ताजा खबर

बाबू वीर कुंवर सिंह जयंती पर इतिहास रचेगा बिहार  – आशुतोष मिश्रा(बिहार भाजपा IT&social media)

जब देश में स्वाधीनता के लिए भावनात्मक ही सशस्त्र रुप मे भी स्वाधीनता कि अग्नि की ऊंची ऊँची लपटें उठ रहीं थीं तो बिहार भी इस सब से किस प्रकार से अछूता रह पाता|60 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते अच्छे-अच्छे पानी मांगते दिखते हैं. कई तो बीमारियों के चलते बिस्तर से उठ तक नहीं पाते. ऐसे में यह किसी कल्पना जैसा ही लगता है कि इतिहास में कोई ऐसा व्यक्ति भी रहा होगा… जिसने 80 वर्ष की आयु में ना केवल अंग्रेजों के खिलाफ़ युद्ध का बिगुल बजाया, बल्कि कई युद्धों में अंग्रेजों के दांत भी खट्टे किए. इतिहास के पन्नों में दर्ज बाबू वीर कुंवर सिंह ऐसे ही एक नाम हैं. 80 की उम्र में उनके द्वारा दिखाये गये अदम्य साहस के सम्मान में आज भी लोगों का सिर झुका जाता है.

‘पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं’ वाली कहावत को सत्य करते हुए कुंवर साहब के बाग़ी तेवर बचपन से ही दिखने लगे थे. वह आम बालकों की तरह बच्चों वाले खेल खेलने के विपरीत अपना समय घुड़सवारी, निशानेबाज़ी, तलवारबाज़ी सीखने में व्यतीत करते. उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनकी युद्ध कलाओं को सीखने की रूचि भी बढ़ने लगी. उन्होंने मार्शल आर्ट जैसी कठिन विद्या भी सीखी.

 

गोरिल्ला युद्ध नीति में माहिर थे ‘कुंवर साहब’

1777 ई. में बिहार के शाहाबाद में एक बच्चे की किलकारियां गूंजी. नाम रखा गया ‘बाबू वीर कुंवर सिंह’. पिता कुंवर साहब राजा साहबज़ादा सिंह और माता पंचरत्न देवी,पिता के सपनों के साथ कुंवर धीरे-धीरे बड़ा होने लगा. चूंकि, उनका संबंध परमार राजपूत समुदाय की शाखा उज्जैनी राजपूत कुल से था,

यह वह दौर था, जब देश पर अंग्रेजों का राज था. वह तेजी से अपने बिस्तार के लिए हर तरफ प्रयास में रहते थे. उनकी आंखों में अंग्रेजों की क्रूरता की कई तस्वीरें कैद होती जा रही थीं. वह अपने अंदर धधकने वाली आग में अंग्रेज़ी हुकूमत को जला कर राख कर देना चाहते थे.हर मोर्चे पर अंग्रेजों को किया ‘चित्त’

अंग्रेज़ी हुकूमत से आमने सामने युद्ध कर पाना उस समय किसी के लिए आसान नहीं थी. बावजूद इसके उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध किया. उन्हें अपने कुछ शुरुआती दांव कमजोर दिखे, तो उन्होंने अपनी गोरिल्ला युद्ध नीति का सहारा लिया.

कुंवर साहब का यह दांव अंग्रेजों पर भारी पड़ी. इस युद्ध नीति से अंग्रेज़ों को जन-धन का नुक्सान ही नहीं हुआ, बल्कि इससे उनकी मानसिकता पर भी गहरा असर पड़ा. उन्होंने आपा खोते हुए क्रांतिकारियों पर हर तरफ से हमला करना आरंभ कर दिया. साथ ही साथ कुंवर साहब के महल को भी आग लगा दी.

अपना महल जलता देखकर कुंवर साहब मौत बनकर अंग्रजों के ऊपर टूट पड़े. वहां अंग्रेजों को मात देने के बाद वह तांत्या टोपे और नाना साहेब के साथ कानपुर में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने गये और युद्ध में अंग्रेजों को धूल चटाई. इस युद्ध में कुंवर साहब की वीरता ने सबको बहुत प्रभावित किया.

कुंवर साहब ने कानपुर के बाद आजमगढ़ में भी अंग्रेजों को नाकों चने चबवाया. हालॉंकि, हर बार विजय मिलने के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत दोबारा अपनी पूरी ताक़त से हमला कर के अपना कब्ज़ा वापिस ले लेती थी. बावजूद इसके वह कुंवर साहब से पूरी तरह भयभीत रहते थे.

आजमगढ़ के युद्ध के बाद बाबू कुंवर सिंह 20 अप्रैल 1958 को गाजीपुर के मन्नोहर गाँव पहुंचे. वहां से वह आगे बढ़ते हुए 22 अप्रैल को नदी के मार्ग से जगदीशपुर के लिए रवाना हो गये. इस सफर में उनके साथ कुछ साथी भी थे. इसकी खबर किसी गद्दार ने अंग्रेजों को दे दी.

इस कारण अंग्रेजों ने पूरी ताकत के साथ उन्हें नदी में ही घेर लिया. अंग्रेजों की तुलना में कुंवर साहब के पास संख्या में बहुत कम साथी थे. फिर भी उन्होंने आगे बढ़कर अंग्रेजों से दो-दो हाथ किये और आगे बढ़ते रहे. वह लगभग अंग्रेजों को पूरी तरह पीछे धकेलने में कामयाब हो गये थे. तभी किसी अंग्रेज ने छिपकर उन पर गोली चला दी. इस वार से उनका दाहिना हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया था. जितनी तेजी से उनका खून बह रहा था. उतनी ही तेजी से उनकी तलवार चल रही थी.

थोड़ी ही देर में गोली के ज़हर ने शरीर में फैलना शुरु कर दिया. कुंवर साहब को अंदाजा हो चला था कि थोड़ी और देरी की गई तो यह गोली का जहर उनके पूरे शरीर में फैल जायेगा. इसलिए उन्होंने देरी किए बिना कटार निकाली और अपनी भुजा काट कर यह कहते हुए गंगा माँ को समर्पित कर दिया कि ‘हे माँ गंगा! अपने इस पुत्र की ओर से ये तुच्छ उपहार स्वीकार करो.”दाहिनी भुजा कट जाने के उपरांत भी कुंवर साहब अंग्रेजों से लड़ते रहे और अंतत: जगदीशपुर पहुंचने में सफल रहे.गोली का फ़ैल चुका ज़हर और खून के लगातार रिसाव के कारण कुंवर साहब की स्थिति नाजुक होती जा रही थी. उन्हें सलाह दी गई कि उन्हें कुछ दिन युद्ध से दूर रहना चाहिए. वह मुस्कुराते हुए आग बढ़े और कैप्टन ली ग्रैंड के नेतृत्व वाली अंग्रेज़ी सेना से लड़ाई लड़ी.

कुंवर साहब की सेना की वीरता के आगे अंग्रेजों ने घुटने टेक दिए और जगदीशपुर पर कुंवर साहब का पुनः अधिकार हो गया. इतनी बड़ी जीत के बाद भी जगदीशपुर और साथ के इलाकों में मातम छाया था क्योंकि कुंवर साहब की हालत बिगड़ती चली जा रही थी. अपनी मातृभूमि को अंग्रेजों के कब्ज़े से आज़ाद कराने के तीन दिन बाद 26 अप्रैल 1858 को कुंवर साहब वीरगति को प्राप्त हो गए.

बाबु वीर कुंवर सिंह को इतिहास हमेशा याद रखेगा. आज भी वह पूरे देश के लिए एक प्रेरणा हैं. उनका व्यक्तित्व बताता है कि किसी भी काम के लिए इंसान के अन्दर अगर सच्ची लगन हो, तो वह उम्र के किसी भी पड़ाव पर दुनिया को हिला सकता है.

 

ऐसे वीर और पराक्रमी योद्धा को शत-शत नमन.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button