किशनगंज : दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिगम्बर जैन भवन, देव दुर्लभ श्रीगुरु पूजा महोत्सव का अयोजन।

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किशनगंज/धर्मेन्द्र सिंह, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिगम्बर जैन भवन, NH 31, तेघरिया रेलवे गुमटी के नजदीक, देव दुर्लभ श्रीगुरु पूजा महोत्सव, बड़े ही श्रद्धा भाव और उत्साह के साथ मनाया गया। यह कार्यक्रम श्रीगुरु महाराज जी के पूजन तथा वेद मंत्रों के उच्चारण से प्रारंभ हुआ। आशुतोष महाराज जी का शिष्य स्वामी सुकर्मानंद जी ने रविवार को जानकारी देते हुए बताया कि श्री महाराज जी हमेशा कहा करते हैं कि गुरु पूर्णिमा महोत्सव में आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक तथ्य निहित है और आत्मा उत्थान के लिए हर शिष्य को इसे जानना अति अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है क्योंकि शताब्दियों पूर्व, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को महर्षि वेद व्यास जी का अवतरण हुआ था। वही वेद व्यास जी, जिन्होंने वैदिक ऋचाओं का संकलन कर चार वेदों के रूप में वर्गीकरण किया था। 18 पुराणों, 18 उप-पुराणों, उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र, महाभारत आदि अतुलनीय ग्रंथों को लेखनीबद्ध करने का श्रेय भी इन्हें ही जाता है। ऐसे महान गुरुदेव के ज्ञान-सूर्य की रश्मियों में जिन शिष्यों ने स्नान किया, वे अपने गुरुदेव का पूजन किए बिना न रह सके। इसलिए शिष्यों ने उनके अवतरण के मंगलमय एवं पुण्य दिवस को पूजन का दिन चुना। यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। तब से लेकर आज तक हर शिष्य अपने गुरुदेव का पूजन-वंदन इसी शुभ दिवस पर करता है।

गुरु पूर्णिमा और प्राचीन गुरुकुल, गुरुकुल का वर्धन और फैलाव !

प्राचीन काल में गुरु पूर्णिमा का दिन एक विशेष दिन के रूप में मनाया जाता था। इस दिन केवल उत्सव नहीं, महोत्सव होता था। वे गुरु-चरणों में बैठकर प्रण लेते थे- ‘गुरुवर, आपके सान्निध्य में रहकर, आपकी कृपा से हमने जो ज्ञान अर्जित किया है, उसे लोक-हित और कल्याण के लिए लगाएँगे। अपने गुरुदेव को यह दक्षिणा देकर छात्र विश्व-प्रांगण में यानी अपने कार्य-क्षेत्र में उतरते थे। अतः प्राचीन काल में गुरु-पूर्णिमा के दिन गुरुकुलों में गुरु का कुल (अर्थात्‌ शिष्यगण) बढ़ता भी था और विश्व में फैलता भी था।

गुरु पूर्णिमा और वैज्ञानिकता साधक की आत्म-उन्नति का दिन !

वैज्ञानिक भी आषाढ़ पूर्णिमा की महत्ता को अब समझ चुके हैं। ‘विस्डम ऑफ ईस्ट’ पुस्तक के लेखक आर्थर चार्ल्स स्टोक लिखते हैं-जैसे भारत द्वारा खोज किए गए शून्य, छंद, व्याकरण आदि की महिमा अब पूरा विश्व गाता है, उसी प्रकार भारत द्वारा उजागर की गई सद्गुरु की महिमा को भी एक दिन पूरा विश्व जानेगा। यह भी जानेगा कि अपने महान गुरु की पूजा के लिए उन्होंने आषाढ़ पूर्णिमा का दिन ही क्यों चुना ? ऐसा क्या खास है इस दिन में ? स्टोक ने आषाढ़ पूर्णिमा को लेकर कई अध्ययन व शोध किए। इन सब प्रयोगों के आधार पर उन्होंने कहा-‘वर्ष भर में अनेकों पूर्णिमाएँ आती हैं-शरद पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, वैशाख पूर्णिमा.. आदि। पर आषाढ़ पूर्णिमा भक्ति व ज्ञान के पथ पर चल रहे साधकों के लिए एक विशेष महत्त्व रखती है। इस दिन आकाश में अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन (पराबैंगनी विकिरण) फैल जाती हैं। इस कारण व्यक्ति का शरीर व मन एक विशेष स्थिति में आ जाता है। उसकी भूख, नींद व मन का बिखराव कम हो जाता है। अतः यह स्थिति साधक के लिए बेहद लाभदायक है। वह इसका लाभ उठाकर अधिक-से-अधिक ध्यान-साधना कर सकता है। कहने का भाव कि आत्म-उत्थान व कल्याण के लिए गुरु पूर्णिमा का दिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अति उत्तम है। स्वामी सुकर्मानंद, संजय यादव, अंकुश कुमार, जय किशन प्रसाद, राजेश गुप्ता, जयंत यादव, राम प्रसाद यादव रूपेश सिंह, महेश प्रधान, संजीव कुमार, अशोक कुमार, जनार्दन साह संजय सिंह के दिशा निर्देश में तथा आयोजन में लगभग 20 सेवादार के अथक प्रयास व मेहनत के द्वारा 400 लोगों आनंद विभोर हुए।

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