मातोश्री का ढहता किला: वैचारिक भटकाव और महत्वाकांक्षा की वेदी पर ‘सिटाडेल’ का पतन दिल्ली दरबार में ‘ऑपरेशन टाइगर’ और संख्याबल का अचूक गणित
बाल ठाकरे की विरासत बनाम अवसरवादी कूटनीति: क्षेत्रीय अस्मिता का बदलता नैरेटिव

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया/राजनीति में इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन महाराष्ट्र की सियासत में यह दोहराव इतनी तेजी और क्रूरता से होगा, इसकी कल्पना शायद उद्धव ठाकरे ने भी नहीं की थी। जून 2022 में जो पटकथा विधानसभा के स्तर पर एकनाथ शिंदे ने सूरत और गुवाहाटी के रास्ते लिखी थी, ठीक चार साल बाद जून 2026 में उसी पटकथा का दूसरा भाग देश की राजधानी दिल्ली में दोहराया जा रहा है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 का अचानक बगावत का बिगुल फूंक देना और राष्ट्रीय राजधानी में पार्टी व्हिप का उल्लंघन करना महज एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। यह उस क्षेत्रीय सांगठनिक ढांचे के ढहने की लाइव कमेंट्री है, जिसे कभी अभेद्य माना जाता था।
इसे केवल ‘दलबदल’ या ‘पार्टी तोड़ना’ कहना सतही विश्लेषण होगा। यह मूलतः एक वैचारिक संकट, नेतृत्व की विफलता और सत्ता के बदलते केंद्रों के बीच तालमेल न बिठा पाने का परिणाम है। दिल्ली के ‘होटल पॉलिटिक्स’ से लेकर लोकसभा अध्यक्ष के दफ्तर तक फैली इस बगावत की गूंज भारतीय लोकतंत्र में क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व और उनकी प्रासंगिकता पर गहरे सवाल खड़े करती है।
संख्याबल का अचूक गणित और कानूनी चक्रव्यूह
इस राजनीतिक भूचाल का सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू इसका कानूनी और सांख्यिकी ढांचा है। दलबदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) के कड़े प्रावधानों से बचने के लिए किसी भी बागी गुट को सदन में मौजूद अपनी मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का समर्थन जुटाना अनिवार्य होता है।
शिवसेना (यूबीटी) के पास लोकसभा में कुल 9 सदस्य थे। इस गणित के हिसाब से बगावत को कानूनी अमलीजामा पहनाने और संसद सदस्यता बचाने के लिए सटीक 6 सांसदों की आवश्यकता थी। दिल्ली में बुलाई गई संसदीय दल की बैठक में जब केवल अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजभाऊ वाजे ही पहुंचे, तो पर्दे के पीछे चल रही पटकथा पूरी तरह साफ हो गई। बाकी के 6 सांसद—संजय देशमुख, ओमप्रकाश राजेनिम्बालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश आष्टिकर, संजय जाधव और संजय दीना पाटिल—न केवल नदारद रहे, बल्कि उन्होंने एकजुट होकर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को एक पत्र सौंप दिया।
यह पत्र महज एक सूचना नहीं, बल्कि कानूनी सुरक्षा कवच है। बागी सांसदों ने खुद को एक अलग समूह के रूप में मान्यता देने और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली ‘मूल’ शिवसेना में अपने विलय की मांग की है। उद्धव गुट के मुख्य सचेतक द्वारा जारी व्हिप को ठेंगा दिखाकर इन सांसदों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अब ‘मातोश्री’ के अनुशासन के दायरे से बाहर जा चुके हैं। हालांकि, अरविंद सावंत और संजय राउत ने स्पीकर से मिलकर इस अवैध दलबदल को रोकने की गुहार लगाई है, लेकिन दो-तिहाई के जादुई आंकड़े के कारण बागियों का पलड़ा कानूनी रूप से बेहद मजबूत नजर आ रहा है।
‘ऑपरेशन टाइगर’ और नैतिकता के दावों की जमीनी हकीकत
शिवसेना (यूबीटी) के रणनीतिकार और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने इस टूट को ‘ऑपरेशन टाइगर’ का नाम देते हुए बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सनसनीखेज आरोप लगाया कि महायुति और भाजपा के इशारे पर उनके सांसदों को 50-50 करोड़ रुपये का प्रलोभन दिया गया, जिसमें से 15 करोड़ रुपये एडवांस के तौर पर दिए जा चुके हैं। राजनीति में धनबल के इस्तेमाल के आरोप नए नहीं हैं, लेकिन इन आरोपों के पीछे छिपी बेबसी को समझना जरूरी है।
संजय राउत का यह कहना कि “जिन्हें जाना है जाएं, हम जनता की अदालत में लड़ेंगे,” दरअसल सांगठनिक कमजोरी को स्वीकार करने जैसा है। यदि कोई पार्टी अपने सांसदों को एक साथ रखने में असमर्थ है, तो वह केवल विरोधी दलों के ‘ऑपरेशन’ को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। चार्टर्ड प्लेन से सांसदों का दिल्ली पहुंचना और नोएडा के होटलों में रुकना यह दर्शाता है कि यह बगावत रातों-रात नहीं हुई, बल्कि इसकी योजना बेहद सूक्ष्म स्तर पर महीनों से तैयार की जा रही थी।
वैचारिक भटकाव: कांग्रेस से हाथ मिलाने की कीमत?
इस पूरे संकट की जड़ें उस वैचारिक समझौते में छिपी हैं जो 2019 में महाविकास अघाड़ी के गठन के समय किया गया था। बाल ठाकरे ने जिस शिवसेना की स्थापना प्रखर हिंदुत्व और गैर-कांग्रेसी राजनीति की नींव पर की थी, उद्धव ठाकरे ने सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए उसी कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लिया था।
बागी सांसदों के खेमे से जो बातें छनकर बाहर आ रही हैं, उनके अनुसार सांसदों में इस बात को लेकर गहरा असंतोष था कि पार्टी धीरे-धीरे अपनी मूल पहचान खो रही है। जमीनी स्तर पर शिवसेना का जो कैडर पारंपरिक रूप से कांग्रेस विरोधी रहा है, वह इस गठबंधन को पचा नहीं पा रहा था। सांसदों को यह डर सता रहा था कि आगामी चुनावों में कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे और वैचारिक घालमेल के कारण उनका राजनीतिक भविष्य दांव पर लग जाएगा। एकनाथ शिंदे ने इसी दुखती रग पर हाथ रखा। उन्होंने सांसदों को यह समझाने में सफलता हासिल की कि असली वैचारिक विरासत आज भी शिंदे गुट के पास है, जो भाजपा के साथ मिलकर प्राकृतिक हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है।
महायुति की बिसात: केवल तोड़-फोड़ नहीं, सुदूरगामी चुनावी कूटनीति
शिवसेना (यूबीटी) में लगी इस हालिया सेंध को केवल एक विपक्षी दल को कमजोर करने के चश्मे से देखना भूल होगी। परदे के पीछे सक्रिय महायुति गठबंधन (भाजपा, शिंदे गुट और अजीत पवार की एनसीपी) की रणनीति बेहद सुदूरगामी, गणितीय और आक्रामक है। इस पूरे घटनाक्रम के जरिए महायुति ने महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली दरबार तक अपनी अगली चालें तय कर दी हैं:
• केंद्रीय संसद में ‘सुपर मेजॉरिटी’ का रास्ता साफ करना: भले ही केंद्र में एनडीए के पास सरकार चलाने के लिए आवश्यक संख्या बल मौजूद हो, लेकिन समान नागरिक संहिता और परिसीमन के बाद महिला आरक्षण कानून जैसे बड़े संवैधानिक संशोधनों को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की दरकार है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर हुई हालिया हलचल और अब महाराष्ट्र से उद्धव गुट के 6 सांसदों को अपने पाले में लाना इसी ‘मिशन 362’ (दो-तिहाई सीट) का हिस्सा माना जा रहा है। महायुति के नीति-नियंताओं का लक्ष्य है कि संसद के दोनों सदनों में सरकार का हाथ इतना मजबूत हो जाए कि सहयोगियों के किसी भी दबाव को आसानी से बेअसर किया जा सके।
• ‘जूनियर पार्टनर’ के ठप्पे से बाहर निकलने की शिंदे की छटपटाहट: यह बगावत केवल उद्धव को झटका देने के लिए नहीं, बल्कि महायुति गठबंधन के भीतर अपनी ताकत बढ़ाने के लिए भी मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का एक मास्टरस्ट्रोक है। पूर्व में हुए सीटों के बंटवारे और केंद्रीय मंत्रिमंडल में केवल राज्यमंत्री (MoS) पद मिलने से शिंदे गुट के भीतर सुगबुगाहट थी। अब संसद के निचले सदन में खुद के 7 और बागी 6 सांसदों को मिलाकर शिंदे गुट के पास कुल 13 लोकसभा सांसद हो जाएंगे। इस संख्या बल के साथ एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र की राजनीति में ‘नंबर वन’ ताकत बनकर उभरेंगे, जो गठबंधन के भीतर अपनी शर्तों पर सीट शेयरिंग और पावर शेयरिंग तय करने का माद्दा रखेंगे।
• ‘चेन रिएक्शन’ की तैयारी: विधायकों और शरद पवार गुट पर नजर: राजनीतिक गलियारों और विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो यह सिर्फ सांसदों तक सीमित रहने वाला खेल नहीं है। इसे एक ‘चेन रिएक्शन’ (श्रृंखलाबद्ध प्रक्रिया) की तरह डिजाइन किया गया है। इस रणनीतिक सफलता के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि शिवसेना (यूबीटी) के लगभग 14 से 16 विधायक भी आने वाले हफ्तों में अपने सांसदों के नक्शेकदम पर चल सकते हैं। इतना ही नहीं, महायुति की नजर इस समय शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP-SP) के भी कुछ असंतुष्ट सांसदों और विधायकों पर टिकी है। इस रणनीतिक चौसर का मुख्य उद्देश्य विपक्ष के पूरे मनोबल को इस कदर ध्वस्त कर देना है कि वे चुनावी समर में उतरने से पहले ही मानसिक रूप से हार स्वीकार कर लें।
• कानूनी कवच और वाई प्लस सुरक्षा : विपक्ष के किसी भी विधिक जवाबी हमले को नाकाम करने के लिए महायुति के शीर्ष कानूनी सलाहकारों की टीम ने पहले ही पुख्ता तैयारी कर ली है। दलबदल कानून के तहत दो-तिहाई के जादुई आंकड़े (9 में से 6 सांसद) का उपयोग कर लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष विलय की अर्जी देना इसी ढाल का हिस्सा है। इसके साथ ही, महाराष्ट्र सरकार ने तत्परता दिखाते हुए इन सभी 6 बागी सांसदों को वाई प्लस श्रेणी का कड़ा सुरक्षा कवच भी प्रदान कर दिया है, ताकि जमीनी स्तर पर उद्धव गुट के कार्यकर्ताओं (शिवसैनिकों) के किसी भी संभावित हिंसक आक्रोश या विरोध से इन्हें सुरक्षित रखा जा सके और पूरे ‘ट्रांजिशन’ को शांतिपूर्ण दिखाया जा सके।
राष्ट्रीय राजनीति और महाराष्ट्र के समीकरणों पर प्रभाव
यह बगावत केवल शिवसेना (यूबीटी) के लिए झटका नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन (I.N.D.I.A. ब्लॉक) के लिए भी एक बहुत बड़ा कूटनीतिक नुकसान है।
19 जून को शिवसेना का 60वां स्थापना दिवस है। इस ऐतिहासिक दिन से ठीक पहले इस ऑपरेशन को अंजाम देकर शिंदे और भाजपा गठबंधन ने उद्धव ठाकरे को मनोवैज्ञानिक रूप से पस्त कर दिया है। यह संदेश देने की कोशिश है कि शिवसेना का नाम और निशान ही नहीं, बल्कि उसके प्रतिनिधि भी अब पूरी तरह शिंदे के साथ हैं। इसके साथ ही वे संसद में महाराष्ट्र से सबसे बड़ी ताकत बन जाएंगे, जो भाजपा (9 सांसद) और शरद पवार की राकांपा से भी अधिक है।
निष्कर्ष: नेतृत्व शैली पर आत्ममंथन का समय
उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी कमजोरी उनका ‘रिमोट कंट्रोल’ और संवादहीनता की राजनीति रही है। बाल ठाकरे के समय में भी बगावतें हुईं (छगन भुजबल, नारायण राणे), लेकिन तब संगठन की पकड़ इतनी कमजोरी नहीं थी कि पूरी की पूरी विधायिका और संसदीय दल ही हाथ से निकल जाए।
2022 में विधायकों का जाना और 2026 में सांसदों का जाना यह सिद्ध करता है कि ‘मातोश्री’ का वह पुराना खौफ और आकर्षण अब समाप्त हो चुका है। कारण बताओ नोटिस और अदालती लड़ाइयों से सुर्खियां तो बटोरी जा सकती हैं, लेकिन खोया हुआ जनाधार और बिखर चुका संगठन वापस नहीं पाया जा सकता। उद्धव ठाकरे के लिए यह केवल अपनी पार्टी बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि ठाकरे सरनेम की उस राजनीतिक प्रासंगिकता को बचाने की अंतिम जंग है, जिसे उनके पिता ने खून-पसीने से सींचा था। यदि अब भी आत्ममंथन नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब शिवसेना का यह गुट केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा।

