पौआखाली में सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ मोहर्रम, खिलाड़ियों के हैरतअंगेज करतब बने आकर्षण का केंद्र

किशनगंज, 26 जून (के.स.)। फ़रीद अहमद, ठाकुरगंज प्रखंड के पौआखाली थाना क्षेत्र में मोहर्रम का पर्व शुक्रवार को शांतिपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। पूरे आयोजन के दौरान पुलिस प्रशासन मुस्तैद रहा और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए, जिससे जुलूस एवं अखाड़ा कार्यक्रम सौहार्द पूर्ण माहौल में संपन्न हुआ।
सुबह करीब 9 बजे सुबह मोहर्रम का जुलूस इमामबाड़ा, पौआखाली से शुरू हुआ। जुलूस फूलबाड़ी, एलआरपी चौक, मेला ग्राउंड और सिमलबाड़ी होते हुए लगभग 12 बजे पुनः इमामबाड़ा पहुंचा। इसके बाद दोपहर करीब 2 बजे इमामबाड़ा चौक पर अखाड़ा के खिलाड़ियों ने पारंपरिक करतबों का प्रदर्शन किया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
इसके बाद अखाड़ा लक्ष्मी चौक पहुंचा, जहां खिलाड़ियों ने विभिन्न प्रकार के हैरतअंगेज खेल और पारंपरिक युद्धक कलाओं का प्रदर्शन किया। फिर जुलूस हाई स्कूल रोड होते हुए नानकार पहुंचा, जहां भी कुछ देर तक खिलाड़ियों ने अपने कौशल का प्रदर्शन किया।
पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने आपसी भाईचारे एवं अनुशासन का परिचय दिया। पुलिस प्रशासन की सतर्क निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच मोहर्रम का पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। स्थानीय लोगों ने प्रशासन की व्यवस्थाओं की सराहना की। इस मौके पर थानाध्यक्ष शंख राज कर्ण दल बल के साथ मुस्तैद रहे। इस दौरान जनप्रतिनिधि , समाज सेवी, और मोहर्रम कमेटी टीम भी निगरानी बनाए हुए रहे।
मोहर्रम क्यों मनाया जाता है?
मोहर्रम इस्लामी (हिजरी) कैलेंडर का पहला महीना है। इसकी 10वीं तारीख, जिसे यौम-ए-आशूरा कहा जाता है, विशेष महत्व रखती है। इसी दिन इमाम हुसैन इब्न अली और उनके साथियों ने कर्बला की लड़ाई में अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ते हुए शहादत दी थी।
इमाम हुसैन ने सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और इंसानियत के सिद्धांतों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। इसलिए मोहर्रम को विशेष रूप से शिया मुस्लिम समुदाय शोक और श्रद्धांजलि के रूप में मनाता है, जबकि सुन्नी मुस्लिम भी इस दिन को सम्मान और धार्मिक महत्व के साथ याद करते हैं।
मोहर्रम के अवसर पर कई स्थानों पर ताजिया और जुलूस निकाले जाते हैं। अखाड़ों द्वारा पारंपरिक युद्धक कलाओं और करतबों का प्रदर्शन किया जाता है। मजलिस और धार्मिक सभाओं का आयोजन होता है। लोग इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद कर शांति, न्याय और मानवता का संदेश देते हैं।
पूर्व प्रमुख प्रतिनिधि आदित्य कुमार गणेश ने कहा कि मोहर्रम केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध डटकर खड़े होने, सत्य और इंसानियत के लिए सर्वोच्च बलिदान देने की प्रेरणा का प्रतीक माना जाता है।



