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• पेट्रोल में एथेनॉल: आपकी गाड़ी के लिए वरदान या मुसीबत? E20 को लेकर हर सवाल का जवाब

• माइलेज घटा, गाड़ियां हुईं बीमार, मरम्मत का खर्च बढ़ा... आखिर हरित ईंधन की कीमत सिर्फ जनता ही क्यों चुकाए?

चंदन चौरसिया/वर्कशॉप में बढ़ती भीड़, पुराने वाहनों की बढ़ती परेशानी, फ्यूल सिस्टम पर सवाल और महंगे पेट्रोल के बीच एथेनॉल मिश्रण पर फिर उठने लगे हैं बड़े सवाल। क्या पर्यावरण बचाने की कीमत सिर्फ आम आदमी की जेब से वसूली जा रही है?

वरिष्ठ पत्रकार: चंदन चौरसिया पटना| पेट्रोल पंप पर गाड़ी रुकती है। टैंक फुल कराया जाता है। मीटर पर रकम पहले से ज्यादा दिखाई देती है, लेकिन गाड़ी पहले जितनी दूर नहीं जाती। कुछ महीनों बाद इंजन की आवाज बदलने लगती है। कभी स्टार्ट होने में दिक्कत, कभी पिकअप कमजोर, तो कभी सर्विस सेंटर से सलाह—”फ्यूल सिस्टम की सफाई करानी पड़ेगी।”

देश के लाखों वाहन मालिकों के बीच ऐसी शिकायतें लगातार सुनाई दे रही हैं। सवाल यह नहीं कि हर गाड़ी में यही समस्या हो रही है, बल्कि सवाल यह है कि यदि इतनी बड़ी संख्या में उपभोक्ता एक जैसी शिकायतें कर रहे हैं तो उनकी बात गंभीरता से क्यों नहीं सुनी जा रही?

सरकार एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को हरित ऊर्जा की दिशा में बड़ा कदम बता रही है। इससे कच्चे तेल के आयात में कमी, किसानों की आय में वृद्धि और प्रदूषण घटाने की बात कही जा रही है। उद्देश्य निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन जब नीति का असर सीधे आम आदमी की जेब और उसकी गाड़ी पर पड़ने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।

सबसे बड़ी शिकायत माइलेज को लेकर है। अनेक वाहन चालकों का कहना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल भराने के बाद पहले की तुलना में गाड़ी कम दूरी तय कर रही है। तकनीकी विशेषज्ञ बताते हैं कि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा कम होती है। इसलिए मिश्रण बढ़ने पर कुछ वाहनों में माइलेज में हल्की कमी आ सकती है। नए E20-अनुकूल वाहनों में इसका प्रभाव सीमित रहने की उम्मीद होती है, लेकिन पुराने वाहनों में अंतर अधिक महसूस हो सकता है।

इसके साथ ही कई मैकेनिक बताते हैं कि पुराने मॉडल की बाइकों और कारों में फ्यूल पाइप, रबर सील, गैस्केट और कुछ धातु वाले हिस्सों पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिलता है। एथेनॉल नमी को अपनी ओर खींचता है। यदि वाहन लंबे समय तक खड़ा रहे या ईंधन की गुणवत्ता ठीक न हो, तो पानी की मौजूदगी जंग या अन्य समस्याओं का कारण बन सकती है। हालांकि यह हर वाहन में नहीं होता और इसकी गंभीरता वाहन की बनावट, रखरखाव और ईंधन की स्थिति पर भी निर्भर करती है।

वर्कशॉप चलाने वाले कई लोगों का कहना है कि हाल के वर्षों में फ्यूल इंजेक्टर की सफाई, फ्यूल फिल्टर बदलने और टैंक की सफाई जैसी शिकायतें बढ़ी हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि हर समस्या की वजह सिर्फ एथेनॉल है, क्योंकि खराब ईंधन, समय पर सर्विस न होना और वाहन की उम्र भी महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं। लेकिन यदि लाखों वाहन मालिक एक जैसी शिकायतें कर रहे हैं, तो इस पर व्यापक अध्ययन और पारदर्शी रिपोर्ट सामने आनी चाहिए।

एक और चिंता उन करोड़ों लोगों की है जिनके पास दस-पंद्रह साल पुराने दोपहिया और चारपहिया वाहन हैं। ये वाहन उस समय बने थे जब E20 पेट्रोल का प्रचलन नहीं था। ऐसे वाहन मालिकों के सामने विकल्प भी सीमित हैं। पेट्रोल वही मिलेगा जो पंप पर उपलब्ध है। ऐसे में यदि उनका वाहन इस मिश्रण के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं है, तो अतिरिक्त खर्च आखिर कौन उठाएगा?

व्यापारियों की परेशानी भी कम नहीं है। टैक्सी चालक, ऑटो चालक, डिलीवरी पार्टनर, छोटे कारोबारी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोज सैकड़ों किलोमीटर चलने वाले लोग बताते हैं कि यदि माइलेज में थोड़ी भी कमी आती है तो महीने के अंत में ईंधन का खर्च हजारों रुपये बढ़ जाता है। उनके लिए यह केवल तकनीकी बहस नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का सवाल है।

सरकार का पक्ष भी समझना जरूरी है। एथेनॉल मिश्रण से देश का आयात बिल घट सकता है, गन्ना किसानों को नया बाजार मिलता है और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में मदद मिलती है। यही वजह है कि दुनिया के कई देश भी एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन उन देशों में वाहन तकनीक, ईंधन गुणवत्ता और उपभोक्ता जागरूकता पर भी समान रूप से ध्यान दिया गया।

यहीं भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। करोड़ों पुराने वाहन अभी भी सड़कों पर हैं। यदि नई नीति लागू की जा रही है, तो इन वाहनों के लिए अलग रणनीति क्यों नहीं बनाई गई? क्या उन्हें तकनीकी सहायता मिलेगी? क्या किसी तरह का मुआवजा या राहत दी जाएगी? क्या उपभोक्ता को यह बताया जाएगा कि उसका वाहन किस स्तर तक एथेनॉल मिश्रण सहन कर सकता है?

सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का है। यदि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से माइलेज में कमी आ सकती है, तो इसकी स्पष्ट जानकारी पेट्रोल पंपों पर क्यों नहीं लिखी जाती? यदि कुछ पुराने वाहनों में अतिरिक्त रखरखाव की जरूरत पड़ सकती है, तो उपभोक्ता को पहले से चेतावनी क्यों नहीं दी जाती?

हरित ऊर्जा की दिशा में बढ़ना जरूरी है। लेकिन कोई भी नीति तभी सफल मानी जाएगी जब उसका बोझ समान रूप से बंटे। यदि फायदा पूरे देश को होगा, तो नुकसान की भरपाई केवल आम आदमी क्यों करे?

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार, वाहन निर्माता कंपनियां, तेल कंपनियां और स्वतंत्र विशेषज्ञ मिलकर व्यापक अध्ययन करें। वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। यदि कहीं समस्या है तो उसका समाधान निकाला जाए। यदि शिकायतें भ्रम हैं तो वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जनता को समझाया जाए। लेकिन शिकायतों को केवल अफवाह कहकर खारिज कर देना समाधान नहीं है।

आखिरकार सवाल सिर्फ एथेनॉल का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है जिसके आधार पर नागरिक अपनी मेहनत की कमाई से पेट्रोल खरीदता है। वह चाहता है कि उसकी गाड़ी सुरक्षित चले, उसका खर्च अनावश्यक न बढ़े और किसी भी नई नीति का भार उस पर अकेले न डाला जाए।हरित भविष्य की राह पर देश जरूर आगे बढ़े, लेकिन यह रास्ता ऐसा होना चाहिए जिसमें पर्यावरण भी सुरक्षित रहे और आम आदमी की जेब भी।

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