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युद्ध विराम पर हठधर्मिता भारी -निशिकांत ठाकुर

त्रिलोकी नाथ प्रसाद/अपने देश में कहा जाता है कि ‘होनी’ को कोई टाल नहीं सकता। ऐसे में अब विश्व युद्ध की आशंकाओं को भी नकारा नहीं जा सकता। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली बातचीत बेनतीजा ख़त्म हो गई। बैठक के विफल होने की जानकारी मीडिया से साझा करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जीडी वैस ने कहा कि वह बातचीत के लिए इस्लामाबाद (पाकिस्तान) आए थे। रविवार 12 अप्रैल की सुबह 6 बजे के बाद प्रेस कॉन्फ़्रेस में उपराष्ट्रपति ने कहा कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच फ़ासला कम करने और समझौता कराने की पूरी कोशिश की, लेकिन ‘बुरी ख़बर यह है कि हम किसी समझौते तक नहीं पहुंच सके।’ अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह ख़बर अमेरिका के लिए उतनी बुरी नहीं है, जितनी ईरान के लिए है, क्योंकि ‘कोई समझौता नहीं हुआ है और हम अमेरिका वापस लौट रहे हैं।’ विश्वयुद्ध होगा या नहीं होगा, यह तो आग की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा, लेकिन महात्मा गांधी की यह बात हमारा भारत भूल गया कि दो राष्ट्रों के युद्ध में शांति की अलख जगाने के लिए जो प्रयास हमारे देश को करना चाहिए, वह दुर्भाग्य से हम नहीं कर पाए। भले ही अमेरिका और ईरान के बीच संधि की बात सफल नहीं हुई हो, लेकिन शांति वार्ता के लिए सभी ने पाकिस्तान को उपयुक्त स्थान के तौर पर चुना। अब हम अपनी वाहवाही के कितने ही तग़मे बांध लें, लेकिन शांति के प्रयास के नाम पर पाकिस्तान भारत से आगे निकल गया।
बता दें कि अमेरिका और ईरान दो हफ़्ते के संघर्ष विराम पर राज़ी हुए थे और दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए इस्लामाबाद आए थे। दोनों पक्षों के बीच बातचीत इस्लामाबाद के एक होटल में हुई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने बताया कि बातचीत बेनतीजा रही, लेकिन उन्होंने यह साफ नहीं किया कि समझौता न होने का दो हफ़्ते के अस्थायी संघर्ष विराम पर क्या असर पड़ेगा। प्रेस कॉन्फ़्रेस के क़रीब दो घंटे बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने भी प्रेस कॉन्फ़्रेस करते हुए कहा कि पाकिस्तान अमेरिका-ईरान बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहेगा, ‘यह ज़रूरी है कि दोनों पक्ष संघर्ष विराम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जारी रखें।’
अब इस मुद्दे को देखने का प्रयास करते हैं, जो वार्ता के विफल होने को लेकर समाचारों से छनकर आए हैं। दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता की विफलता के मुख्य कारण हैं ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कठोर अमेरिकी शर्तें, ईरान द्वारा मिसाइल और ड्रोन क्षमता को अपनी रक्षा के लिए जरूरी मानना और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान द्वारा समझौते की रेड लाइन्स को न मानने के कारण वार्ता विफल होने की घोषणा की गई है। उन्होंने वार्ता विफल होने के कुछ प्रमुख कारण भी बताए हैं। उनके अनुसार, अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने परमाणु हथियार विकसित करने की सभी संभावनाओं को खत्म करे, लेकिन ईरान ने इन अत्यधिक और अपमानजनक मांगों को मानने से इनकार कर दिया। ईरान के मिसाइल और ड्रोन टेक्नोलॉजी पर कुल प्रतिबंध चाहता था, जिसे ईरान ने अपनी ‘डिफेंसिव डॉक्ट्रिन’ (रक्षा सिद्धांत) के खिलाफ माना। ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण और वहां से ट्रांजिट शुल्क लेने के अधिकार पर जोर दिया, जिसे अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय मार्ग मानकर खारिज कर दिया। ईरान ने अमेरिका पर गैरकानूनी और अत्यधिक मांगें रखने का आरोप लगाया, जबकि अमेरिका ने ईरान को समझौता न करने के लिए जिम्मेदार ठहराया। अमेरिका द्वारा पेश किए गए ‘लीबिया मॉडल’ (परमाणु हथियारों का पूर्ण त्याग) को ईरान ने अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर अस्वीकार कर दिया।
अब ईरान की ओर रुख करें, तो ईरान की मांग थी कि लेबनान में युद्ध विराम हो। ईरान उसे शांति वार्ता का हिस्सा बताता रहा, लेकिन अमेरिका और इजराइल इसे अलग हिस्सा मान रहे हैं। ईरान चाहता है कि अमरीका उसकी जब्त की हुई संपतियों को छोड़े और आर्थिक प्रतिबंध हटाए, जबकि अमेरिका बदले में परमाणु और मिसाइल को खत्म करने पर अडिग रहा। ईरान चाहता है कि उसके अधिकार को मान्यता मिले। साथ ही वह जहाजों पर टोल टैक्स भी लगाना चाहता है और चाहता है कि जलमार्ग में निर्बाध आगमन होता रहे। लेबनान में जारी इजरायली हमले और हिजबुल्लाह के साथ संघर्ष को अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के विफल होने या रुकने के मुख्य कारणों में से एक माना गया है। ईरान ने लेबनान में संघर्षविराम को अपनी शर्तों में शामिल किया था, जबकि इजरायल और अमेरिका इस पर असहमत थे, जिससे वार्ता में गतिरोध उत्पन्न हुआ। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शांति वार्ता के दौरान अपनी तरफ से ईरान पर पूरा दबाव बनाकर रखा। राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ पर लिखा कि अमेरिकी सेना पूरी दुनिया के लिए हॉर्मूज को खुलवाने के लिए खाड़ी में पहुंच गई है और ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड नौसेना की समुदी बारूदी सुरंग बिछाने वाली सभी 28 नौकाओं को नष्ट कर दिया है।
अब जब ऐसी स्थिति होगी, तो शांति वार्ता का क्या औचित्य रह जाएगा? क्या यह वार्ता शांति के मार्ग पर कभी आगे बढ़ पाएगी? फरवरी की 28 तारीख से अमेरिका द्वारा शुरू की गई बमबारी को अब चार सप्ताह से ज्यादा समय हो गए हैं, लेकिन शांति वार्ता फेल होने के कारण कब तक यह युद्ध चलता रहेगा, इसके बारे में कोई कुछ कह नहीं सकता है। यही हाल तो रूस और यूक्रेन का हुआ है जिसे लड़ते हुआ अब चार वर्ष हो गए हैं। विश्व की महाशक्तियों को क्या यह पता नहीं है कि यह 21वीं सदी है। आज 1945 का वर्ष नहीं, जब अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी शहर को बर्बाद कर दिया था और जापान को झुकने पर मजबूर कर दिया था। वही स्थिति अब रूस और यूक्रेन युद्ध की हो गई है, जहां उस युद्ध से कोई दो कदम पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। अमेरिका को भी स्पष्ट रूप से समझना होगा कि वह यदि ताकतवर है और जापान की तरह ईरान पर परमाणु बम मारकर उसे नष्ट कर देने की बात भी दिमाग में लाएगा, तो इसके लिए विश्व का कोई भी देश और राष्ट्रध्यक्ष कथमपि तैयार नहीं होगा। और, फिर रही ईरान की बात, तो ऐसा सोचना अमेरिका की सबसे बड़ी भूल होगी कि ईरान छोटा और कमजोर मुल्क है। वह तैयार है अपनी सुरक्षा और अपनी जनता की रक्षा के लिए। दूसरी ओर विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अमरीका-इजराइल द्वारा ब्लैकमेल होने के कारण इजराइल के युद्ध में अपने देश और अपनी ताकत को झोंक दिया है। अब यह बात भी आम जनता को समझ में नहीं आती कि अमरीकी राष्ट्रपति ने जो दो सप्ताह के युद्ध विराम की बात कही थी, वह पूरी भी हो पाएगी या फिर घनघोर युद्ध ही अंतिम विकल्प होगा। सच तो यह है कि युद्ध किसी के हित के लिए अच्छा नहीं होता है, लेकिन इन दोनों युद्धों को रोकने के लिए उस तरह का प्रयास कोई नहीं कर रहा है, जिससे युद्ध पर विराम लगे और खून की नदियां न बहे। यह कैसे होगा, इस पर तो पूरे विश्व को विचार करना ही होगा; क्योंकि शांति के सबसे बड़े पुजारी महात्मा गांधी तो हमारे ही भारत के रहे हैं, जिन्होंने विश्व शांति का अलख जगाया था और आज भी विश्व उनके सिद्धांतों को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। काश हमारा भारत इस शांति वार्ता की अगुआई और मध्यस्थता करता और विश्व को शांति का वास्तविक अर्थ समझा सकता।

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