रामनवमी पर ‘राजनीतिक रामायण’: क्या बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री? नीतीश युग के अंत की आहट तेज: चंदन चौरसिया
नवरात्र में बदलते सियासी संकेत—भाजपा ने तेज की अपनी रणनीति, दिल्ली से पटना तक हलचल

नीतीश कुमार के संकेतों से बढ़ा संशय, सम्राट चौधरी से लेकर निशांत तक कई चेहरे चर्चा में
त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि बिहार की राजनीति इन दिनों एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां हर दिन नए संकेत और नए समीकरण उभर रहे हैं। खासतौर पर रामनवमी 2026 को लेकर जिस तरह की चर्चाएं तेज हुई हैं, उसने सत्ता परिवर्तन की अटकलों को और मजबूत कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी अब राज्य में अपने पहले मुख्यमंत्री को स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ती दिख रही है। लंबे समय से सहयोगी रहे नीतीश कुमार को लेकर भाजपा के रुख में बदलाव के संकेत साफ हैं। पार्टी अब केवल सहयोगी भूमिका में नहीं, बल्कि नेतृत्व की भूमिका में आने के मूड में नजर आ रही है। यही वजह है कि नवरात्र के शुभ अवसर पर शपथ ग्रहण की चर्चा केवल अफवाह नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत के रूप में देखी जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय नेतृत्व, विशेष रूप से अमित शाह और नरेंद्र मोदी के स्तर पर बिहार के नए नेतृत्व को लेकर मंथन लगभग अंतिम दौर में पहुंच चुका है। यह बदलाव न केवल सत्ता के चेहरे को बदलेगा, बल्कि बिहार की राजनीति की दिशा भी तय करेगा।
चौरसिया ने कहा कि वहीं दूसरी ओर, नीतीश कुमार की हालिया गतिविधियों ने सस्पेंस को और गहरा कर दिया है। राज्यसभा चुनाव में नामांकन के बाद उनका लगातार ‘समृद्धि यात्रा’ पर निकल जाना, विधानसभा की कार्यवाही से दूरी बनाए रखना और विभिन्न नेताओं के साथ अलग-अलग संकेत देना—इन सबने भाजपा और राजनीतिक विश्लेषकों को असमंजस में डाल दिया है। खास बात यह है कि उन्होंने कभी भी खुलकर अपने उत्तराधिकारी का नाम नहीं लिया, लेकिन कई नेताओं के कंधे पर हाथ रखकर ‘जिम्मेदारी’ का संकेत जरूर दिया है। इनमें सम्राट चौधरी, विजय कुमार चौधरी, लेसी सिंह और राजीव रंजन सिंह जैसे नाम शामिल हैं। इसके साथ ही उनके बेटे निशांत कुमार को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं गर्म हैं, हालांकि खुद नीतीश कुमार ने इस पर कभी स्पष्ट बयान नहीं दिया। यह रणनीतिक चुप्पी कहीं न कहीं भाजपा के लिए चुनौती बनती जा रही है, क्योंकि पार्टी अब स्पष्ट नेतृत्व के साथ आगे बढ़ना चाहती है। यही कारण है कि भाजपा अपने स्तर पर नेतृत्व तय करने की दिशा में सक्रिय हो गई है, जिससे यह संदेश भी जाए कि बिहार में अब सत्ता का केंद्र बदलने वाला है।
चंदन चौरसिया ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि भाजपा अब ‘टाइमिंग’ पर काम कर रही है। पहले जहां खरमास के खत्म होने का इंतजार किया जा रहा था, वहीं अब नवरात्र के दौरान ही शपथ ग्रहण कराने की चर्चा तेज हो गई है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, रामनवमी या उसके अगले दिन नई सरकार का गठन संभव है। इसके पीछे धार्मिक और राजनीतिक दोनों संदेश छिपे हैं—एक तरफ रामनवमी का प्रतीकात्मक महत्व और दूसरी तरफ “जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे” जैसे नारों के जरिए जनभावना को जोड़ने की रणनीति। यदि ऐसा होता है तो यह बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा, जहां पहली बार भाजपा अपने दम पर मुख्यमंत्री पद संभालेगी। साथ ही यह नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक युग के अंत की शुरुआत भी मानी जाएगी। हालांकि अंतिम फैसला अभी सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, उससे साफ है कि आने वाले कुछ दिन बिहार की राजनीति के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं।



