सहरसा : सड़क हादसे खबर नहीं, परिवारों की जिंदगी भर की त्रासदी हैं : डीआईजी डॉ० कुमार आशीष

सहरसा, 08 अक्टूबर (के.स.)। अजय कुमार, सड़क दुर्घटनाओं का रोजमर्रा की खबरों का हिस्सा बन जाना बेहद चिंताजनक है। एक हादसा खबर बनकर कुछ समय बाद भले ही भुला दिया जाए, लेकिन प्रभावित परिवार के लिए उसका दर्द जिंदगीभर रहता है। कोशी रेंज, सहरसा के डीआईजी डॉ० कुमार आशीष ने सड़क सुरक्षा को लेकर अपने संदेश में तेज रफ्तार, लापरवाही और यातायात नियमों की अनदेखी को गंभीर चुनौती बताते हुए सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि देश में सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा बेहद भयावह है।
केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में भारत में 5.13 लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएं और 1,83,382 मौतें दर्ज की गईं। यानी औसतन हर घंटे सड़क हादसों में करीब 21 लोगों की जान गई। मुंबई, पुणे और जम्मू की हालिया दुर्घटनाएं भी इस गंभीर समस्या की ओर इशारा करती हैं। डीआईजी ने कहा कि तेज गति दुर्घटनाओं का बड़ा कारण है। आधुनिक वाहन कितने भी सुरक्षित क्यों न हों, तेज रफ्तार पर प्रतिक्रिया का समय कम और रुकने की दूरी अधिक हो जाती है। इसलिए तेज चलाना कौशल नहीं, बल्कि गंभीर जोखिम है। सुरक्षित ड्राइविंग का उद्देश्य सबसे पहले मंजिल तक पहुंचना होना चाहिए।
उन्होंने दोपहिया चालकों से हेलमेट और चारपहिया वाहन चालकों से सीट बेल्ट का अनिवार्य रूप से इस्तेमाल करने की अपील की। वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल, शराब या नशे की हालत में ड्राइविंग, खतरनाक ओवरटेकिंग, गलत दिशा में वाहन चलाना और ओवरलोडिंग से बचने की सलाह दी। स्कूल, बाजार, चौराहे और पैदल यात्री क्षेत्रों में गति नियंत्रित रखने पर भी जोर दिया।
डीआईजी के अनुसार सड़क सुरक्षा केवल चालक की जिम्मेदारी नहीं है। सड़क निर्माण एजेंसियों को ब्लैक स्पॉट चिन्हित कर वैज्ञानिक तरीके से सुधार करना होगा। पर्याप्त रोशनी, स्पष्ट लेन चिह्न, सुरक्षित जंक्शन, क्रैश बैरियर, संकेतक, सिग्नल और प्रभावी गति प्रबंधन सड़क सुरक्षा के जरूरी हिस्से हैं। पुलिस को भी चालान की संख्या बढ़ाने के बजाय तेज गति, नशे में ड्राइविंग और अन्य खतरनाक व्यवहार के खिलाफ प्रभावी और निरंतर कार्रवाई पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सड़क सुरक्षा की संस्कृति की शुरुआत घर से होती है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे बड़ों को करते देखते हैं। अभिभावकों को स्वयं यातायात नियमों का पालन कर बच्चों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में सड़क अनुशासन को जीवन कौशल के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
डीआईजी ने आम नागरिकों से अपील की कि दुर्घटना स्थल पर वीडियो बनाने के बजाय घायल की मदद करें और तत्काल आपातकालीन सहायता बुलाएं। उनका कहना है कि पुलिस की सबसे बड़ी सफलता हादसे के बाद दर्ज मामलों की संख्या नहीं, बल्कि वह दुर्घटना है जो कभी होती ही नहीं, वह परिवार है जिसे आधी रात कोई बुरी खबर नहीं मिलती और वह बच्चा है जो सुरक्षित घर लौटता है।



