नियंत्रक जो झक सफेद तौलिये से लिपटी कुर्सी पर बैठा है, वह क्या युवाओं के लिए आगे हितकारी हो सकता है! सच तो यह भी है कि इस तरह के मंत्री अपने वंशवाद के नाम पर राजनीति करते हैं और उसी के बल पर वह सत्ता से चिपके रह जाते हैं; क्योंकि वे जानते है कि उनकी बैसाखी काफी मजबूत है और कोई भी उनकी कुर्सी को छीन नहीं सकता, उससे इस्तीफा नहीं ले सकता। वैसे, विपक्षी नेताओं और कई छात्र संगठनों ने शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग करने लगे हैं, लेकिन देखना अब यह है कि क्या युवाओं का भविष्य यूं ही अंधकारमय बना रहेगा और उनसे जुड़े अधिकारियों और मंत्रियों पर कभी गाज भी गिरेगी?

 

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