बंगाल में संघ की नई रणनीति: शाखाओं से समाज तक, जेन-ज़ी क्यों बना सबसे बड़ा लक्ष्य: चंदन चौरसिया

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/महालया तक 10 हजार शाखाओं का लक्ष्य केवल संगठन विस्तार नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल में सामाजिक और वैचारिक उपस्थिति को गहरा करने की दीर्घकालिक रणनीति का संकेत है।
• नया मुख्यालय, युवा सम्मेलन और जमीनी संपर्क अभियान यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या बंगाल अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार का अगला बड़ा केंद्र बनने जा रहा है?
पटना। पश्चिम बंगाल भारतीय राजनीति का वह प्रदेश रहा है जहाँ विचारधाराओं की लड़ाई हमेशा केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रही। कभी वामपंथ की मजबूत पकड़, फिर तृणमूल कांग्रेस का लंबा दौर और अब भाजपा की सत्ता में एंट्री के बाद राज्य का राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला है। इसी बदलते माहौल के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने बंगाल में अपने सबसे बड़े संगठनात्मक विस्तार की तैयारी शुरू कर दी है। संघ का लक्ष्य महालया यानी 10 अक्टूबर तक राज्य में शाखाओं की संख्या लगभग पाँच हजार से बढ़ाकर दस हजार करना है। यह जानकारी संघ के पश्चिम बंगाल के पदाधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से साझा की है।
इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने केवल सच से बातचीत करते हुए कहा कि यह घोषणा केवल एक संगठनात्मक लक्ष्य नहीं है। इसके पीछे सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक रणनीति भी दिखाई देती है। खास बात यह है कि इस अभियान का सबसे बड़ा केंद्र जेन-ज़ी, यानी नई युवा पीढ़ी को बनाया गया है। सवाल यह है कि आखिर बंगाल में शाखाओं का यह विस्तार क्यों? महालया की समय-सीमा क्यों चुनी गई? और युवाओं पर इतना विशेष जोर किस रणनीति का हिस्सा है?
• शाखा केवल संख्या नहीं, संगठन की सबसे मजबूत इकाई
आरएसएस की कार्यप्रणाली में शाखा सबसे महत्वपूर्ण इकाई मानी जाती है। किसी भी मोहल्ले, गाँव या कस्बे में लगने वाली शाखा केवल व्यायाम या दैनिक बैठक का स्थान नहीं होती, बल्कि वहीं से स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण, सामाजिक कार्यक्रम, सेवा कार्य और स्थानीय संगठन का निर्माण होता है। बंगाल में शाखाओं की संख्या का सफर भी इसी बदलाव की कहानी कहता है। वर्ष 2011 में राज्य में लगभग 580 शाखाएँ थीं। इसके बाद 2014 में यह संख्या बढ़ी, 2016 तक इसमें और विस्तार हुआ और पिछले कुछ वर्षों में संगठन ने लगातार अपना नेटवर्क मजबूत किया। अब 2026 में दस हजार शाखाओं का लक्ष्य बताता है कि संघ राज्य के लगभग हर जिले, प्रखंड और शहरी इलाकों तक अपनी पहुँच बढ़ाना चाहता है। संख्या दोगुनी करने का अर्थ केवल नए स्वयंसेवक जोड़ना नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर स्थायी संगठनात्मक ढांचा तैयार करना भी है।
• महालया का समय क्यों चुना गया?
बंगाल की सांस्कृतिक पहचान में महालया का विशेष स्थान है। यह दिन दुर्गा पूजा की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है और पूरे राज्य में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियाँ तेज हो जाती हैं। ऐसे समय में 1 से 10 अक्टूबर तक विशेष संपर्क अभियान चलाने का निर्णय यह संकेत देता है कि संघ अपने विस्तार अभियान को राज्य की सांस्कृतिक चेतना के साथ जोड़कर देख रहा है। इस दौरान गाँव-गाँव, मोहल्लों और शहरों में आउटरीच कार्यक्रम, युवा सम्मेलन और संपर्क अभियान आयोजित किए जाने की योजना है। सांस्कृतिक अवसरों पर समाज के बड़े वर्ग तक पहुँचना किसी भी सामाजिक संगठन के लिए प्रभावी माध्यम माना जाता है। इसलिए महालया केवल तारीख नहीं, बल्कि रणनीतिक समय भी बन जाता है।
• जेन-ज़ी पर सबसे बड़ा दांव क्यों?
इस बार अभियान की सबसे अलग विशेषता युवाओं पर फोकस है। जेन-ज़ी वह पीढ़ी है जो इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया के बीच बड़ी हुई है। उसकी राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी के तरीके पहले की पीढ़ियों से अलग हैं। संघ का प्रयास है कि कॉलेज, विश्वविद्यालय, शहरी युवाओं और पहली बार मतदान करने वाली पीढ़ी तक अपनी पहुँच बढ़ाई जाए। इसके लिए युवा सम्मेलन, संवाद कार्यक्रम और स्थानीय नेतृत्व तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। युवाओं को जोड़ने के पीछे कई कारण हैं। पहली वजह जनसांख्यिकीय बदलाव है। दूसरी वजह यह कि आने वाले वर्षों में यही वर्ग सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करेगा। तीसरी वजह यह कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विचारधाराओं की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि अब केवल पारंपरिक शाखाओं तक सीमित रहने के बजाय आउटरीच कार्यक्रमों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है।
• नया मुख्यालय और संगठन का नया ढांचा
कोलकाता के न्यू टाउन के एक्शन एरिया-2डी में बना पाँच मंजिला ‘केशव स्मृति’ कार्यालय इस विस्तार अभियान का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है। वर्षों तक संघ उत्तरी कोलकाता के केशव भवन से अपनी गतिविधियाँ संचालित करता रहा। लेकिन बढ़ती गतिविधियों और स्वयंसेवकों की संख्या को देखते हुए बड़े परिसर की आवश्यकता महसूस की गई। 26 सितंबर को सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले द्वारा इस भवन के उद्घाटन की योजना भी इसी संगठनात्मक विस्तार का हिस्सा मानी जा रही है। नया कार्यालय केवल प्रशासनिक भवन नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, समन्वय, बैठकें और सामाजिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बनने की दिशा में देखा जा रहा है।
• बंगाल की राजनीति में इसका क्या अर्थ है?
पश्चिम बंगाल लंबे समय तक वामपंथी राजनीति का गढ़ रहा। बाद में तृणमूल कांग्रेस ने मजबूत जनाधार बनाया। भाजपा के उभार के साथ राज्य में वैचारिक प्रतिस्पर्धा और तेज हुई। आरएसएस स्वयं को सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन बताता है। वहीं वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया का मानना है कि संघ का संगठनात्मक नेटवर्क भाजपा सहित व्यापक वैचारिक परिवार के सामाजिक आधार को मजबूत करने में भूमिका निभाता है। दूसरी ओर, आलोचक इसे राज्य में वैचारिक विस्तार की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच तथ्य यही है कि बंगाल में संघ की गतिविधियाँ पिछले एक दशक में लगातार बढ़ी हैं और अब उनका विस्तार नए चरण में प्रवेश करता दिखाई देता है।
• समाज सेवा और राष्ट्रवाद का संदेश
संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि विस्तार अभियान का उद्देश्य राष्ट्रवाद, देशभक्ति और समाज सेवा के विचारों को अधिक लोगों तक पहुँचाना है। स्थानीय पदाधिकारियों को युवाओं से संपर्क बढ़ाने, उन्हें सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करने और सेवा कार्यक्रमों से जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई है। बाढ़ राहत, स्वास्थ्य शिविर, शिक्षा सहायता और अन्य सेवा गतिविधियाँ भी संघ के कार्यक्रमों का हिस्सा रही हैं। इसी सामाजिक कार्य के माध्यम से संगठन स्थानीय स्तर पर अपनी उपस्थिति मजबूत करने का प्रयास करता है।
• क्या केवल शाखाएँ बढ़ाने से प्रभाव बढ़ जाएगा?
यहीं सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है। किसी भी संगठन की ताकत केवल उसकी शाखाओं की संख्या से नहीं मापी जाती। असली प्रभाव इस बात से तय होता है कि समाज में उसकी भागीदारी कितनी है, युवाओं का जुड़ाव कितना स्थायी है और स्थानीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता कितनी बढ़ती है। दस हजार शाखाओं का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन उसे सफल बनाने के लिए निरंतर कार्यकर्ता, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक गतिविधियों का विस्तार भी आवश्यक होगा।
• बंगाल में वैचारिक प्रतिस्पर्धा का नया दौर
बंगाल की राजनीति अब केवल चुनावी मुकाबले तक सीमित नहीं दिखाई देती। यहाँ सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संगठन और युवाओं के बीच वैचारिक संवाद भी महत्वपूर्ण मुद्दे बन चुके हैं। आरएसएस का यह अभियान इसी व्यापक परिदृश्य का हिस्सा माना जा सकता है। एक ओर संगठन अपने नेटवर्क को मजबूत करने की तैयारी कर रहा है, दूसरी ओर राज्य में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक धाराएँ भी अपनी-अपनी उपस्थिति बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं।
• निष्कर्ष: बंगाल की बदलती तस्वीर का संकेत
पश्चिम बंगाल में आरएसएस का दस हजार शाखाओं का लक्ष्य केवल संगठन विस्तार की खबर नहीं है। यह उस बदलाव का संकेत भी है जिसमें संगठन समाज के नए वर्गों, खासकर युवाओं तक अपनी पहुँच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। महालया का समय, नया मुख्यालय और राज्यव्यापी संपर्क अभियान इस रणनीति को और स्पष्ट करते हैं।
हालाँकि किसी भी संगठन के प्रभाव का अंतिम आकलन केवल लक्ष्यों की घोषणा से नहीं, बल्कि उनके सामाजिक परिणामों से होगा। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल में यह विस्तार सामाजिक भागीदारी, वैचारिक संवाद और राजनीतिक वातावरण को किस हद तक प्रभावित करता है। इतना तय है कि पश्चिम बंगाल अब देश के सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक और संगठनात्मक प्रयोगों में से एक का केंद्र बन चुका है, जहाँ समाज, संस्कृति और राजनीति तीनों के बीच नई बहस लगातार आकार ले रही है।



