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बिहार का अगला अध्याय विकास का हो।…

लेखक वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया-नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के फैसले के बाद सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नयी भाजपा सरकार ने सत्ता संभाली है. कई भाजपा-नेतृत्व वाली राज्य सरकारों ने सत्ता संभालने के बाद, तथाकथित ‘डबल-इंजन की सरकार’ के जरिये राज्य की समृद्धि के लिए नये रास्ते बनाये है. अब बिहार की बारी है कि वह इसका लाभ उठाए. बिहार की कमियों को उसके अवसरों पर भारी नहीं पड़ने देना चाहिए।

पटना। बिहार भारत की सबसे अहम, लेकिन अधूरी आर्थिक कहानियों में से एक है. एक ऐसा राज्य, जिसकी सभ्यता की जड़ें बहुत गहरी हैं, जिसकी जमीन उपजाऊ है और जहां बड़ी संख्या में युवा आबादी है. बिहार को भारत के उदारीकरण के बाद हुए आर्थिक विकास का स्वाभाविक रूप से फायदा मिलना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय यह एक विरोधाभास में फंसा हुआ है: हाल के वर्षों में यह सबसे तेजी से बढ़ती राज्य अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, फिर भी प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक विकास और मानव विकास के नतीजों के मामले में सबसे निचले पायदान पर है. विकास और समृद्धि के बीच का यह अंतर सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित नहीं है. यह कुल उत्पादन में बढ़ोतरी और असल ढांचागत बदलाव के बीच के फर्क को दिखाता है. बिहार ने 2000 के दशक के मध्य से लगातार राष्ट्रीय जीडीपी विकास दर से बेहतर प्रदर्शन किया है. वर्ष 2022-23 में, इसकी विकास दर 17.9 फीसदी थी, और 23-24 में यह 14.9 प्रतिशत थी, पर इतनी ऊंची विकास दरें प्रति व्यक्ति आय में कोई खास वृद्धि नहीं कर पायी हैं, क्योंकि इसका आधार बहुत कम था और इसकी आबादी राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. इसलिए इसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी सिर्फ 76,490 रुपये (2024-25) है, जो राष्ट्रीय औसत का लगभग 35.7 फीसदी है।

लंबे समय की तस्वीर और भी ज्यादा चौंकाने वाली है. राष्ट्रीय औसत के मुकाबले औसत प्रति व्यक्ति जीडीपी लगातार गिरती जा रही है. वर्ष 1950 में यह 68 फीसदी थी, जो 1960-61 में 54.7 प्रतिशत हुई और 2025-26 (अनुमानित) में 35.7 फीसदी रह गयी. जो राज्य कभी राष्ट्रीय औसत के काफी करीब था, अब प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है. राज्य के अंदर भी असमानताएं साफ नजर आती हैं. पटना के आसपास के जिले उत्तरी और पूर्वी बिहार के गरीब इलाकों के मुकाबले अधिक बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. इसका नतीजा यह है कि लोग लगातार पलायन कर रहे हैं-मजदूर मजदूरी की तलाश में, हुनरमंद लोग मौकों की तलाश में. पूंजी निवेश मुनाफे की तलाश में राज्य छोड़कर जा रहे हैं. यह अपरिहार्य नहीं था. बिहार ने स्वतंत्रता के बाद के युग में पर्याप्त शक्तियों के साथ प्रवेश किया. इसके जलोढ़ मैदानों ने इसे देश के प्रमुख कृषि केंद्रों में से एक बना दिया, जहां देश की करीब 25 फीसदी चीनी और बागवानी उत्पादन का महत्वपूर्ण हिस्सा उत्पादित होता था. बिहार के सत्ताधारी राजनीतिक नेतृत्व ने 1970 से 1990 के दशक के उत्तरार्ध तक दूरदर्शिता, योजना और बुद्धिमत्ता का घोर अभाव दिखाया. कानून-व्यवस्था और शासन संस्थानों के पतन ने उद्योग जगत में भय और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया, जिससे व्यवसायों को बंद करना पड़ा या स्थानांतरित होना पड़ा. परिणामस्वरूप स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में कम निवेश और कम प्रदर्शन हुआ, जो भविष्य के विकास की आधारशिला साबित हो सकते थे. आज, बिहार की अर्थव्यवस्था की संरचना प्रगति और असंतुलन, दोनों दर्शाती है. सेवाओं का उत्पादन में सबसे बड़ा हिस्सा (60 फीसदी) है, जबकि उद्योग का हिस्सा मामूली (20 प्रतिशत) है. कृषि का उत्पादन में हिस्सा काफी कम (20 फीसदी) हो गया है. कृषि अब भी खंडित जोतों, अपर्याप्त सिंचाई, कमजोर विस्तार सेवाओं, सीमित भंडारण क्षमता और बाढ़ एवं सूखे सहित बार-बार आने वाले जलवायु झटकों से बाधित है. बिहार के प्राकृतिक लाभों के बावजूद, उत्पादकता में वृद्धि व्यवस्थित होने के बजाय छिटपुट ही होती है. फिर भी, 50 फीसदी कार्यबल कृषि पर निर्भर है. इसलिए, नीतिगत चुनौती केवल अधिक फसलें उगाना नहीं है, बल्कि विविधीकरण, एकत्रीकरण, रसद, खाद्य प्रसंस्करण व बाजार पहुंच के जरिये किसानों की आय बढ़ाना है।

उद्योग में तो और भी बड़ी कमी है. विनिर्माण में बिहार का हिस्सा क्षमता से काफी कम है, क्योंकि औद्योगीकरण केवल प्रोत्साहनों से प्रेरित नहीं होता है. इसके लिए विश्वसनीय बिजली, परिवहन संपर्क, अनुबंध प्रवर्तन, वित्त तक पहुंच, विकसित भूमि, कुशल श्रम और प्रशासनिक पूर्वानुमान की जरूरत होती है. निवेशक राज्यों की स्थिति की तुलना करते हैं, आकांक्षाओं की नहीं. पूंजी मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र वाले गंतव्यों की और प्रवाहित होती है. इस प्रकार सेवा क्षेत्र का विस्तार हुआ है, पर इसका अधिकांश भाग व्यापार, परिवहन, निर्माण संबंधी गतिविधियों और सार्वजनिक प्रशासन में ही केंद्रित है. प्रौद्योगिकी, वित्त, डिजाइन, विश्लेषण, स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और उन्नत शिक्षा जैसी उच्च उत्पादकता वाली सेवाएं अब भी कम प्रतिनिधित्व वाली हैं. यह इसलिए मायने रखता है, क्योंकि जो राज्य सफलतापूर्वक तेजी से आगे बढ़ते हैं, वे अक्सर ऐसा मैन्युफैक्चरिंग के विस्तार को ज्ञान-आधारित सेवाओं के साथ मिलाकर करते हैं।

फिर भी, सब कुछ निराशाजनक नहीं है. राजकोषीय घाटा एफआरबीएम सीमाओं के भीतर है और 35-40 का ऋण-से-जीडीपी अनुपात प्रभावी रूप से नियंत्रण में है. ग्रामीण कनेक्टिविटी, ग्रामीण विद्युतीकरण और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में महत्वपूर्ण सुधार किये गये हैं. हालांकि, औद्योगिक इकोसिस्टम बनाने, शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स तथा वेयरहाउसिंग में अब भी कमियां हैं. पर बिहार की कमियों को उसके अवसरों पर भारी नहीं पड़ने देना चाहिए, जब देश का अधिकांश हिस्सा धीरे-धीरे बूढ़ा हो रहा है, तब बहुत कम राज्यों के पास इतनी बड़ी युवा आबादी है. बहुत कम राज्यों के पास इतनी उपजाऊ जमीन और जल-आधारित कृषि क्षमता है. बहुत कम राज्य पूर्वी भारत, नेपाल और व्यापक गंगा-तटीय बाजार के बीच रणनीतिक रूप से इतनी अच्छी स्थिति में हैं. बिहार अब भी मजदूर-निर्यात करने वाले राज्य से उद्यम आकर्षित करने वाले राज्य में बदल सकता है. नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के फैसले के बाद सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नयी भाजपा सरकार ने सत्ता संभाली है. कई भाजपा नेतृत्व वाली राज्य सरकारों ने सत्ता संभालने के बाद, तथाकथित ‘डबल-इंजन की सरकार’ के जरिये राज्य की समृद्धि के लिए नये रास्ते बनाये हैं. उन प्रयासों के परिणाम उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी साफ दिखायी दे रहे हैं. अब बिहार की बारी है कि वह इसका लाभ उठाए. बिहार का अगला अध्याय पीछे रहने का नहीं, बल्कि तालमेल और विकास का होना चाहिए, यहां के नागरिक इससे बेहतर के हकदार हैं. लेकिन इसके लिए पहचान और शिकायतों की राजनीति से आगे बढ़कर प्रभावी दृष्टिकोणों और काम को जमीन पर उतारने वाले अर्थशास्त्र की ओर बढ़ना होगा।

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