एनसीईआरटी विवाद पर उठे सवाल: शिक्षा, न्यायपालिका और पारदर्शिता की कसौटी पर सरकार

किताब में संशोधन को लेकर देशभर में बहस तेज
चंदन चौरसिया बोले – लोकतंत्र में संतुलित शिक्षा ही भविष्य की गारंटी
त्रिलोकी नाथ प्रसाद/पटना। वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में हालिया संशोधन को लेकर चल रहे विवाद पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि शिक्षा व्यवस्था किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक रीढ़ होती है और उसमें किए गए हर बदलाव का दूरगामी प्रभाव पड़ता है। हाल में कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में “न्यायपालिका की भूमिका” से जुड़े अध्याय पर आपत्ति सामने आने के बाद देशभर में बहस छिड़ गई है। इस मामले में एनसीईआरटी द्वारा संबंधित अंश को वापस लेने और संशोधन की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सख्त रुख अपनाते हुए संस्थागत गरिमा को लेकर टिप्पणी की है। चंदन चौरसिया का कहना है कि जब पाठ्यपुस्तकों में संवैधानिक संस्थाओं का उल्लेख होता है, तो शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी और संतुलन के साथ किया जाना चाहिए। बच्चों के मन में किसी भी संस्था के प्रति अविश्वास या पूर्वाग्रह पैदा करना शिक्षा का उद्देश्य नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि संशोधन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और इसमें शिक्षाविदों, विशेषज्ञों तथा समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
चंदन चौरसिया ने कहा कि लोकतंत्र में आलोचना का स्थान अवश्य है, लेकिन वह तथ्यों और संतुलन पर आधारित होनी चाहिए। यदि किसी अध्याय में न्यायपालिका से संबंधित चुनौतियों या समस्याओं का उल्लेख किया जाता है, तो उसके साथ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संस्थाएं स्वयं सुधार की प्रक्रिया से गुजरती हैं और संविधान के दायरे में काम करती हैं। उनका मानना है कि इस पूरे विवाद ने शिक्षा नीति और पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया पर भी प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। पाठ्यपुस्तक केवल जानकारी देने का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह विद्यार्थियों की सोच और दृष्टिकोण को आकार देती है। इसलिए उसमें किसी भी प्रकार की जल्दबाजी या एकपक्षीय दृष्टिकोण से बचना चाहिए, उन्होंने कहा जब मामला अदालत तक पहुंचता है, तो यह संकेत देता है कि समाज के भीतर संवाद की कमी रही है।सरकार और शैक्षणिक संस्थाओं को चाहिए कि वे इस अवसर को टकराव के बजाय सुधार और विश्वास बहाली के रूप में देखें।
चौरसिया ने कहा कि देश की युवा पीढ़ी को मजबूत लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ तैयार करना समय की मांग है। शिक्षा में पारदर्शिता, संतुलन और तथ्यपरकता ही भविष्य की गारंटी है।पाठ्यक्रम संशोधन को राजनीतिक बहस का विषय बनाने से बचना चाहिए और इसे विशेषज्ञों के स्तर पर सुलझाया जाना चाहिए। “संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है विद्यार्थियों को वास्तविक और व्यापक जानकारी देना। हमें ऐसा संतुलन स्थापित करना होगा, जहां न तो तथ्यों को छिपाया जाए और न ही संस्थाओं की छवि को अनावश्यक रूप से आघात पहुंचे,” उन्होंने कहा अंततः यह विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है। यदि इस दिशा में सुधार की पहल ईमानदारी और संवाद के साथ की जाए, तो यह विवाद भविष्य में शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने का अवसर भी बन सकता है।

