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• बंगाल की सियासत में बढ़ता तापमान: ध्रुवीकरण, वोटर लिस्ट और सत्ता संघर्ष का त्रिकोण: चंदन चौरसिया

• चुनावी रणनीति या सामाजिक विभाजन? जमीन पर बदलती राजनीति की सच्चाई
• केंद्र-राज्य टकराव से प्रशासनिक भरोसा कमजोर, जनता के मुद्दे पीछे छूटे— चंदन चौरसिया

पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनाव से पहले का माहौल सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक तनाव का रूप लेता जा रहा है। पश्चिम बंगाल में इस समय जो सबसे बड़ा हॉट मुद्दा उभरकर सामने आया है, वह तीन अहम पहलुओं पर टिका है सियासी ध्रुवीकरण, वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और केंद्र-राज्य के बीच बढ़ता टकराव। यह तीनों मुद्दे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं और मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं, जिसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और सामाजिक संतुलन दोनों पर सवाल उठ रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार जहां खुद को बंगाल की अस्मिता की रक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी इस पूरे घटनाक्रम को तुष्टिकरण और प्रशासनिक विफलता के रूप में दिखाने में जुटी है। जमीनी स्तर पर देखें तो यह लड़ाई अब सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि समाज के भीतर विचारों और पहचान की लड़ाई में बदलती जा रही है।

सबसे पहले बात सियासी ध्रुवीकरण की करें तो बंगाल में यह कोई नया ट्रेंड नहीं है, लेकिन इस बार इसकी तीव्रता कहीं ज्यादा दिखाई दे रही है। धार्मिक आयोजनों, त्योहारों और सार्वजनिक अनुमति को लेकर उठे विवादों ने राजनीतिक रंग ले लिया है। सत्ता पक्ष इसे सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा का मुद्दा बताता है, जबकि विपक्ष इसे भेदभाव और वोट बैंक की राजनीति का उदाहरण कहता है। नतीजा यह है कि आम जनता, जो पहले इन मुद्दों को सामाजिक परंपरा के रूप में देखती थी, अब उन्हें राजनीतिक चश्मे से देखने लगी है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी मोहल्लों तक, बातचीत का स्वर बदल गया है जहां पहले विकास, रोजगार और महंगाई की चर्चा होती थी, वहां अब पहचान और अधिकार की बहस हावी हो गई है। यह बदलाव लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी भी है, क्योंकि जब चुनावी विमर्श सामाजिक विभाजन पर आधारित हो जाता है, तो असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। यही कारण है कि बंगाल में इस समय राजनीतिक दलों की रणनीति जनता को जोड़ने के बजाय अलग-अलग खेमों में बांटने की ओर ज्यादा केंद्रित दिख रही है।

चंदन चौरसिया ने कहा कि दूसरा बड़ा मुद्दा वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का है, जिसने चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है। तकनीकी खामियों, नामों के गायब होने और डुप्लीकेट एंट्री जैसे आरोपों ने आम मतदाता के मन में संदेह पैदा कर दिया है। चुनाव आयोग और प्रशासन के बीच जिम्मेदारी तय करने को लेकर जो असमंजस है, उसने स्थिति को और जटिल बना दिया है। जब किसी मतदाता को यह भरोसा ही न हो कि उसका नाम सूची में सुरक्षित है या नहीं, तो लोकतंत्र की सबसे बुनियादी प्रक्रिया ही कमजोर पड़ जाती है। यही नहीं, यह मुद्दा अब अदालत तक पहुंच चुका है और भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक में इस पर चर्चा हो रही है, जिससे इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है। जमीनी हकीकत यह है कि गांवों और कस्बों में लोग अपने नाम की पुष्टि के लिए बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। कई जगहों पर यह शिकायत भी सामने आई है कि राजनीतिक प्रभाव के आधार पर नाम जोड़े या हटाए जा रहे हैं। भले ही इन आरोपों की पुष्टि हर मामले में न हो, लेकिन यह धारणा बनना ही लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। क्योंकि चुनाव सिर्फ नतीजों से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की निष्पक्षता से भी तय होते हैं।

चौरसिया ने कहा कि तीसरा और सबसे व्यापक प्रभाव डालने वाला पहलू है केंद्र और राज्य सरकार के बीच बढ़ता टकराव। जांच एजेंसियों की कार्रवाई, प्रशासनिक फैसलों में दखल और राजनीतिक बयानबाजी इन सबने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया है, जहां शासन का ध्यान विकास से हटकर टकराव पर केंद्रित हो गया है। राज्य सरकार केंद्र पर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाती है, जबकि केंद्र समर्थित दल राज्य सरकार को भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। इस खींचतान का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है। योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी, प्रशासनिक असमंजस और अधिकारियों पर बढ़ता दबाव—ये सभी संकेत हैं कि राजनीतिक संघर्ष अब प्रशासनिक कामकाज को भी प्रभावित कर रहा है। जब शासन का फोकस टकराव पर ज्यादा और समाधान पर कम हो जाता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ता है। स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और जनता खुद को राजनीतिक खेल का एक हिस्सा मात्र महसूस करने लगती है।

चंदन चौरसिया ने कहा कि पश्चिम बंगाल का यह मौजूदा परिदृश्य सिर्फ एक राज्य की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती का संकेत है। सियासी ध्रुवीकरण, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल और सत्ता के बीच टकराव—ये तीनों मिलकर एक ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जिसमें लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ सकती है। जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल अपने-अपने हितों से ऊपर उठकर जनता के वास्तविक मुद्दों पर ध्यान दें और चुनाव को एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के रूप में प्रस्तुत करें, न कि सामाजिक विभाजन के मंच के रूप में। क्योंकि आखिरकार लोकतंत्र की ताकत जनता के भरोसे में होती है, और अगर वही भरोसा डगमगाने लगे, तो सबसे बड़ा नुकसान पूरे सिस्टम को होता है।

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