ठाकुरगंज की रोसो दीदी ने पारंपरिक हुनर को बनाया आत्मनिर्भरता का जरिया
किशनगंज, 25 सितंबर (के.स.)। धर्मेन्द्र सिंह, मेहनत, हुनर और आधुनिक तकनीक के सहारे ठाकुरगंज की रहने वाली रोसो दीदी ने अपने पारंपरिक मिट्टी के बर्तन बनाने के काम को नई पहचान दी है। जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें समूह के माध्यम से पूंजीगत सहयोग मिला। इस सहयोग से उन्होंने अपने पारंपरिक काम को बेहतर संसाधनों के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास शुरू किया।
इलेक्ट्रिक चाक से तैयार कर रहीं आकर्षक उत्पाद
रोसो दीदी अब बिजली से चलने वाले चाक यानी इलेक्ट्रिक चाक की मदद से गीली मिट्टी को अलग-अलग आकार देकर बर्तन और अन्य आकर्षक कलाकृतियां तैयार कर रही हैं। इलेक्ट्रिक चाक के इस्तेमाल से मिट्टी को आकार देने का काम पहले की तुलना में आसान और सुविधाजनक हुआ है। इससे समय और मेहनत की बचत के साथ उत्पादों को बेहतर ढंग से तैयार करने में भी मदद मिल रही है।
जीविका समूह से जुड़ने और पूंजीगत सहयोग मिलने के बाद रोसो दीदी के पारंपरिक व्यवसाय को नया संबल मिला है। उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए वह अपने हुनर को आजीविका का मजबूत साधन बनाने में जुटी हैं। मिट्टी से बर्तन बनाने का उनका पारंपरिक कौशल अब आधुनिक तकनीक के साथ जुड़कर उन्हें आर्थिक रूप से आगे बढ़ने का अवसर दे रहा है।
रोसो दीदी का प्रयास ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन की मिसाल पेश करता है। उन्होंने अपने पारंपरिक हुनर को छोड़ने के बजाय उसे आधुनिक साधनों से जोड़कर आगे बढ़ाने का रास्ता चुना। उनका प्रयास यह दर्शाता है कि उचित मार्गदर्शन, पूंजी और संसाधन उपलब्ध होने पर ग्रामीण महिलाएं अपने पारंपरिक कौशल को आय के स्थायी साधन में बदल सकती हैं।



