किशनगंज : रुईधासा महाकाल मंदिर में मां ब्रह्मचारिणी की आराधना, दर्शन को उमड़े श्रद्धालु
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुई पूजा-अर्चना, धैर्य, तप और आत्मसंयम का संदेश देती हैं मां ब्रह्मचारिणी

किशनगंज, 12 अक्टूबर (के.स.)। धर्मेन्द्र सिंह, शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन सोमवार को शहर के रुईधासा स्थित महाकाल मंदिर में मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। मंदिर के पुरोहित गुरु साकेत ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ माता की पूजा संपन्न कराई। सुबह से ही मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। भक्तों ने माता के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की।
मंदिर में नवरात्र के पहले दिन से ही कलश स्थापना कर मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। यहां किशनगंज के अलावा आसपास के जिलों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में मां दुर्गा के साथ महाकाल बाबा की भी पूजा-अर्चना की जाती है। संध्या आरती में श्रद्धालु भक्तिभाव के साथ शामिल होते हैं। नवरात्र को लेकर मंदिर परिसर में उत्साह और श्रद्धा का माहौल बना हुआ है।
तप, त्याग और संयम की प्रतीक हैं मां ब्रह्मचारिणी
पुरोहित गुरु साकेत ने बताया कि नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां का यह स्वरूप तपस्या, त्याग, धैर्य और आत्मसंयम का प्रतीक है। माता की आराधना से भक्तों को मानसिक शांति, आंतरिक शक्ति और कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस प्राप्त होता है। पूजा के दौरान ‘ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः’ मंत्र का जाप शुभ माना जाता है। माता को चीनी और मिश्री का भोग अर्पित करने की भी परंपरा है।
भगवान शिव को पाने के लिए की थी कठोर तपस्या
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इसी तप के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी नाम मिला। माता का स्वरूप शांत और तेजस्वी माना जाता है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं तथा उनके एक हाथ में जपमाला और दूसरे हाथ में कमंडल रहता है।
गुरु साकेत ने कहा कि मां ब्रह्मचारिणी की उपासना भक्तों को अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और स्वार्थ से दूर रहकर सदाचार, संयम और धैर्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। श्रद्धालुओं ने माता की आराधना कर सुख-शांति और सफलता की कामना की।



