• क्या 2029 से देश में एक साथ होंगे चुनाव? सरकार के दावों और विपक्ष के सवालों के बीच समझिए पूरा गणित
• 2029 तक 'वन नेशन, वन इलेक्शन' लागू करने की तैयारी का दावा, लेकिन संविधान से लेकर राज्यों के अधिकार तक कई सवाल अभी बाकी

• सरकार कह रही है- खर्च बचेगा और विकास तेज होगा, विपक्ष पूछ रहा है- क्या लोकतंत्र सुविधा से बड़ा नहीं है?
त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा कि भारत की चुनावी राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने संकेत दिया है कि यदि प्रक्रिया तय समय पर आगे बढ़ी तो वर्ष 2029 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था लागू हो सकती है। यह बयान ऐसे समय आया है, जब ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लेकर राजनीतिक, संवैधानिक और प्रशासनिक स्तर पर बहस लगातार तेज हो रही है।
सरकार इस व्यवस्था को चुनावी सुधारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे लोकतंत्र और संघीय ढांचे के लिए गंभीर चुनौती मान रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत वास्तव में 2029 तक एक साथ चुनाव कराने की स्थिति में पहुंच पाएगा, या यह बहस अभी लंबी चलेगी?
• सरकार का दावा: चुनाव कम होंगे तो विकास की रफ्तार बढ़ेगी
जेपीसी के अध्यक्ष का कहना है कि समिति अब तक कई राज्यों का दौरा कर चुकी है। संविधान विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, नागरिक संगठनों और विभिन्न वर्गों से राय ली गई है। उनका दावा है कि लगभग 99 फीसदी लोगों ने एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव का समर्थन किया है।
सरकार का तर्क साफ है। आज देश लगभग पूरे साल किसी न किसी चुनाव में व्यस्त रहता है। कभी विधानसभा चुनाव, कभी उपचुनाव तो कभी लोकसभा चुनाव की तैयारियां। इसका सीधा असर सरकारी मशीनरी पर पड़ता है। चुनाव आचार संहिता लागू होने से कई परियोजनाएं धीमी हो जाती हैं और प्रशासनिक अधिकारी चुनावी ड्यूटी में लग जाते हैं।
सत्ता पक्ष का मानना है कि यदि पूरे देश में एक साथ चुनाव होंगे तो सरकारें पांच साल तक बिना चुनावी दबाव के विकास कार्यों पर ध्यान दे सकेंगी।
लेकिन यहां पहला सवाल उठता है…
क्या विकास की रफ्तार बढ़ाने का एकमात्र तरीका चुनावों को एक साथ कराना ही है?
सरकार का जवाब है कि नहीं, लेकिन यह सबसे प्रभावी सुधारों में से एक हो सकता है। उनका कहना है कि बार-बार चुनाव होने से नीति निर्माण प्रभावित होता है और राजनीतिक दल भी लगातार चुनावी मोड में रहते हैं।
• सात लाख करोड़ रुपये का दावा… लेकिन कैसे?
समिति ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति के सामने पेश एक आर्थिक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि अलग-अलग समय पर चुनाव होने से देश को करीब सात लाख करोड़ रुपये का आर्थिक प्रभाव झेलना पड़ता है।
इसमें चुनावी खर्च, प्रशासनिक संसाधन, सुरक्षा व्यवस्था, विकास कार्यों में देरी और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने वाले असर को प्रमुख कारण बताया गया है।
लेकिन विपक्ष का सवाल भी कम अहम नहीं है।
क्या इस आर्थिक अध्ययन की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक है?
क्या इन आंकड़ों की स्वतंत्र समीक्षा हुई है?
यदि इतना बड़ा दावा किया जा रहा है तो उसके पीछे मौजूद आंकड़ों और अध्ययन की पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी होगी।
• लोकतंत्र का सबसे कठिन सवाल
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ सुनने में जितना आसान लगता है, उसे लागू करना उतना ही जटिल है।
मान लीजिए किसी राज्य की सरकार दो साल बाद गिर जाती है।
तब क्या होगा?
क्या वहां राष्ट्रपति शासन अगले आम चुनाव तक चलेगा?
क्या नई सरकार बनाई जाएगी?
या फिर केवल उस राज्य में चुनाव होंगे?
अगर चुनाव होंगे तो फिर ‘एक देश, एक चुनाव’ की अवधारणा कैसे कायम रहेगी?
यही वे सवाल हैं जिनके जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं।
• सत्ता पक्ष की दलील
सरकार का कहना है कि इन परिस्थितियों के लिए संवैधानिक समाधान तैयार किए जा रहे हैं। रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव, सीमित अवधि की सरकार और अन्य विकल्पों पर चर्चा चल रही है।
सरकार का यह भी कहना है कि लोकतंत्र को अधिक प्रभावी और कम खर्चीला बनाना समय की मांग है।
• विपक्ष की चिंता
विपक्ष इस पूरे प्रस्ताव को अलग नजरिए से देखता है।
उसका कहना है कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों का संघ है। हर राज्य की अपनी राजनीति, अपने मुद्दे और अपनी प्राथमिकताएं हैं।
यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे तो राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय समस्याओं पर भारी पड़ सकते हैं।
किसान, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, उद्योग और स्थानीय प्रशासन जैसे विषय चुनावी विमर्श में पीछे छूट सकते हैं।
• विपक्ष से भी एक सवाल…
यदि बार-बार चुनाव वास्तव में विकास और सरकारी खर्च दोनों को प्रभावित कर रहे हैं, तो इसका व्यावहारिक विकल्प क्या है?
क्या केवल विरोध करना पर्याप्त है?
या फिर चुनाव सुधारों का कोई अलग रोडमैप भी सामने आना चाहिए?
• क्या संविधान तैयार है?
यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू करने के लिए केवल चुनाव आयोग की तैयारी काफी नहीं होगी।
इसके लिए संविधान के कई प्रावधानों में संशोधन करना पड़ सकता है।
लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल, मध्यावधि चुनाव, राष्ट्रपति शासन और सरकार गिरने जैसी परिस्थितियों पर नए नियम बनाने होंगे।
यानी यह राजनीतिक से ज्यादा संवैधानिक चुनौती है।
• क्या 2029 की समय-सीमा यथार्थवादी है?
जेपीसी अध्यक्ष ने संकेत दिया है कि 2029 तक यह व्यवस्था लागू हो सकती है। कुछ राज्यों में इससे पहले भी राजनीतिक सहमति बनने पर चुनावों का समय मिलाया जा सकता है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए केवल संसद में विधेयक पारित होना काफी नहीं होगा। राज्यों की सहमति, व्यापक राजनीतिक संवाद और संवैधानिक प्रक्रियाएं भी उतनी ही अहम होंगी।
• सबसे बड़ा सवाल जनता के सामने
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मुद्दा केवल सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस नहीं है।
यह हर मतदाता से जुड़ा प्रश्न है।
क्या चुनावी खर्च कम होना चाहिए?—बिल्कुल।
क्या विकास कार्य बिना रुकावट चलने चाहिए?—निश्चित रूप से।
लेकिन क्या इन उद्देश्यों को हासिल करते हुए लोकतंत्र की विविधता, राज्यों की स्वायत्तता और जनता के अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रह पाएंगे?
यही वह सवाल है जिसका जवाब आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की नई दिशा तय करेगा।
निष्कर्ष: फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2029 का लोकसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं हो सकता, बल्कि भारत की चुनावी व्यवस्था के सबसे बड़े बदलाव का भी गवाह बन सकता है। सरकार इसे प्रशासनिक सुधार और आर्थिक बचत का मॉडल बता रही है, जबकि विपक्ष इसे संवैधानिक और संघीय संतुलन की कसौटी मान रहा है। अंतिम फैसला संसद में होगा, लेकिन असली परीक्षा देश के लोकतांत्रिक विश्वास और व्यापक सहमति की होगी।
