महिला सुरक्षा चुनौतियां और आयाम – समाधान अभियान वेबीनार
नई दिल्ली:-09/10/2020
समाधान अभियान ने नयी दिल्ली में महिला सुरक्षा चुनौतियां और आयाम विषय पर वेबिनार का किया सफल आयोजन।
समाधान अभियान द्वारा आयोजित वेबीनार में जाे मुद्दे समाधान के रूप में सामने आए, वे निम्न हैं:-
वेबिनार में शामिल श्री अरुण उपाध्याय (उड़ीसा के पूर्व डीजीपी एवं वैदिक स्कॉलर) ने बताया कि सुर और असुर सभ्यता का प्रभाव भारतवर्ष में शुरू से रहा है। असुर उनको माना गया जो अपने स्वार्थ के लिए और अपने लालच के लिए कोई भी काम कर सकते हैं जो कि मानवता के विरुद्ध भी हो सकता है । उसी तरह दूर उनको माना गया जो मानवता और नैतिक मूल्यों के साथ जीवन यापन करते हैं।
इसमें एक और महत्वपूर्ण बात है कि असुर का सं हार करना पाप नहीं माना गया अगर वह जरूरत से ज्यादा अनैतिक होते हैं। अपने वर्तमान संविधान में भी धारा संख्या १०० इसी बारे में है यदि किसी के जान या अस्मिता को यदि कोई खतरा पहुंचाता है तो उस अपराधी को जान से मारने में स्वयं द्वारा या किसी के द्वारा जो वहां पर मौजूद है अपराध नहीं माना गया है और उसे सजा नहीं मिलेगी यह कानून सब को पता होना चाहिए महिलाओं को सुरक्षित रहने के लिए तो खासकर।
वहीं डॉ अनामिका ने बताया कि परंपरा को निभाना मानव मूल्यों को बचाने में सहयोगी पाया गया है दक्षिण भारत में परंपराएं ज्यादा निभाई जाती हैं और वहां पर महिलाओं का लेबर फोर्स में पार्टिसिपेशन ज्यादा पाया गया। डॉक्टर अभिलाषा का मानना है बच्चों को बचपन से ही भारतीय नैतिक मूल्य का ज्ञान कराना जरूरी है इस तरह से बच्चे बड़े होंगे तो उनकी अपराधी प्रवृत्ति अपने आप कम होगी । इस समय इस सूचना का अभाव है इसका एक तरीका है कि पाठ्यक्रम में भी भारतीय परंपराओं और नैतिक मूल्यों को जोड़ा जाए।
भारतीय परंपरा का मतलब कोई धर्म नहीं बल्कि सभ्यता है यह अर्चना अग्निहोत्री का मानना है। क्या वजह है कि महिलाओं के प्रति क्रूरता बढ़ रही है यह एनसीआरबी का डाटा है 2018 और 19 का। जबकि कानून बहुत सख्त हो गया है पहले से सामाजिक जागरूकता भी बड़ी है इसके साथ साथ भारतवर्ष में समाजसेवी संस्थाएं भी बहुत ज्यादा है इसके मतलब कोई ऐसी चीज है जो अभी भी अनदेखी है जिसकी वजह से ही क्रूरता बढ़ रही है। यह है भारतीय सभ्यता और आध्यात्मिकता, जिसको की लोगों ने मजाक उड़ाना और हल्के में लेना शुरू करने की वजह से परिवारों में इस विषय को लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं।
सभी वक्ताओं की बातों के बाद जो निष्कर्ष निकला है वह है की भारतीय परंपराएं बहुत वैज्ञानिक है और उनको पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना एक समझदारी होगी। अंत मैं सीलम बाजपेई ने सबका धन्यवाद किया और पाठ्यक्रम में इस विषय को डाले जाने से संबंधित कार्यवाही के बारे में जानकारी पता करने के लिए एक और मीटिंग रखने की पेश करी।


