*कैसी दृष्टि है पश्चिमी मीडिया की भारत-विरोधी या शंकालु*
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, ::सृष्टि का मूल स्वभाव परिवर्तन है। परिवर्तन ही जीवन का नियम है, गति है, लय है। लेकिन इस निरंतर परिवर्तनशील ब्रह्मांड में भी कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो परिवर्तन के पार जाकर शाश्वत हो जाता है। नदी का जल बहता रहता है, पर नदी का अस्तित्व बना रहता है। देह नश्वर है, लेकिन आत्मा सनातन है। नींद आती-जाती है, लेकिन निद्रा की आवश्यकता स्थायी है। इसी प्रकार ब्रह्म और आत्मा, दोनों कालातीत हैं। भारतीय दर्शन ने सृष्टि को केवल भौतिक नहीं माना है, बल्कि उसे दार्शनिक और आध्यात्मिक संदर्भ में समझा है। यही कारण है कि यहाँ “शाश्वत” और “निमित्त” (कारणजन्य) के बीच स्पष्ट भेद किया गया है।
भारतीय चिंतन में शाश्वत जो समय, सत्ता और परिवर्तन से परे हो और निमित्त जो परिस्थितियों, कारणों और काल से उपजे हों। उदाहरणस्वरूप उजाला और अंधेरा। चंद्रमा और सितारे। जीवन और मृत्यु। ये सभी देखने में स्थायी लगते हैं, पर वास्तव में निमित्त मात्र हैं। इनका अस्तित्व कारणों पर निर्भर है।
इसी दार्शनिक पृष्ठभूमि में यदि आधुनिक विश्व को देखा जाए, तो भारत के संदर्भ में एक विचित्र स्थिति सामने आती है। कुछ तत्व ऐसे हैं जो न तो पूर्णतः शाश्वत हैं, न ही अस्थायी, बल्कि निमित्त होते हुए भी शाश्वत बन चुका है। उनमें से एक है पश्चिमी मीडिया की भारत-विरोधी या भारत-शंकालु दृष्टि। यह दृष्टि न किसी एक सरकार से जुड़ी है, न किसी एक नेता से और न ही किसी एक घटना से। यह दृष्टि एक मानसिकता है।
यह कहना सरल होगा कि यह सब हाल की राजनीति का परिणाम है, लेकिन सत्य इससे कहीं गहरा है। इस मानसिकता की जड़ें जवाहरलाल नेहरू के काल में दिखाई देती हैं। नेहरू पश्चिमी शिक्षण-प्रणाली से आए थे, उनकी विश्वदृष्टि में पश्चिम एक नैतिक और बौद्धिक मानक था। वही लोकतंत्र सिखाए। वही मानवाधिकार समझाए और वही आधुनिकता का प्रमाणपत्र दे। यहीं से भारत के लिए पश्चिमी मीडिया ने स्वयं को न्यायाधीश की भूमिका में स्थापित कर लिया।
जवाहरलाल नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी आए, सरकारें बदलीं, नीतियाँ बदलीं, वैश्विक परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन पश्चिमी मीडिया की मूल प्रवृत्ति नहीं बदली। कभी भारत को “गरीब लोकतंत्र” कहा गया। “अराजक समाज” कहा गया और “लोकतांत्रिक प्रयोग” कहा गया।
जब नरेन्द्र मोदी का युग आया, तो समस्या और गहरी हो गई। अब भारत केवल अपनी बात कहने लगा। अपने हित स्पष्ट करने लगा। वैश्विक मंचों पर आत्मविश्वास से खड़ा होने लगा। यही वह बिंदु था जहाँ पश्चिमी मीडिया को भारत असहज करने लगा।
यह केवल एक शीर्षक नहीं है। यह एक दृष्टिकोण है।जब भारत कोई भी पहल करता है AI Summit, G20, Digital Public Infrastructure, Global South नेतृत्व तो प्रतिक्रिया लगभग तय होती है “Impact unclear”, “Symbolism over substance” और “Democracy under strain” यह आलोचना नहीं है, यह पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष है।
पश्चिमी मीडिया की यह दृष्टि वास्तव में औपनिवेशिक स्मृति, बौद्धिक वर्चस्व और नैरेटिव नियंत्रण का विस्तार है। उनके लिए भारत अब भी “पूर्व उपनिवेश” है। “सीखने वाला समाज” है और “नियंत्रण में रखने योग्य राष्ट्र” है।
पश्चिमी मीडिया स्वयं को तटस्थ बताता है, लेकिन वह वास्तव में शक्ति-संतुलन, भू-राजनीतिक हित और वैचारिक एजेंडा का उपकरण है। जब भारत स्वतंत्र स्वर में बोलता है, तो उसे “खतरा” माना जाता है।
पश्चिमी मीडिया भी अब भारत के लिए एक स्थायी चुनौती, एक निरंतर आलोचक और एक शाश्वत निमित्त बन चुका है। जबकि भारत का उत्तर सफाई देना नहीं है। क्षमा याचना करना नहीं है। अनुमोदन की याचना करना नहीं है, बल्कि निरंतर कर्म, स्पष्ट दृष्टि और आत्मविश्वासी प्रस्तुति देना है।
भारत सभ्यता है, मीडिया एक युग की आवाज। सभ्यताएँ टिकती हैं, नैरेटिव बदलते रहते हैं। पश्चिमी मीडिया आएगा-जाएगा, लेकिन भारत अपनी धारा में आगे बढ़ता रहेगा नदी-जल की तरह, आत्मा की तरह और ब्रह्म की तरह।
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