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बंगाल में सियासी संग्राम ममता मोर्चे पर, भाजपा को ‘मजबूत चेहरे’ की तलाश: चंदन चौरसिया

2021 के नतीजों ने बदली तस्वीर टीएमसी की बढ़त बरकरार, पर भाजपा का वोट प्रतिशत बना चुनौती

ईडी-सीबीआई की कार्रवाई, संगठनात्मक रणनीति और ‘दीदी बनाम मोदी’ की संभावित जंग ने तेज किया राजनीतिक तापमान

त्रिलोकी नाथ प्रसाद पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में 294 सीटों में से 213 सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था, जबकि भाजपा 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी। वोट प्रतिशत के लिहाज से भी मुकाबला दिलचस्प रहा टीएमसी को लगभग 48.5 प्रतिशत और भाजपा को करीब 38.5 प्रतिशत मत मिले। कांग्रेस और वाम दल हाशिये पर सिमट गए। लोकसभा की 42 सीटों में भी टीएमसी ने बढ़त बनाए रखी, लेकिन भाजपा का वोट शेयर उसे लगातार चुनौती देता रहा। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति अब केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि जनभावनाओं, नेतृत्व और रणनीति का संग्राम बन चुकी है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने ‘बंगाल बनाम बाहरी’ की भावना को मजबूत करने की कोशिश की, जबकि भाजपा ने ‘परिवर्तन’ और ‘मजबूत राष्ट्रीय नेतृत्व’ के नाम पर जमीन तैयार की। ऐसे में आगामी चुनाव की आहट के साथ ही दोनों दलों ने अपनी-अपनी रणनीति तेज कर दी है।

चौरसिया ने कहा कि टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती ईडी और सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और कथित घोटालों से उपजी साख की परीक्षा है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी और अन्य मामलों को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर है। हालांकि ममता बनर्जी ने इन कार्रवाइयों को ‘राजनीतिक बदले की भावना’ करार देते हुए इसे केंद्र बनाम राज्य की लड़ाई में तब्दील करने का प्रयास किया है। संगठनात्मक स्तर पर टीएमसी अब अधिक एक्टिव दिख रही है।ब्लॉक स्तर तक बैठकों का दौर, टिकट वितरण पर मंथन और संभावित 25-30 प्रतिशत चेहरों में बदलाव की चर्चा यह संकेत देती है कि पार्टी सत्ता विरोधी लहर को भांप रही है। दूसरी ओर भाजपा ने भी बंगाल में अपने संगठन को मजबूत करने के लिए कई राज्यों के नेताओं को मैदान में उतार दिया है। बूथ स्तर तक रणनीति, माइक्रो मैनेजमेंट और केंद्रीय नेतृत्व की रैलियों के सहारे पार्टी ‘मजबूत चेहरे’ की तलाश में है, जो राज्य स्तर पर ममता बनर्जी को सीधी चुनौती दे सके। भाजपा की कोशिश है कि चुनावी विमर्श को भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण की ओर मोड़ा जाए, जबकि टीएमसी विकास योजनाओं, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक कल्याण की उपलब्धियों को सामने रखकर मुकाबला करना चाहती है।

चंदन चौरसिया का मानना है कि बंगाल में चुनावी लड़ाई इस बार केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि नैरेटिव की भी होगी। क्या यह मुकाबला फिर ‘दीदी बनाम मोदी’ बनेगा? या भाजपा कोई ऐसा क्षेत्रीय चेहरा आगे करेगी जो राज्य की जनता से सीधा जुड़ाव बना सके? 2021 के चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया था कि भाजपा का वोट प्रतिशत तेजी से बढ़ा है और वह मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित हो चुकी है, लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए उसे विश्वसनीय स्थानीय नेतृत्व और जमीनी नेटवर्क की और मजबूती चाहिए। वहीं टीएमसी को अपनी छवि पर लगे दागों को धोते हुए संगठन को एकजुट रखना होगा। कांग्रेस और वाम दलों की भूमिका भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है; वे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए गठजोड़ और नए समीकरण तलाश रहे हैं। कुल मिलाकर बंगाल की सियासत इस समय ‘रणनीति बनाम रणनीति’ की स्थिति में है जहां एक ओर ममता बनर्जी अपने किले को बचाने के लिए हर स्तर पर सक्रिय हैं, वहीं भाजपा ‘मजबूत चेहरे’ की खोज के साथ सत्ता परिवर्तन का सपना देख रही है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि जनता किस नैरेटिव को स्वीकार करती है स्थानीय अस्मिता और कल्याणकारी राजनीति को या राष्ट्रीय नेतृत्व और बदलाव के वादे को। बंगाल का यह सियासी संग्राम केवल राज्य की सत्ता का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य का भी संकेतक साबित हो सकता है।

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