किशनगंज सदर अस्पताल में सुरक्षा गार्डों का वेतन बकाया, फर्जीवाड़ा और दबाव का आरोप
फर्जीवाड़ा उजागर होने के बाद कार्रवाई से बचने के लिए आउटसोर्सिंग एजेंसी ने सुरक्षा गार्डों के सामने सादे कागज पर हस्ताक्षर की रखीं शर्तें

किशनगंज,06अप्रैल(के.स.)। धर्मेन्द्र सिंह, सदर अस्पताल किशनगंज में तैनात सुरक्षा गार्ड इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। पिछले दो माह फरवरी और मार्च का वेतन नहीं मिलने से गार्डों के सामने परिवार चलाने की समस्या खड़ी हो गई है। गार्डों का आरोप है कि आउटसोर्सिंग एजेंसी द्वारा वेतन भुगतान के बदले सादे कागज पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया जा रहा है।
गार्डों के अनुसार, एजेंसी प्रबंधन ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक वे सादे कागज पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, तब तक उनका वेतन जारी नहीं किया जाएगा।कर्मचारियों का कहना है कि यह न केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन है बल्कि उनके अधिकारों का भी हनन है।
इस बीच, यह भी आरोप सामने आया है कि एजेंसी की बात मानने वाले कुछ गार्डों को पहले ही वेतन दे दिया गया है, जिनकी ड्यूटी एएनएम स्कूल एवं हॉस्टल में लगाई गई है। इससे एक ही एजेंसी के अंतर्गत कार्यरत कर्मचारियों के बीच भेदभाव का मामला भी उठ खड़ा हुआ है।
गार्डों ने यह भी बताया कि आउटसोर्सिंग एजेंसी के प्रतिनिधि विमलेश कुमार ने सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया, लेकिन दो महीने से वेतन नहीं मिलने के प्रश्न पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
मामले में एक बड़ा खुलासा यह भी हुआ है कि सदर अस्पताल में वर्षों से आउटसोर्सिंग एजेंसी को बिना उचित सत्यापन के करोड़ों रुपये का भुगतान किया जाता रहा। अनुबंध के अनुसार, भुगतान से पहले अस्पताल प्रबंधन द्वारा बिलों का सत्यापन अनिवार्य है, लेकिन इस प्रक्रिया की अनदेखी किए जाने का आरोप है।
पूछे जाने पर सिविल सर्जन डॉ. राजकुमार चौधरी ने स्वीकार किया कि पहले बिना सत्यापन के भुगतान की व्यवस्था चली आ रही थी। उन्होंने कहा कि भविष्य में नियमों के अनुसार ही भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा। पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि अब तक कई सिविल सर्जन बदल गये लेकिन आउटसोर्सिंग एजेंसी पर स्वास्थ्य विभाग की मेहरबानी जारी रही। आखिर सदर अस्पताल प्रबंधन किस प्रकार की मॉनिटरिंग कर रहा था कि सालों से फर्जीवाड़ा का खेल चलता रहा और अस्पताल प्रबंधन आंखें मूंदे रहा।
मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब यह सामने आया कि कुछ ऐसे सुरक्षा गार्ड, जो महीनों पहले नौकरी छोड़ चुके थे, उनकी भी उपस्थिति दिखाकर भुगतान किया गया। इससे वित्तीय अनियमितता और संभावित मिलीभगत की आशंका गहरा गई है।
दो माह से वेतन नहीं मिलने से नाराज सुरक्षा गार्डों ने जिला प्रशासन, श्रम विभाग और स्वास्थ्य विभाग से हस्तक्षेप की मांग की है। गार्डों ने बकाया वेतन भुगतान, जबरन हस्ताक्षर की जांच तथा न्यूनतम मजदूरी के अनुसार वेतन निर्धारण की मांग की है।
गार्डों का कहना है कि पूर्व सैनिक गार्डों को ₹500 प्रतिदिन तथा सिविल गार्डों को ₹300 प्रतिदिन का भुगतान किया जा रहा है, जबकि सरकार द्वारा आउटसोर्सिंग एजेंसी को इससे कई गुना अधिक राशि दी जा रही है। उन्होंने पूर्व सैनिकों के लिए ₹1257.37 तथा सिविल गार्डों के लिए ₹728.21 प्रतिदिन भुगतान की मांग की है।
गार्डों ने जिलाधिकारी को आवेदन देकर चेतावनी दी है कि यदि जल्द वेतन भुगतान नहीं हुआ तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
फिलहाल पूरे मामले ने आउटसोर्सिंग व्यवस्था, अस्पताल प्रबंधन और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में कितनी तेजी और गंभीरता से कार्रवाई करता है।


