लोकतंत्र की बिसात पर ‘जोड़ा फूल’ का अवसान या ‘पार्टी अपहरण’ का नया अध्याय?
जड़ें बचीं पर छिन गई पहचान: क्या 'फुटबॉल' के सहारे वापसी कर पाएगी ममता?

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया/पटना। बंगाली अस्मिता और राष्ट्रीय राजनीति का नया भूचाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 17-18 सितंबर 2026 की तारीखों को एक ऐसे मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जिसने क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर सबसे बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। निर्वाचन आयोग द्वारा एक अंतरिम आदेश के जरिए ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का नाम और उसका तीन दशकों पुराना प्रतिष्ठित चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ फ्रीज किया जाना सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की तासीर में आ रहे गहरे बदलावों का दस्तावेजीकरण है।
यह घटनाक्रम महज आगामी 6 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता गंवाने वाली ममता बनर्जी के राजनीतिक वजूद और भारतीय जनता पार्टी की कथित ‘विपक्ष-मुक्त’ रणनीति के बीच चल रहे ऐतिहासिक टकराव का चरमोत्कर्ष है।
• पूरा मामला: कैसे ‘घास-फूल’ से छिना उसका नाम और पहचान?
तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह अंदरूनी कलह 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद से ही सुलग रही थी। पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को चुनौती देते हुए अरूप रॉय और रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस घोषित कर दिया।
मामले के मुख्य कानूनी और सांगठनिक बिंदु इस प्रकार हैं:
1. कार्यकारिणी का कार्यकाल : बागी गुट (रीताब्रत बनर्जी कैंप) का मुख्य तर्क यह है कि फरवरी 2022 में गठित की गई तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का तीन साल का कार्यकाल फरवरी 2025 में ही समाप्त हो चुका था। उनके अनुसार, इसके बाद ममता बनर्जी के पास फैसले लेने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं बचा था। उन्होंने जून 2026 में एक विशेष सत्र बुलाकर अरूप रॉय को पार्टी का नया अध्यक्ष चुन लिया।
2. ममता बनर्जी का पक्ष: दूसरी ओर, ममता बनर्जी के वफादार कल्याण बनर्जी और कुणाल घोष जैसे नेताओं ने दलील दी कि मार्च 2026 में चुनाव आयोग को सौंपे गए पार्टी के नए संविधान के तहत पदाधिकारियों का कार्यकाल 5 वर्ष (यानी 2027 तक) है, इसलिए बागी गुट का दावा पूरी तरह अवैध है।
3. चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला: चूंकि उपचुनावों के लिए दोनों गुटों ने अपने-अपने उम्मीदवारों को ‘ एआईटीसी ‘ के आधिकारिक सिंबल पर उतार दिया था, आयोग ने इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए नाम और सिंबल दोनों को अंतरिम रूप से फ्रीज कर दिया ताकि दोनों पक्षों को ‘बराबरी के स्तर’ पर रखा जा सके।
इसके तुरंत बाद, आयोग ने ममता गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम के साथ ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ सिंबल और बागी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम के साथ ‘लिफाफा’ सिंबल आवंटित कर दिया है।
• राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: विपक्ष का कड़ा प्रहार और ‘बर्थडे गिफ्ट’ का तंज
जैसे ही दिल्ली के निर्वाचन सदन से यह आदेश जारी हुआ, कांग्रेस नेतृत्व ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए ममता बनर्जी के समर्थन में मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर एक और गहरा आघात बताया है।
• राहुल गांधी का ‘पार्टी चोरी’ का आरोप: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि, “चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी जनादेश की रक्षा करना है, लेकिन इसके विपरीत, यह उन ताकतों की मदद कर रहा है जो जनता के फैसले को पलट देती हैं।” उन्होंने याद दिलाया कि पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ यही हुआ, फिर एनसीपी को तोड़ा गया और अब वही पैटर्न तृणमूल कांग्रेस के साथ दोहराया जा रहा है। राहुल गांधी ने इसे “पार्टी चोरी और लोकतंत्र के पतन का एक नया क्रूर मॉडल” करार दिया।
• के.सी. वेणुगोपाल का ‘बर्थडे गिफ्ट’ वाला हमला: कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने इस फैसले के समय पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा तंज कसा। उन्होंने लिखा कि, “बीजेपी द्वारा खुलेआम असंवैधानिक रूप से पार्टी को हाईजैक करने के बाद, टीएमसी का नाम और सिंबल फ्रीज करना मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को ‘लेट नाइट बर्थडे गिफ्ट’ (देर रात दिया गया जन्मदिन का तोहफा) है।” वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अब सिर्फ एक कठपुतली बनकर रह गया है जो दलबदल करने वाले बागियों के लिए रेड कारपेट बिछा रहा है।
• अरविंद केजरीवाल की टिप्पणी: आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी इस पर सवाल उठाते हुए पूछा कि, “क्या देश को ऐसा ही जन्मदिन का तोहफा चाहिए? क्या इसी तरह से चुनाव जीते जाएंगे?”
• राजनीतिक और कानूनी तुलना: महाराष्ट्र का ‘पैटर्न’ बनाम बंगाल का ‘फ्रीज’
विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे सवालों के केंद्र में चुनाव आयोग का वह पुराना रवैया है जो उसने पूर्व में महाराष्ट्र के सियासी संकट के दौरान अपनाया था। इस पूरे मामले को निष्पक्ष रूप से समझने के लिए दोनों राज्यों के घटनाक्रमों की तुलना आवश्यक है:
चुनाव आयोग का पहला कदम:
• महाराष्ट्र में: जब शिवसेना के भीतर विवाद बहुत ज्यादा बढ़ गया था, तब शुरुआत में चुनाव आयोग ने ‘तीर-कमान’ निशान और पार्टी के नाम को कुछ समय के लिए रोक (फ्रीज कर) दिया था।
• बंगाल में: यहाँ आगामी उपचुनावों (6 अक्टूबर) की जल्दी को देखते हुए, आयोग ने बिना वक्त गंवाए तुरंत कार्रवाई की और ‘घास-फूल’ सिंबल व नाम को फ्रीज कर दिया।
अंतिम फैसला बनाम अस्थाई फैसला:
• महाराष्ट्र में: आयोग ने बाद में विधायकों और सांसदों की संख्या (विधायी बहुमत) को आधार माना। इसके बाद पूरी पार्टी का नाम और सिंबल सीधे बागी गुट (एकनाथ शिंदे और अजीत पवार) को सौंप दिया।
• बंगाल में: यहाँ अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यह सिर्फ एक अस्थाई (अंतरिम) व्यवस्था है। आयोग ने दोनों गुटों को अलग-अलग नए नाम और नए चुनाव चिह्न (फुटबॉल खिलाड़ी और लिफाफा) दिए हैं।
सत्ता और सरकार का समीकरण:
• महाराष्ट्र में: बगावत तब हुई थी जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे और पार्टी सत्ता में थी। इस बगावत के कारण पूरी सरकार ही गिर गई और तख्तापलट हो गया।
• बंगाल में: यहाँ बगावत तब बड़ी बनी जब तृणमूल कांग्रेस 2026 का चुनाव पहले ही हार चुकी थी और सत्ता से बाहर (विपक्ष में) थी।
विपक्ष का मुख्य आरोप:
• महाराष्ट्र में: विपक्ष का आरोप था कि केंद्र सरकार ने अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करके एक चुनी हुई सरकार को गिराया और पूरी पार्टी को ही हड़प लिया।
• बंगाल में: यहाँ विपक्ष का आरोप है कि चुनाव हार चुकी नेता (ममता बनर्जी) को संगठन के स्तर पर पूरी तरह अकेला किया जा रहा है, ताकि वे दोबारा राजनीतिक रूप से खड़ी न हो सकें।
• क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर मंडराता ‘पैराग्राफ 15’ का साया
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारतीय राजनीति में किसी पार्टी के भीतर असंतोष पैदा होने पर सांगठनिक सुधार या सुलह के रास्ते तलाशने के बजाय, सीधे केंद्रीय संस्थाओं के जरिए पार्टी के प्रतीकों को जब्त कराने की होड़ मच जाती है। सिंबल ऑर्डर 1968 का पैराग्राफ 15, जो कभी पार्टियों के वास्तविक बंटवारे को सुलझाने का एक कानूनी औजार था, अब क्षेत्रीय अस्मिताओं को कुचलने या उन्हें कमजोर करने का एक राजनीतिक हथियार प्रतीत होने लगा है।
ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक करियर संघर्ष और प्रतीकों के इर्द-गिर्द बुना गया है। 1998 में जब उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल बनाई थी, तब यह ‘घास और फूल’ बंगाल के ग्रामीण इलाकों में गरीब, किसान और आम मानुष की आवाज का प्रतीक बना था। आज उसी प्रतीक को फ्रीज कर देना दीदी के समर्थकों के लिए एक गहरा भावनात्मक झटका है। हालांकि, कुणाल घोष का यह दावा कि “हमारे पास ममता बनर्जी का चेहरा है और प्लान बी, सी, डी तैयार हैं,” यह दर्शाता है कि ममता की राजनीति केवल एक कागजी सिंबल पर निर्भर नहीं है, बल्कि उनकी ज़मीनी स्वीकार्यता उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है।
परंतु, इस सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि जब कोई क्षेत्रीय दल आंतरिक लोकतंत्र को दरकिनार कर पूरी तरह ‘एक व्यक्ति केंद्रित’ हो जाता है, तो संगठन के भीतर का असंतोष बाहरी ताकतों के लिए खाद-पानी का काम करता है। 2026 की चुनावी हार के बाद तृणमूल के भीतर उपजा यह असंतोष कहीं न कहीं ममता बनर्जी के अति-केंद्रीकृत नेतृत्व शैली की परिणति भी है, जिसे विरोधी खेमे (बीजेपी) ने बेहद चतुराई से कानूनी चक्रव्यूह में बदल दिया।
• निष्कर्ष: ‘फुटबॉल’ बनाम ‘लिफाफा’ – आगे की राह
चौरसिया ने कहा कि अब गेंद पूरी तरह से बंगाल की जनता और देश की सर्वोच्च अदालत के पाले में है। ममता बनर्जी का गुट इस फैसले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है, क्योंकि उनका मानना है कि इस आदेश में कई कानूनी खामियां हैं। आगामी 6 अक्टूबर के उपचुनाव न केवल यह तय करेंगे कि नंदीग्राम और रेजीनगर की जनता ‘ममता’ के नए ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ को स्वीकार करती है या बागियों के ‘लिफाफे’ को, बल्कि यह इस बात का भी लिटमस टेस्ट होगा कि क्या भारतीय मतदाता किसी नेता की लोकप्रियता को उसके पारंपरिक सिंबल के बिना भी पहचान सकता है या नहीं। लेकिन एक बात साफ है: इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय चुनाव आयोग की साख को एक बार फिर विपक्ष के तीखे सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है, और यह दाग इतनी आसानी से धुलने वाला नहीं है।


