किशनगंज : नियमित रूप से दवा ले और पोषण का ख्याल रख निखत ने टीबी को दी मात।

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टीबी के मरीजों की जांच व दवा की व्यवस्था सभी सरकारी अस्पताल में निःशुल्क उपलब्ध है।

  • गत वर्ष में कुल 1629 रोगियों की हुई पहचान।

किशनगंज/धर्मेन्द्र सिंह, टीबी लाइलाज बीमारी नहीं है, बशर्ते समय से सही उपचार शुरू कर दिया जाए तो मरीज स्वस्थ हो सकते हैं। इसी बात को सार्थक कर रही है जिला के किशनगंज शहरी क्षेत्र के वार्ड संख्या 28 के धरमगंज मझिया रोड निवासी मालती देवी को लगातार खांसी हो रही थी खासी की दावा लगातार 15 दिन तक खाने के बाद भी आराम नही मिलने पर 10 अगस्त 2021 को सदर अस्पताल पहुंची। वहा जांच करवाने पर पता चला की उसे टीवी (क्षय रोग) हो गया है यह सुनते ही वह और उनके पति काफी घबरा जाते है लेकिन स्वास्थ्य केंद्र के डॉ के समझाने पर उसे काफी हिम्मत मिलती है और लगातार दवा खाने का प्रण कर घर जाती है उस दिन से वह रोज दवा का सेवन करती है। आठ माह के नियमित इलाज के बाद उन्होंने 21 जून को पुनः जांच में पता चला की वो टीबी को हरा चुकी और उसका नतीजा यह है की वह बिलकुल ठीक हो चुकी है, निक्षय पोषण योजना के तहत इलाज के दौरान खाते में पोषण हेतु 500 रूपये प्रतिमाह भी आते थे। बीमारी के दौरान भी नियमित रूप से काम किया। इस दौरान किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं हुई। मालती देवी लोगों को यह सलाह देना चाहती हैं। टीबी होने पर घबरायें नहीं, सकारात्मक सोच रखें, नियमित दवा का सेवन करें और पौष्टिक भोजन करें। टीबी पूरी तरह से ठीक होने वाली बीमारी है। टीबी रोग को छिपाए नहीं। यदि घर में या आस-पास टीबी का कोई संभावित रोगी है तो उसे पास के स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाएँ और जांच करायें।

सिविल सर्जन डॉ कौशल किशोर ने बुधवार को जानकारी देते हुए बताया की टीबी मरीजों को इलाज के दौरान पोषण के लिए 500 रुपये प्रतिमाह दिए जाने वाली निक्षय पोषण योजना बड़ी मददगार साबित हुई है। नए मरीज मिलने के बाद उन्हें 500 रुपये प्रति माह सरकारी सहायता भी प्रदान की जा रही है। टीबी मरीज को आठ महीने तक दवा चलती है। इस आठ महीने की अवधि तक प्रतिमाह पांच 500-500 रुपये दिए जाएंगे। योजना के तहत डीबीटी के माध्यम से राशि सीधे बैंक खाते में भेजी जाती है। वहीं टीबी मरीजों के नोटीफाइड करने पर निजी चिकित्सकों को 500 रुपये तथा उस मरीज को पूरी तरह से ठीक हो जाने के बाद भी निजी चिकित्सकों को 500 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती है। वहीं ट्रीटमेंट सपोर्टर को अगर कोई टीबी के मरीज छह माह में ठीक हो गया है तो उसे 1000 रुपये तथा एमडीआर के मरीज के ठीक होने पर 5000 रुपये की प्रोत्साहन दी जाती है। अगर कोई आम व्यक्ति भी किसी मरीज को सरकारी अस्पताल में लेकर आता है और उस व्यक्ति में टीबी की पुष्टि होती है तो लाने वाले व्यक्ति को भी 500 रुपये देने का प्रावधान है।

सिविल सर्जन डॉ कौशल किशोर ने बताया कि टीबी को हराने के लिए सबसे पहले हमारे समाज को आगे आने की जरूरत है। वहीं गरीबी और कुपोषण टीबी के सबसे बड़े कारक हैं। इसके बाद अत्यधिक भीड़, कच्चे मकान, घर के अंदर प्रदूषित हवा, प्रवासी, डायबिटीज, एचआईवी, धूम्रपान भी टीबी के कारण होते हैं। टीबी मुक्त करने के लिए सक्रिय रोगियों की खोज, प्राइवेट चिकित्सकों की सहभागिता, मल्टीसेक्टरल रिस्पांस, टीबी की दवाओं के साथ वैसे समुदाय के बीच भी पहुंच बनानी होगी जहां अभी तक लोगों का ध्यान नहीं जा पाया है। सिविल सर्जन डॉ किशोर ने कहा कि टीबी पर प्रभावी नियंत्रण और उन्मूलन के लिए सरकार ने एक नई योजना शुरू की है। इसका उद्देश्य क्षय रोग से मुक्ति पाना है। नई योजना के तहत सारथी के तौर पर निश्चय पोर्टल बनाया गया है। इसके माध्यम से प्रशासनिक स्तर पर ऑनलाइन निगरानी की जा रही है। पोर्टल के माध्यम से टीबी मरीजों और उनके इलाज से संबंधित सूचनाएं और इलाज से स्वास्थ्य में सुधार की जानकारियां दर्ज हो रही हैं। प्रतिदिन पोर्टल अपडेट किया जा रहा है। इसमें सुझाव और शिकायत को लेकर भी सुविधाएं दी गई हैं। डॉ देवेन्द्र कुमार ने बताया कि जिले में गत वर्ष कुल 1629 यक्ष्मा रोगियों की पहचान की गई है। जिसमें मरीजों की पहचान 1499 सरकारी अस्पतालों में तथा 130 मरीजों की पहचान प्राइवेट अस्पतालों के द्वारा की गई है। जिसे मरीजों को निश्चय योजना का लाभ तथा उपचार के लिए सरकारी अस्पतालों में रेफर किया गया।

जिला गैर संचारी रोग पदाधिकारी एवं यक्ष्मा नियंत्रण पदाधिकारी डॉ देवेन्द्र कुमार ने बताया कि एमडीआर-टीबी होने पर सामान्य टीबी की कई दवाएं एक साथ प्रतिरोधी हो जाती हैं। टीबी की दवाओं का सही से कोर्स नहीं करने एवं बिना चिकित्सक की सलाह पर टीबी की दवाएं खाने से ही सामान्यतः एमडीआर-टीबी होने की संभावना है।

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