सावन महीना में कांवड़ में जल लेकर भगवान महादेव पर जल चढ़ाने का बड़ा महत्व है….

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जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना ::सावन महीना में कांवड़ में जल लेकर भगवान महादेव पर जल चढ़ाने का बड़ा महत्व है। झारखंड के देवघर में स्थित बैजनाथ धाम (जो पहले बिहार में अवस्थित था) में भगवान महादेव को ऐसे तो सालो भर जलाभिषेक होता है लेकिन सावन और भादो महीना में कावड़ लेकर, पैदल यात्रा कर जलाभिषेक करने का अलग ही महत्व है। महिलाएं सावन में पूरी महीना भगवान महादेव के मंदिर में जाकर बेलपत्र, पुष्पादि के साथ जलाभिषेक करती है और प्रत्येक सोमवार को व्रत रखती है। वही पुरुष कावड़ लेकर बिहार के कई प्रसिद्ध भगवान महादेव के मंदिर में जलाभिषेक करते है। अब तो कावड़ लेकर महिलाओं और बच्चे भी भगवान महादेव के मंदिर में जाकर जलाभिषेक करते है। अब तो स्थित ऐसी हो गई है की बैजनाथ धाम में जगह-जगह कांवड़ियों की लम्बी कतारें लगती है और लोग बोल बम, बोल बम के जयकारे लगाते हुए भगवान महादेव पर जलाभिषेक करते है।

बैजनाथ धाम में भगवान महादेव पर जलाभिषेक करना, श्रद्धा से जुड़ी एक परंपरा है, इसकी शुरुआत कब हुई और किसने की इस पर अलग-अलग किदवंती है। कुछ लोगों का मानना है कि भगवान राम ने बिहार के सुलतानगंज में गंगा नदी में स्नान कर, कांवड़ में गंगाजल लेकर बिहार के देवघर (अब देवघर झारखंड राज्य में है) स्थित भगवान महादेव पर जलाभिषेक किया था, इसलिए भगवान राम कांवड़ में जल लेकर जलाभिषेक करने वाले पहले कावड़िया थे। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि त्रेता युग में कांवड़ यात्रा की शुरुआत श्रवण कुमार ने किया था। कहा जाता है कि श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को जब तीर्थ यात्रा कराते समय वह हिमाचल के ऊना में पहुंचे थे, तब उनके माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा जताई थी, उनकी इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार ने उन्हें कांवड़ में बैठाया और हरिद्वार लाकर गंगा स्नान कराया था वहां से वह अपने साथ गंगाजल भी लिया था इसलिए लोगों का मानना था कि तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई है।

पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय, मंथन से निकले विष को, भगवान महादेव जब ग्रहण किया था, तब विष के प्रभाव से भगवान महादेव के कंठ नीला पड़ गया था और तब से वह नीलकंठ कहलाने लगे। विष के प्रभाव को दूर करने के लिए महापंडित रावण ने कांवड़ में जल भरकर लाया और भगवान महादेव पर जलाभिषेक किया। इसके बाद विष के प्रभाव से भगवान महादेव मुक्त हुए। लोगों का मानना है कि तभी से कांवड़ यात्रा शुरू हुई। कुछ विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित ‘पुरा महादेव’ का जलाभिषेक किया था। वह शिवलिंग का अभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाए थे। इस कथन के अनुसार आज भी लोग गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव का अभिषेक करते हैं। अब गढ़मुक्तेश्वर को ब्रजघाट के नाम से भी जाना जाता है।

भारत के लगभग सभी राज्यों में सावन और भादो महीने में भगवान महादेव पर जलाभिषेक किया जाता है, लेकिन बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में इसकी महात्म अत्यधिक है। देखा जाय तो किसी न किसी कारण से भगवान महादेव पर देवताओं ने भी जलाभिषेक किया है।

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