सहरसा : पुलिस तक आसान पहुंच ही महिला और बच्चों की सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी : डीआईजी
‘आवाज दो’ पहल से 300 से अधिक नाबालिग लड़कियों को मानव तस्करी के नेटवर्क से बचाया, 800 से अधिक महिलाओं को मिली सहायता

सहरसा, 31 अक्टूबर (के.स.)। अजय कुमार, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए पुलिस व्यवस्था का संवेदनशील, सक्रिय और आम लोगों की पहुंच में होना जरूरी है। जब किसी महिला को घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न या किसी लड़की को ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग का सामना करना पड़ता है, तब पुलिस की त्वरित कार्रवाई और संवेदनशील व्यवहार ही पीड़ितों को न्याय की उम्मीद देता है। ये बातें कोसी क्षेत्र, सहरसा के पुलिस उपमहानिरीक्षक डॉ. कुमार आशीष ने अपने विचार साझा करते हुए कहीं।
उन्होंने कहा कि एक जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 महिलाओं एवं बच्चों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कानूनी आधार प्रदान करती है। इसके साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और पॉक्सो अधिनियम जैसे कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है। कानून का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब पीड़ितों को समय पर सुरक्षा, न्याय और पुनर्वास की सुविधा मिलेगी।
डीआईजी ने पुलिस की कार्यशैली में संवेदनशीलता को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि पीड़ित और पुलिस के बीच पहली बातचीत ही तय करती है कि पीड़ित न्याय के लिए आगे आएगा या चुप्पी साध लेगा। इसलिए शिकायतों को गंभीरता से सुनना, पीड़ित को भरोसा देना और बिना अनावश्यक देरी के कार्रवाई करना पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि महिलाओं की सुरक्षा, उत्पीड़न, ऑनलाइन शोषण, दहेज संबंधी दुर्व्यवहार और घरेलू विवादों के समाधान के लिए ‘आवाज दो’ (AAWAZ DO) पहल शुरू की गई। अक्टूबर 2024 में जिला प्रशासन, जिला न्यायपालिका और मिशन मुक्ति फाउंडेशन के सहयोग से सारण जिले में शुरू हुई इस पहल के तहत मानव तस्करी के नेटवर्क से 300 से अधिक नाबालिग लड़कियों को बचाया गया, जबकि ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग, जबरन वसूली और घरेलू व दहेज संबंधी समस्याओं से जूझ रहीं 800 से अधिक महिलाओं को सहायता प्रदान की गई।
उन्होंने कहा कि साइबर अपराधों के बढ़ते खतरे को देखते हुए पुलिसकर्मियों को डिजिटल फोरेंसिक और साक्ष्य संरक्षण का विशेष प्रशिक्षण देना जरूरी है। मानव तस्करी के मामलों में अंतरजिला एवं अंतरराज्यीय समन्वय के साथ पीड़ितों के सुरक्षित आवास, चिकित्सा, शिक्षा और दीर्घकालिक पुनर्वास पर भी ध्यान देना होगा।
डीआईजी ने स्पष्ट किया कि महिला और बाल सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार, विद्यालय और समाज की भी सामूहिक जवाबदेही है। उन्होंने कहा कि पुलिस व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जहां हर महिला बिना डर शिकायत दर्ज करा सके और हर बच्चा अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त रहे। न्याय की असली कसौटी यही है कि जरूरत के समय पुलिस आम नागरिक की पहुंच में हो।


