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सरस्वती पूजा : वाणी, विद्या और ब्रह्मबोध की उपनिषदिक साधना है

लेखक : अवधेश झा

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः
चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूर्मम ।
मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥
अर्थ — चार मुख वाले ब्रह्मा के मुख-कमलों के वन में विहार करने वाली, हंसस्वरूपिणी, सर्वथा श्वेत स्वरूप वाली माँ सरस्वती सदा मेरे मन में रमण करें।

सरस्वती पूजा — देवी-पूजन के साथ आत्मसाधना है। भारतीय संस्कृति में सरस्वती पूजा केवल विद्या की देवी का अनुष्ठान नहीं है, अपितु वाणी की शुद्धि, बुद्धि की प्रखरता और ब्रह्मबोध की उपनिषदिक साधना है। यह पूजा मनुष्य को अक्षर-ज्ञान से आत्मज्ञान की ओर, और वाणी के बाह्य रूप से परा-वाणी के मौन बोध की ओर ले जाती है।

संवाद-क्रम में न्यायमूर्ति राजेन्द्र प्रसाद कहते हैं —

“सुने हुए शब्द बोल देना या पढ़े हुए वाक्य व्यक्त कर देना सरल है; परन्तु जब माता सरस्वती आपकी जिह्वा, वाणी, बुद्धि और ब्रह्मभाव में प्रतिष्ठित हो जाती हैं, तब जो विद्या, ज्ञान की धारा प्रवाहित होती है, वह उनकी ही विशेष कृपा है एवं वही विद्या ब्रह्म सत्य है तथा आत्मा की तरह नित्य है।

सूक्ष्मता से देखेंगे तो जानेंगे कि आपने ही विद्या की अधिष्ठात्री देवी को सृजित किया है। आप ही आत्मभाव में ब्रह्म के निराकार और साकार—दोनों रूपों में सर्वत्र प्रतिष्ठित हैं। ‘तत्त्वमसि’ और ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ का बोध कराने के लिए ही माता उपस्थित होती हैं और यही उनकी वास्तविक आराधना है।

अपनी विद्वता और ज्ञान का विसर्जन उसी स्वरूप में कीजिए—तब परा-वाणी, ब्रह्मस्वरूपिणी सरस्वती आपके अंतःकरण में स्वयं विराजमान हो जाएँगी।”

सरस्वतीरहस्योपनिषद् इस सन्दर्भ में देवी को ब्रह्मविद्या, विद्यामूर्ति आदि स्वरूप को उद्घाटित किया है तथा सरस्वतीरहस्योपनिषद् सरस्वती को केवल वीणा – पुस्तकधारिणी देवी के रूप में नहीं, बल्कि वेदान्त की ब्रह्मविद्याशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

“या वेदान्तार्थतत्त्वैकस्वरूपा परमार्थतः”
अर्थात् सरस्वती परमार्थतः वेदान्त के तत्त्व की एकमेव स्वरूपा हैं। अतः सरस्वती पूजा का लक्ष्य है — अविद्या का क्षय, वाणी का ब्रह्म से योग और नाम-रूपातीत सत्य का साक्षात्कार है।

ऋग्वेद के मंत्र “चत्वारि वाक् परिमिता पदानि” के अनुसार वाणी के चार स्तर हैं —
1. परा — शुद्ध चैतन्य, ब्रह्म में स्थित वाणी
2. पश्यन्ती — सूक्ष्म विचार-बीज (ब्रह्म विचार)
3. मध्यमा — मन में आकार लेती वाणी
4. वैखरी — उच्चरित शब्द

सरस्वती पूजा का लक्ष्य वैखरी नहीं, अपितु परा-वाणी की सिद्धि है, जहाँ वाणी और मौन एक हो जाते हैं और शुद्ध चैतन्य की ही अनुभव होती है।

उपनिषद् की दस ऋचाएँ भी क्रमिक साधना-पथ हैं—
आरम्भ : बुद्धि, मेधा और धारणा की रक्षा करना है।
मध्य : अद्वैत ब्रह्मशक्ति का बोध होना, तत्त्व दर्शन आदि
शिखर : निर्विकल्प, नाम-रूपातीत अनुभव करना है।

इसलिए कहा गया है—
“सरस्वती दशश्लोक्या… परां सिद्धिमलभं मुनिपुङ्गवाः”
मेधा और धारणा की रक्षा, अद्वैत ब्रह्मबोध, निर्विकल्प, नाम-रूपातीत अनुभव तक ले जाती हैं।

उपनिषद् माया की आवरण और विक्षेप शक्ति, जीव-ईश्वर-ब्रह्म के तात्त्विक भेद और उनके मिथ्यात्व का उद्घाटन करता है —
“मयि जीवत्वमीशत्वं कल्पितं वस्तुतो नहि”
एकमेव सत्य सच्चिदानन्द ब्रह्म है — यही सरस्वती पूजा की पराकाष्ठा है।

उपनिषद् सविकल्प और निर्विकल्प समाधि का सूक्ष्म विश्लेषण करता है और बताता है कि — जब देहाभिमान नष्ट हो जाता है और परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तब मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहीं-वहीं परम अमृत का अनुभव होता है।

आज सरस्वती पूजा को परीक्षा-उत्तीर्णता और कला-कौशल तक सीमित कर दिया गया है, जबकि उपनिषद् कहता है —विद्या का चरम लक्ष्य मुक्ति है, वाणी का चरम लक्ष्य मौन-बोध है और बुद्धि का चरम लक्ष्य अहं-शून्यता है।

इस तरह से सरस्वती पूजा —
वाणी को ब्रह्म में प्रतिष्ठित करने की प्रक्रिया, मन को नाम-रूप से मुक्त करने का यज्ञ, तथा आत्मविद्या/ब्रह्मविद्या का महोत्सव है।

ब्रह्मरूप में माता सरस्वती बाहर नहीं, मेरी ही चैतन्य-प्रतिभा हैं। वही कवित्व, वहीं वैदिक ज्ञान और मुक्ति प्रदायिनी हैं। ऐसी देवी माता को कोटि-कोटि नमन।

माता सरस्वती — मेरी ही चैतन्य-प्रतिभा हैं। सरस्वती बाहर नहीं, मेरी ही चैतन्य – प्रतिभा हैं। वही वाणी, वही ज्ञान और वही मुक्ति हैं। ऐसी ब्रह्मस्वरूपिणी माता को कोटि-कोटि नमन।

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः
मेरी वाणी शुद्ध हो, मेरी बुद्धि ब्रह्मगामी बने, और मेरा जीवन सत्य में प्रतिष्ठित रहे।

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