‘बाहुबली’ बनने की जंग में पिसता विश्व निशिकांत ठाकुर।…
नीलेंदु कुमार झा/मीडिया में एक नीतिगत बात कही जाती है कि देश में चुनाव हो या देश पर युद्ध का साया पड़ रहा हो, तो जागरूक दर्शक और पाठक मीडिया में प्रसारित होने वाली खबरों पर ही भरोसा करते हैं। इस वर्ष देश के कई राज्यों में चुनाव तो है, लेकिन अमेरिका—इज़राइल और ईरान के बीच जो युद्ध चल रहा है, उसके लपेटे में भारत सहित विश्व के कई देशों के आने से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। ईरान चुन—चुनकर खाड़ी के विभिन्न देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है। अमेरिका सहित विश्व के किसी भी देश को ऐसा अनुमान नहीं था कि उसे ऐसी दुर्गति का सामना करना पड़ सकता है। यहां तक कि महाशक्ति के अधिकारी तक यह कहते हुए त्यागपत्र दे रहे हैं कि इजरायल के उकसावे और वहां के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के कहने पर अमेरिका ने युद्ध में कूदकर ईरान को नुकसान पहुंचाया है और वहां के सर्वोच्च नेताओं सहित कई राजनीतिज्ञों और अधिकारियों की हत्या कर चुका है। ऐसी स्थिति में इस सच से देश की जनता को अवगत कराना मीडिया का कर्तव्य हो जाता है कि वह अपनी साख को कायम रखते हुए सरकार के साथ खड़े होने का भरोसा दिलाए। वैसे इस तरह की विषम स्थिति में निशाना केवल वही होते हैं, जो सामान्य नागरिक होते हैं, लेकिन हमें देश के प्रति जागरूक रहना ही होगा और सामान्य नागरिक को गुमराह करने के बजाय उन्हें अपना मार्गदर्शक बनने की अपील करना होगा ।
आज विश्व की जो स्थिति बन गई है, उसपर कोई भी यह कह सकता है कि यह युद्ध केवल अपने बाहुबली होने का सबूत देने के लिए शुरू किया गया है, लेकिन हां, युद्ध बहुत सोच—समझकर ही लड़ा जाता है; क्योंकि वहां जीत या हार आदेश देने वालों की नहीं, बल्कि अग्रिम पंक्ति में खड़े सैनिकों की होती है, पर किसी देश को अपनी सीमा को तो मजबूत करना ही पड़ता है। इस युद्ध को, जिसे अमेरिकी दो चार दिन की लड़ाई मान रहा था, अब चार सप्ताह होने के बाद भी शांत होता नजर नहीं आ रहा है। आगे देखना होगा कि इसका असर विश्व के किस देश पर कितना पड़ता है। सबसे पहले यह समझना होगा कि आखिर यह युद्ध लड़ा ही क्यों जा रहा है? तो, अमेरिका का यह कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा था, जिससे विश्व को खतरा पैदा हो सकता है। पहले यह लड़ाई जून 2025 में कुछ दिनों तक लड़ा गया, लेकिन अमेरिका का यह दावा गलत साबित हुआ कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है। युद्ध बंद हुआ, अब फिर वही कहकर ईरान का परमाणु हथियार बनाना विश्व के लिए खतरा पैदा करता है, कहते हुए 28 फरवरी को तीस बम मारकर ईरान के सर्वोच्च नेता सहित कई राजनीतिज्ञों और अधिकारियों की हत्या कर दी गई। उसके बाद से यह जंग जारी है जिसके लपेटे में खाड़ी के कई देशों सहित विश्व प्रभावित हो रहा है।
आज स्थिति यह हो गई है कि ईरान ने अमेरिका के एफ—35 विमान को जिसे ‘अजेय’ कहा जाता था, को मार गिराया। वैसे, अमेरिका इसे अस्वीकार करते हुए कहा है कि आपात लैंडिंग के कारण विमान क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन पायलट सुरक्षित है। फिर ईरान ने इजरायल के डिएगो गार्सिया पर मिसाइलें दागकर यह साबित कर दिया कि उसकी मारक क्षमता 4000 किलोमीटर भी है। ईरान के इस हमले ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। डिएगो में इजरायल का सबसे बड़ा परमाणु केंद्र है। मिसाइल हमले के कारण इजरायल के परमाणु केंद्र को क्या और कितना नुकसान हुआ है, अभी इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। ईरान ने इस हमले को नकारते हए कहा है कि यह हमला अमेरिकी साजिश है और ईरान को बदनाम करने के लिए ऐसा प्रचारित किया गया है। ईरान ने चेतावानी दी है कि कोई भी अमरीकी सैन्य बेस हमारी पहुंच से बाहर नहीं है। वहीं, अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी है कि उसने तीन युद्धपोत खाड़ी में भेज दिया है और युद्ध जल्द ही समाप्त होगा। इधर, इजराइल ने ईरान पर अगले हफ्ते घातक हमले की चेतावनी दी है।
मार्च 2026 की स्थिति के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य से खुद को पूरी तरह अलग नहीं किया है, बल्कि वहां तनाव के कारण वह नाटो और अन्य सहयोगियों से मदद न मिलने पर अलग-थलग पड़ गए हैं। ईरान द्वारा जलमार्ग को ब्लॉक करने और तनाव बढ़ने के बाद, ट्रंप ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था और इसे खुलवाने के लिए अन्य देशों से मदद मांगी है। होर्मुज जलडमरूमध्य के संबंध में प्रमुख घटनाक्रम में ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने का अल्टीमेटम दिया था, अन्यथा उसके बिजली संयंत्रों को तबाह करने की भी धमकी दी थी। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रालय ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों पर हुए हमलों पर 22 देशों का एक संयुक्त बयान जारी किया है। इसमें उन हमलों की निंदा की गई, जो व्यापारिक जहाजों पर हुए। इस बयान पर यूएई, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, डेनमार्क, लातविया, स्लोवेनिया, एस्टोनिया, नॉर्वे, स्वीडन, फ़िनलैंड, चेक रिपब्लिक, रोमानिया, बहरीन, लिथुआनिया और ऑस्ट्रेलिया के नेताओं ने दस्तखत किए हैं। संयुक्त बयान में कहा गया है, ‘हम ईरान द्वारा हाल ही में किए गए हमलों की कड़ी निंदा करते हैं। ये हमले बिना हथियारों वाले व्यापारिक जहाजों पर किए गए हैं। इसके अलावा नागरिक ढांचे पर भी हमले हुए हैं, जिनमें तेल और गैस की जगहें शामिल हैं। ईरानी फौज ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लगभग बंद कर दिया है। जबकि, समुद्री रास्तों की आजादी अंतरराष्ट्रीय कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है, इसमें संयुक्त राष्ट्र का समुद्र से जुड़ा कानून भी शामिल है। ईरान की इन कार्रवाइयों का असर पूरी दुनिया के लोगों पर पड़ेगा, खासकर उन पर जो पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं।’
मध्य-पूर्व में चल रही जंग अब सिर्फ भूराजनीति की खबर नहीं रह गई है। इसका असर हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में उतरने लगा है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि युद्ध कौन जीत रहा है, बल्कि यह है कि इसकी कीमत कौन-कौन चुका रहा है! तो इसके जवाब में भारत भी शामिल है। तेल की कीमतों में उछाल ने सबसे पहले संकेत दे दिया है। प्रीमियम पेट्रोल और इंडस्ट्रियल डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी यह बताती है कि वैश्विक संकट अब घरेलू बाजार में प्रवेश कर चुका है। भारत सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कमर्शियल एलपीजी का आवंटन 20 प्रतिशत बढ़ा दिया है। खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध के कारण भारत की ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई है। इसके कारण प्रारंभ में होटल और रेस्तरां जैसे वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों की एलपीजी की कटौती की गई थी, ताकि घरेलू रसोई में आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा सके। यह तो सरकार का कहना है, लेकिन वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल उलट है। यह स्थापित सत्य है कि इन सारे मुद्दों के लिए सामान्य जनता पूरी तरह सरकार पर आश्रित है, लेकिन सरकार इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं है। वैसे, इन सभी मुद्दों पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेस्कियां से दुबारा बात की और उन्होंने हॉर्मोज की सुरक्षा का भी बात की।
सब ठीक तो तभी होगा, जब जंग खत्म होगा और यह तभी खत्म होगा, जब दोनों पक्ष सहमत हों। ऐसा कब तक होगा, इसका कयास ही लगाया जा रहा है। जब रूस और यूक्रेन का जंग पिछले चार साल में खत्म नहीं हो सका, तो अमेरिका—इजराइल और ईरान का युद्ध तत्काल समाप्त हो जाएगा, यह सोचना फिलहाल हमें बंद करना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

