बिहारब्रेकिंग न्यूज़

सहरसा का सांस्कृतिक खजाना : मत्स्यगंधा वैदेही कला संग्रहालय

रामायण, मिथिला और विश्व संस्कृति को जोड़ता एक अनोखा संग्रहालय

सहरसा, 21 सितंबर (के.स.)। अजय कुमार, बिहार के सहरसा शहर की पहचान प्रायः कोसी नदी, बाढ़ और कृषि प्रधान क्षेत्र के रूप में की जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसी शहर में एक ऐसा संग्रहालय भी है जो रामायण, मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा और दक्षिण-पूर्व एशिया की कलात्मक विरासत को एक सूत्र में पिरोता है। मत्स्यगंधा झील के उत्तरी किनारे स्थित वैदेही कला संग्रहालय (रामायण इंटरनेशनल आर्ट्स म्यूज़ियम) आज न केवल कोसी क्षेत्र बल्कि पूरे बिहार की सांस्कृतिक पहचान बनता जा रहा है।इस संग्रहालय की स्थापना प्रसिद्ध कला इतिहासकार, लेखक, शिक्षाविद् और सांस्कृतिक चिंतक प्रो. डॉ. ओम प्रकाश भारती ने की है। वर्षों तक भारतीय कला, लोक संस्कृति और रामायण परंपरा पर शोध करने के बाद उन्होंने सहरसा में एक ऐसे केंद्र की कल्पना की, जहाँ लोग केवल वस्तुएँ देखने न आएँ, बल्कि भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को समझ भी सकें।

संग्रहालय में प्रवेश करते ही दर्शक रामायण की कथा यात्रा के साथ आगे बढ़ते हैं। यहाँ माता सीता के जन्म से लेकर राम-जानकी मिलन, धनुष भंग, सीता स्वयंवर, वनगमन, केवट प्रसंग, सीता हरण, जटायु मोक्ष, शबरी प्रसंग, राम-रावण युद्ध और अग्नि परीक्षा तक के प्रसंगों को चित्रों और कलाकृतियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इन चित्रों की विशेषता यह है कि वे केवल धार्मिक आख्यान नहीं सुनाते, बल्कि भारतीय समाज, लोकविश्वास और सांस्कृतिक मूल्यों की भी झलक दिखाते हैं।

संग्रहालय की सबसे बड़ी विशेषता इसका अंतरराष्ट्रीय स्वरूप है। यहाँ भारत के अतिरिक्त तिब्बत, इंडोनेशिया, कंबोडिया, मलेशिया, थाईलैंड और वियतनाम से संबंधित रामायण कला परंपराओं का भी प्रदर्शन किया गया है। थाईलैंड के खोन नृत्य, कंबोडिया की रामायण चित्रकला और दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य कला रूप यह बताते हैं कि रामायण केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि पूरे एशिया की साझा विरासत है।वैदेही कला संग्रहालय केवल प्रदर्शनी स्थल नहीं है। यहाँ समय-समय पर चित्रकला कार्यशालाएँ, संगोष्ठियाँ, लोककला प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय कला महोत्सव आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों में देश-विदेश के कलाकार, शोधकर्ता, विद्यार्थी और सांस्कृतिक कर्मी भाग लेते हैं। संग्रहालय के माध्यम से नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं से जोड़ने का प्रयास लगातार किया जा रहा है।

संग्रहालय से जुड़ी गतिविधियों में मिथिला और कोसी अंचल की लोक परंपराओं को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। रसन चौकी, नारदी गायन, भगैत, जट-जटिन, विदेशिया, नटुवा नाच और अन्य लोककलाओं पर यहाँ शोध, प्रदर्शन और चर्चा होती रही है। लोकगाथा भगैत पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रो. ओम प्रकाश भारती ने इसे मिथिलांचल की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया था।

संग्रहालय का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका शैक्षणिक स्वरूप भी है। यहाँ आने वाले विद्यार्थियों को रामायण, लोक संस्कृति, कला इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त होती है। चित्रों, वाद्ययंत्रों, मुखौटों और कलावस्तुओं के माध्यम से सीखने का अनुभव पुस्तकीय ज्ञान से कहीं अधिक प्रभावी सिद्ध होता है। यही कारण है कि विभिन्न विद्यालयोंके छात्र-छात्राएँ यहाँ भ्रमण के लिए आते हैं और भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को समझते हैं।

आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती जा रही है, ऐसे समय में वैदेही कला संग्रहालय जैसी संस्थाएँ विरासत संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। यह संग्रहालय अतीत की स्मृतियों को संजोने के साथ-साथ वर्तमान पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक पहचान से परिचित कराता है।

सहरसा आने वाला कोई भी व्यक्ति यदि इस संग्रहालय का भ्रमण करता है तो वह केवल चित्र और कलाकृतियाँ नहीं देखता, बल्कि रामायण की यात्रा, मिथिला की परंपराओं और एशिया की सांस्कृतिक एकता का साक्षात्कार करता है। यहाँ रामायण केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि कला, इतिहास, लोकजीवन और सांस्कृतिक संवाद के रूप में सामने आती है।दुर्भाग्य की बात यह है कि सहरसा और कोसी क्षेत्र के अनेक लोग आज भी इस संग्रहालय के बारे में नहीं जानते। जिस संग्रहालय में रामायण की अंतरराष्ट्रीय परंपराएँ, मिथिला की सांस्कृतिक विरासत और लोककलाओं का इतना समृद्ध संग्रह मौजूद हो, वह अभी भी व्यापक जनचर्चा से दूर है। मत्स्यगंधा झील के किनारे स्थित यह संग्रहालय सहरसा की उस सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके बारे में अधिक से अधिक लोगों को जानना चाहिए।

यह केवल कलाकृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि हमारी स्मृतियों, परंपराओं और साझा सांस्कृतिक विरासत को संजोने का एक गंभीर प्रयास है।

dharmendra singh

धर्मेन्द्र सिंह प्रिंट माध्यम में 17 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 10 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं।राजनीतिक, सामाजिक व अपराध की खबरों में विशेष रूचि है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button