विचार

नृसिंह अवतार का रहस्य।उनके अवतरण दिवस पर विशेष।

प्रभाकर चौबे/भगवान नृसिंह विष्णु के आवेशावतार हैं । इनकी उपासना से शत्रु शमन अधर्म का नाश और धन सुख सम्पत्ति मे वृद्धि होती है।

भक्त प्रह्लाद और सती सावित्री स्त्रियों की गति एक ही है।

सती सावित्री के तेज से नाभी कुण्ड से अग्नि प्रकट हो जाती है जब उसका पति स्वर्गीय हो जाता है और उसमे प्रबल ईच्छा जागृत हो पति के साथ जाने की।भगवान का अविरल भक्त की गति भी ऐसी ही होती है वह ईश्वर पर ही आश्रित हो जाता है।नारद जैसे दिव्य ऋषि ने उनमे भक्ति भर दी थी।

वे निरंतर विष्णु के ध्यान मे खोये रहते। हिरण्यकशिपु त्रिलोक विजयी एक प्रतापी राजा था ।वह अन्य असुरो की तरह भी भागवत धर्म च्युत विष्णु द्रोही था । उसने अपने राज्य मे विष्णु पूजा पर रोक लगा दी थी और अपनी पूजा करवाने लगा था।
भक्त प्रह्लाद को समझाता । भय और त्रास दिया।पहाड से ढकेला।होलिका को एक चादर प्राप्त था जिसको ओढ लेने पर अग्नि से बचाव हो जाता था ।वह प्रह्लाद जी को लेकर आग मे बैठ गई लेकिन भगवान के कृपा से आँधी आई चादर प्रह्लाद पर चली आई।होलिका जल गई।तभी से होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई।जब अत्याचार का हद हो गया तथा भक्ति और अविरल से अविरलतर होती चली गई तब हिरण्यकशिपु ने भरी दरवार मे तलवार निकालकर प्रह्लाद से पूछा बता तेरा विष्णु कहाँ है। उन्होंने कहा सब जगह है। तब उसने कहा क्या इस खम्भ मे भी हैं तो बोले हाँ ।उसने क्रुद्ध होकर तलवार से खंम्भ पर प्रहार किया और खम्भ फट गया ।आधा मनुष्य आधा शेर के रूप मे भयानक शेर गर्जन के साथ भगवान नृसिंह प्रकट हो गये।बिजली चमकने लगी भूकंपहोने लगा ।पृथ्वी काँप ऊठी दिग्गज विचलित हो गये। दिशायें थर्रा ऊठी । आसमान से ऊल्का पात शुरू हो गया। सारे सभासद भय से मर गये। हिरण्यकशिपु अपने वरदानी ताकतो एवं बालक प्रह्लाद जी भक्ति और प्रेम मे डुबकर हाथ जोडकर आँशु बहाते रहे ।

हिरण्यकशिपु को वरदान था न पशु से न मनुष्य से , न रात न दिन मे न भीतर न बाहर न शस्त्र से न अस्त्र से मारा जा सकता था।
भगवान इसीलिए आधा शेर आधा मनुष्य रूप मे प्रकट हुए ।उन्होंने हिरण्यकशिपु को पकडा और सभा के चौकठ पर शाम के समय जांघ पर रख अपने नुकिले नाखूनों से चीर डाला।आवेशावतार का मतलब समझते हैं । वह भक्त प्रह्लाद की रक्षा हैतु अत्यधिक आवेश से प्रकट हुए।यह एक वैज्ञानिक और पराभौतिक क्रिया थी ।जैसे ऋषि दुर्वासा भयानक कृत्या को प्रकट करते थे। लेकिन भक्ति प्रेम धर्म सत्य की ताकत ऐसी होती है की भगवान भी प्रकट हो जाते हैं । इसमे संदेह की गुंजाईश नहीं । सबको मिलते है किसी न किसी रूप या किसी के माध्यम से मदद कर जाते हैं ।आपको हमको भरोसा नही होता। जो किसी की मदद नही करता उसको मदद मिल जाया है तो वह उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ हो जाता है बहुत ज्यादा झुंकने लगता है लेकिन खुद किसी की मदद करने की आदत नही डालता । अगर दूसरो की मदद की हो तो मदद मिलने पर भी समभाव ही बना रहेगा।अब भगवान के आवेश से तीनो लोक जलने लगा। देवता और ऋषि मुनी उनके सामने जाने का साहस नही कर पा रहे थे ।तब भक्त प्रह्लाद को उनके गोद मे डालकर स्तुति करने लगे ।भगवान ने प्रह्लाद जी को गोद मे ले लिया । और उनके सिर पर हाथ फेरने लगे।लेकिन फिर भी आवेश कम नही हुआ। जैसे आग फैल जाये तो शीतल जल की जरूरत होती है। वह शीतलता दुनिया मे नही थी ।तब भगवान शंकर की स्तुति की गई उन्होने शरभ पंक्षी का रूप लेकर भगवान नृसिंह को ऊठा ले गये और शान्त किया । उसी प्रह्लाद जी के कुल मे राजा बलि भी हुए जिनके लिए वामन अवतार हुआ।बोलिये भक्त प्रहलाद एवं नृसिंह भगवान की जय।

 

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