आंदोलन की धार को तेज करती जेन जी निशिकांत ठाकुर
त्रिलोकी नाथ प्रसाद/सत्ता की तानाशाही से ऊबकर किस तरह युवा उद्वेलित होते हैं, ऐसा मौका 18 मार्च 1974 को देखने को मिला था। यह कोई सोच भी नहीं सकता था कि पटना विश्वविद्यालय के कॉलेज से निकली एक चिंगारी पूरे भारत को अपने लपेटे में ले लेगी और फिर यही चिंगारी भारतीय सत्ता को जलाकर राख कर देगी। छात्र पटना के गांधी मैदान में एकत्र हुए और बिहार विधान सभा घेरने की योजना बनाई गई। फिर बिहार विधान सभा तक पहुंचते पहुंचते उस जुलूस को सरकार की प्रशासनिक रोक के बावजूद, पुलिस की धक्कामुक्की और रोकटोक को पार करते आखिर विधान भवन का घेराव कर ही लिया। उस दिन के प्रदर्शन ने ही आगे चलकर कई कारणों से आपातकाल का मार्ग प्रशस्त किया। तब तक इस आंदोलन का नेतृत्व छात्र नेता के रूप में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सुशील मोदी जैसे कुछ छात्र नेता कर रहे थे। उस दिन के बाद अपार छात्रों के समूह और जोश को देखकर छात्र नेताओं ने जेपी (लोकनायक जयप्रकाश नारायण) से आंदोलन की अगुवाई करने का आग्रह किया। जेपी ने कहा कि इस आंदोलन का नेतृत्व वे इसी शर्त पर करेंगे कि आंदोलन अहिंसक हो। फिर क्या था, आंदोलन का नेतृत्व जेपी जैसे अनुभवी गांधीवादी लोकनायक के हाथ में हो, तो फिर गतिरोध कौन उत्पन्न कर सकता है।
सच में यदि किसी आंदोलन का नेतृत्वकर्ता अनुभवी हो, आगे पीछे के अच्छे बुरे परिणामों को समझने की क्षमता रखने वाला हो, तो वह सफल होता ही है। यह किसी आंदोलन तक ही सीमित रखने की बात नहीं है, बल्कि परिवार का भी नेतृत्व एक कुशल अनुभवी मुखिया द्वारा यदि किया जाता है, तो उस परिवार के विकास को कोई रोक नहीं सकता। यही बात समाज, देश और किसी क्रांति/आंदोलन की भी होती है। बिहार का वह छात्र आंदोलन सफल रहा और तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह बिहार छात्र आंदोलन की शुरुआत थी। अब बात करते हैं सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) द्वारा पेपर लीक के मामले में दिल्ली के जंतर मंतर सहित पिछले लगभग डेढ़ महीने से चल रहे देशभर में आंदोलन की, जो 26 दिन के आमरण अनशन और सरकारी क्रूरता को झेलने के बाद गांधीवादी पर्यावरणविद सोनम वांगचुक के अनुयायियों तथा देश के छात्र नेताओं और युवाओं के प्रयास से सफल हुआ। देश के शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा तथा पेपर लीक मामले में देशभर में जो धरना प्रदर्शन हो रहा था, वह फिलहाल रुक गया है। जो लोग एक समाज में रहते हैं, एक दूसरे की आंखों में देखने का आनंद लेते हैं, जो अपनी परेशानियों को साझा करते हैं, जो अपनी कोशिशों को उस पर केंद्रित करते हैं, जो उनके लिए अहम है और इसे आनंदमय मानते हैं, वही लोग पूर्ण जीवन जीते हैं।
36 दिन बाद समाप्त हुए छात्र आंदोलन की अगुआई जिन युवाओं ने की, उनके बारे में जानें तो सीजेपी की संरचना करने वाले अभिजीत दिपके हैं। उनकी टीम के प्रमुख सदस्य आशुतोष रंका और सौरभ दास हैं, जो पढ़े लिखे और सभ्य समाज की पृष्ठभूमि से आते हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने इस तरह की हस्ती को सरकार के समक्ष लाकर खड़ा कर दिया, जो देश ही नहीं, विश्व के एक बड़े वैज्ञानिक, पर्यावरणविद के रूप में जाने जाते हैं। लेह लद्दाख के पर्यावरण आंदोलन के जनक रहे सोनम वांगचुक, देश में महात्मा गांधी के अनुकरणीय रास्तों को अपनाकर केंद्रीय सरकार और विशेष रूप से धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ सीजेपी का साथ देते हुए शिक्षामंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। बता दें कि नीट पेपर लीक में आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवार को मुआवजा देने के लिए और 20 जुलाई और उसके बाद हुए पुलिस बर्बरता के लिए कार्यवाही तथा आंदोलनकारी छात्रों पर देश में दर्ज किए गए सभी मामलों को हटा लेने के लिए भी सरकार को झुकना पड़ा। फिलहाल तो आंदोलन जंतर मंतर पर खत्म कर दिया गया है, लेकिन छात्र संगठनों की मानें तो यह अभी सरकार के विरुद्ध आंदोलन की शुरुआत है। कहा जा रहा है कि अब आंदोलन ई20 पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट के लिए मजबूर करने के लिए केंद्रीय मंत्री मंत्री नितिन गडकरी के खिलाफ शुरू होने वाला है।
वैसे तो हर आंदोलन के बाद उसकी अगुआई करने वालों की छवि बिगड़ने के लिए सरकार द्वारा एक योजनाबद्ध अफवाह फैलाई जाती है। इस सीजेपी आंदोलन के बाद भी वैसा ही हुआ है, जिसमें अभिजीत दिपके और सोनम वांगचुक पर आरोप लगाया जा रहा है कि इनलोगों ने सरकार और आदोलनकारियों के बीच तालमेल कर लिया था, लेकिन बीमार अभिजीत दिपके एक वीडियो जारी कर कहते हैं कि शिक्षामंत्री का इस्तीफा जेन जी और छात्रों के अहिंसक प्रदर्शन तथा एकता की जीत है। झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए। डरने की कोई जरूरत नहीं, यह लोकतंत्र है, सरकार याद रखे कॉकरोच से पंगा मत ले। वहीं, पूर्व शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं कि ‘जंतर मंतर पर जो स्थिति पैदा हुई, राष्ट्र विरोधी ताकतें उसका फायदा न उठा लें।’ उन्होंने कहा कि देश की एकता बनी रहे और छात्रों का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में न उलझे, उसी बात पर विचार करके मैंने पद से त्यागपत्र दिया है। समझ में यह बात नहीं आती कि आखिर शिक्षामंत्री छात्रों के प्रति एकाएक इतने उदार क्यों हो गए? सच तो यह है कि जब छात्रों द्वारा आत्महत्या और बार बार पेपर लीक पर पूरे देश में हंगामा होने लगा, लाठियां चलने लगीं, अश्रुगैस के गोले फेंके जाने लगे, पानी की बौछारें छात्रों पर की जाने लगीं, जिसे पूरे देश ने देखा; फिर इतनी निर्लज्जता के बावजूद युवाओं की हत्या कराकर सत्ता की कुर्सी पर कोई व्यक्ति कैसे विराजमान रह सकता है? यह भी सच है कि केंद्रीय शिक्षामंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने मानवीयता को खो दिया था, फिर उनकी नैतिक जिम्मेदारी बनती थी कि वे त्यागपत्र दें। वैसे, आंदोलन शुरू होने पर ही धर्मेंद्र प्रधान ने एक राष्ट्रीय समाचार पत्र को साक्षात्कार देते हुए राष्ट्र से माफी मांगी थी, लेकिन काश! वे उसी समय त्यागपत्र दे देते, तो देश में इतना बड़ा बवाल नहीं होता! लेकिन, अब तो देश यही जानता है कि उन्होंने आंदोलन के दबाव के कारण ही त्यागपत्र दिया है, नैतिकता के कारण और राष्ट्रहित में कतई नहीं।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या आगे सब कुछ ठीक हो जाएगा? ऐसा लगता नहीं; क्योंकि अब जो इस आंदोलन का फोकस है, वे हैं केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री। स्वच्छ छवि के बावजूद नितिन गडकरी पर ढेरों आरोप लगाए जा चुके हैं और लगाए भी जा रहे हैं और जेन जी का दूसरा उद्देश्य गडकरी को सरकार से हटाना और उनपर लगे आरोपों को साबित करना है। अब ऐसा कितने समय बाद होता है, यह तो स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन जो सुगबुगाहट आक्रोशित छात्रों के बीच से आ रही है कि वह यही कि एक और छात्र आंदोलन देश में होगा। फिलहाल, प्रधानमंत्री ने अब स्वयं हस्तक्षेप करते हुए नए शिक्षामंत्री के रूप में प्रह्लाद जोशी को नामित किया है, इसलिए अभी से उनके लिए कुछ कहना उचित नहीं, इसलिए प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ेगी। जो छात्रों की सबसे बड़ी समस्या थी, उसके सुधार के लिए प्रधानमंत्री ने टास्क फोर्स का गठन कर दिया है और उन्होंने एक वीडियो संदेश में कहा कि हम पूरी व्यवस्था में सुधार की तरफ आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने एक टॉस्क फोर्स का गठन नंदन नीलकेणी की अध्यक्षता किया है, जिनमें पांच और सदस्य है। समिति में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस.सोमनाथ, आईबी के पूर्व निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि, पूर्व केंद्रीय शिक्षा सचिव अनीता करवाल एवं प्रशासनिक विशेषज्ञ अमृतलाल मीणा शामिल हैं। टीम के इन सदस्यों को सामने देखकर अब निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि देश की परीक्षा ही नहीं, शिक्षा व्यवस्था में भी आमूल परिवर्तन की आशा की जानी चाहिए, लेकिन इसके बावजूद जेन जी—2 की सोच क्या है, इसे देखने के लिए प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ेगी।



