• ज्ञान की नगरी या कोचिंग कारोबार का रणक्षेत्र? • जब शिक्षक ही लड़ने लगें, तो छात्र किससे सीखें? • खान सर विवाद से लेकर कोचिंग संस्थानों की टकराहट तक, आखिर शिक्षा के मंदिरों में यह कैसा माहौल बन रहा है?

वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया/पटना को कभी पूर्वी भारत की शैक्षणिक राजधानी कहा जाता था। यहां देश के कोने-कोने से छात्र अपने सपनों को साकार करने आते हैं। माता-पिता अपनी जमा-पूंजी खर्च कर बच्चों को इस उम्मीद के साथ पटना भेजते हैं कि वे पढ़-लिखकर एक बेहतर भविष्य बनाएंगे। लेकिन हाल के दिनों में जो तस्वीर सामने आ रही है, वह बेहद चिंताजनक है।
मशहूर शिक्षक खान सर के कोचिंग संस्थान पर हुए हमले, पत्थरबाजी और उसके बाद सामने आई राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सवाल सिर्फ एक कोचिंग संस्थान या एक शिक्षक तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र, समाज और शासन व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
• सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अगर शिक्षा के केंद्र ही संघर्ष और शक्ति प्रदर्शन के अखाड़े में बदल जाएं तो छात्रों को आखिर क्या संदेश मिलेगा?
पटना में पिछले कुछ वर्षों में कोचिंग उद्योग अरबों रुपये का कारोबार बन चुका है। हर गली, हर मोहल्ले और हर चौक पर कोचिंग संस्थानों के बड़े-बड़े बोर्ड दिखाई देते हैं। शिक्षा अब सेवा कम और बाजार ज्यादा बनती जा रही है। इसी बाजारवाद ने प्रतिस्पर्धा को कई बार कटुता और वर्चस्व की लड़ाई में बदल दिया है।
खान सर का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लाखों छात्र उन्हें एक शिक्षक के रूप में देखते हैं। उनकी लोकप्रियता केवल बिहार तक सीमित नहीं रही बल्कि पूरे देश में फैली है। ऐसे में उनके संस्थान पर हमला होना सिर्फ एक व्यक्ति या संस्थान पर हमला नहीं माना जाएगा, बल्कि यह उस भरोसे पर भी चोट है जो छात्र अपने शिक्षकों पर करते हैं।
हालांकि पुलिस जांच जारी है और सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन घटना ने यह संकेत जरूर दिया है कि शिक्षा के क्षेत्र में भी तनाव, प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की राजनीति गहराती जा रही है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ ही दिन पहले देशभर में चर्चित पत्रकार अंजना ओम कश्यप के एक बयान को लेकर खान सर समेत कई शिक्षकों ने खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उस विवाद ने शिक्षा जगत को एकजुट होते हुए दिखाया था। शिक्षक छात्रों और समाज के मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करते नजर आए थे।
लेकिन उसके तुरंत बाद कोचिंग संस्थानों के बीच विवाद और टकराव की खबरें सामने आना एक अलग तस्वीर पेश करती हैं। एक तरफ शिक्षक समाज को दिशा देने की बात करते हैं, दूसरी तरफ उन्हीं के इर्द-गिर्द विवाद, संघर्ष और शक्ति प्रदर्शन की खबरें आती हैं। यह विरोधाभास छात्रों को भ्रमित करता है।
समाज में शिक्षक का स्थान हमेशा विशेष रहा है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, वह व्यवहार, संस्कार और सामाजिक चेतना भी देता है। छात्र केवल किताबों से नहीं सीखते, वे अपने शिक्षकों को देखकर भी सीखते हैं।
ऐसे में जब शिक्षक आपसी संघर्षों, विवादों या शक्ति प्रदर्शन के केंद्र में दिखाई देते हैं तो छात्रों के मन में शिक्षा और शिक्षकों की छवि प्रभावित होती है।आज जरूरत इस बात की है कि कोचिंग संस्थान केवल रिजल्ट और विज्ञापन की दौड़ में न भागें बल्कि अपने सामाजिक दायित्व को भी समझें। शिक्षा का उद्देश्य प्रतियोगिता में जीतना भर नहीं, बल्कि बेहतर नागरिक तैयार करना भी है।
इस पूरे मामले में सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। बिहार सरकार लगातार कानून व्यवस्था को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताती रही है। जदयू और भाजपा नेताओं ने भी कहा है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल घटना के बाद कार्रवाई पर्याप्त है?
• क्या प्रशासन के पास ऐसा कोई तंत्र है जो कोचिंग संस्थानों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और तनाव पर नजर रख सके?
• क्या हजारों छात्रों से भरे इलाकों में सुरक्षा के विशेष इंतजाम हैं?
• क्या शिक्षा उद्योग के बढ़ते व्यावसायीकरण पर सरकार की कोई स्पष्ट नीति है?
इन सवालों के जवाब अभी भी तलाशे जाने बाकी हैं।
पटना के राजेंद्र नगर, मुसल्लहपुर हाट, बोरिंग रोड और कंकड़बाग जैसे इलाके आज शिक्षा के बड़े केंद्र बन चुके हैं। यहां लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है। अगर ऐसे क्षेत्रों में हिंसा, तनाव या शक्ति प्रदर्शन की घटनाएं होंगी तो सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों का होगा।
बिहार पहले ही प्रतिभा पलायन की समस्या से जूझ रहा है। बड़ी संख्या में छात्र कोटा, दिल्ली, प्रयागराज और अन्य शहरों की ओर जाते हैं। यदि पटना जैसे शिक्षा केंद्रों की छवि खराब होती है तो इसका सीधा असर राज्य की शैक्षणिक साख पर पड़ेगा।
यह भी याद रखना होगा कि कोचिंग संस्थान स्कूल और विश्वविद्यालय का विकल्प नहीं हैं। वे केवल सहायक संस्थान हैं। लेकिन दुर्भाग्य से आज कई जगहों पर शिक्षा का पूरा ढांचा कोचिंग संस्कृति के इर्द-गिर्द घूमने लगा है।
• इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या हम शिक्षा को ज्ञान का माध्यम बना रहे हैं या कारोबार का?
• क्या छात्र सीखने के लिए कोचिंग जा रहे हैं या किसी ब्रांड का हिस्सा बनने के लिए?
• क्या शिक्षक समाज निर्माता हैं या प्रतिस्पर्धी कारोबारी?
इन सवालों से बचा नहीं जा सकता।
बिहार की पहचान केवल राजनीति से नहीं, बल्कि शिक्षा और ज्ञान की समृद्ध परंपरा से भी रही है। नालंदा और विक्रमशिला की विरासत वाले प्रदेश में शिक्षा के केंद्रों को संघर्ष और विवाद का प्रतीक नहीं बनने दिया जा सकता।
आज जरूरत है आत्ममंथन की। जरूरत है कि शिक्षक, कोचिंग संचालक, सरकार, प्रशासन और समाज सभी मिलकर यह सुनिश्चित करें कि शिक्षा के मंदिरों में पत्थर नहीं, विचार चलें। वहां शक्ति प्रदर्शन नहीं, ज्ञान का प्रकाश फैले। क्योंकि जिस दिन छात्र यह मानने लगेंगे कि सफलता का रास्ता संवाद नहीं बल्कि संघर्ष है, उस दिन केवल शिक्षा व्यवस्था नहीं, पूरा समाज हार जाएगा।


